Romantic Story : फोन का रिसीवर हाथ में पकड़े हुए सुनीति न जाने कितनी देर तक शून्य में घूरती रही. नीतू जो उस की अंतरंग सहेली थी, दूसरी तरफ का रिसीवर कब का रख चुकी थी. जो समाचार उस ने सुनाया था वह विश्वास करने लायक भी तो नहीं था. नीतू ही तो थी जो उस के दिल का एकएक राज जानती थी. इतने वर्षों तक उस की हर गतिविधि से अवगत कराती थी.
पहले जब नीतू का फोन आता था वह एक अद्भुत सिहरन से भर उठती थी. उस की एकएक बात सुनीति के दिल के उस कोने को सिंचित करती जाती थी. आज भी वह कोना हरा था तो केवल नीतू की वजह से. लेकिन आज. यह कैसी खबर दी. पूरा वजूद ही हिल गया सुनीति का. वह लौक्ड कोना सुनीति के पूरे शरीर पर हावी हो उठा. खबर भी तो हृदयविदारक थी. नीतू कह रही थी…
‘‘अंतिम समय में भी तुम्हारा ही नाम था उस के होंठों पर सुग्गी. सभी पूछ रहे थे कि यह सुग्गी कौन है?’’
आह, जातेजाते भी सुनीति को बदनाम होने से बचा लिया. कोई नहीं जान पाया कि उस की ‘सुग्गी’ सुनीति ही तो थी. कोई जान भी नहीं पाएगा क्योंकि उस के नहीं होने से यह चैप्टर ही बंद हो गया परंतु क्या सुनीति के लिए भी क्या आसान था उसे भुलाना. वह भुलाना चाहती ही कहां थी. दिल का एक कोना तो उसी के लिए सुरक्षित था जहां उस के सिवा किसी और को इजाजत नहीं थी. वह सिर्फ और सिर्फ उस का अपना था जिसे तन्हाइयों में सहला लिया करती थी.
सुनीति जब 10वीं कक्षा में थी तो उस शहर में आई थी. पापा का ट्रांसफर जो हो गया था. पापा का मन था कि सुनीति स्कूल बोर्ड की परीक्षा पुराने शहर से ही दे ले, परंतु उन के जौंडिस हो जाने के कारण सुनीति की मम्मी को नए शहर में आना पड़ा. अब पुराने शहर में लड़कियों को अकेले छोड़ना सही नहीं लग रहा था. छोटी वाली तो 5वीं क्लास में थी. उसे तो नए शहर में दाखिला दिलाना ही था. अत: परेशानी से बचने के लिए सुनीति का भी यहीं एडमिशन करा दिया गया. उस की मम्मी होस्टल में रखने के खिलाफ थी. वैसे सुनीति बहुत होशियार थी पर मां का दिल भला कहां मानता है? उस के लिए तो उस के बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं, चाहे वे प्रौढ़ावस्था में भी क्यों न पहुंच गए हों.
सुनीति के स्कूल के रास्ते में एक स्टेशनरी की दुकान थी, जहां से अकसर वह
कापियां और पैनपैंसिल लिया करती थी. नियमित ग्राहक होने की वजह से दुकानदार से अच्छा संबंध हो गया था. सुनीति को वे प्यार से बिटिया कह कर बुलाते. सुनीति भी उन्हें अंकल के बजाय खान चाचाजी कह कर बुलाती थी. ईद के दिन छुट्टी होने के बावजूद कापी खरीदने के बहाने जाती थी. सेवइयां जो खानी होती थीं.
एक दिन इसी तरह कुछ चार्ट पेपर खरीदने के लिए दुकान पर गई. पंकज उधास की मशहूर गजल, ‘दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है.’ बज रही थी जो सुनीति की पसंदीदा गजलों में से एक थी. इस के पहले तो दुकान पर कभी कोई रिकौर्ड प्लेयर बजते हुए नहीं सुना था. पूछ ही बैठी खान चाचा से, ‘‘आज कुछ खास तो नहीं खान चाचाजी? पहली बार आप की दुकान पर गाना सुना.’’
‘‘अरे नहीं बिटिया वह आलम, मेरा छोटा लड़का छुट्टियों में आया हुआ है. अलीगढ़ में होस्टल में रहता है. गजलों का बहुत शौकीन है.’’
‘‘मु झे भी गजलें बहुत पसंद हैं खासकर पंकज उधास की पर मेरे पास उन की कोई सीडी नहीं है. आप सीडी प्लेयर भी रखते हैं क्या दुकान पर?’’
तभी अपनी ही धुन में खोया एक युवक जो शायद अंदर के कमरे से हड़बड़ी में तेजी से आ रहा था, सुनीति से टकरा गया.
‘‘ओह कितनी बार कहा है कि सामने देख कर चला कर. किसी दिन दुर्घटना हो जाएगी, पर ये जनाब अपनी ही धुन में रहते हैं. माफ करना बिटिया…’’ कहते हुए खान चाचाजी ने अपने लड़के से भी माफी मंगवाई.
‘‘कोई बात नहीं चाचाजी आप के पास यदि पंकज उधास के गजलों की सीडी है तो उसे भी लिस्ट में लिख कर जल्दी से पैसे जोड़ दीजिए.’’
‘‘अब्बा हुजूर के पास सीडी नहीं होगी. आप ऐसा कीजिए यही सीडी ले लीजिए. मेरी गलती का खमियाजा भी पूरा हो जाएगा. मेरे पास इस गजलकार की और भी सीडी हैं.’’
पता नहीं यह उस का माफीनामा था या एक नई प्रेमकथा की भूमिका लिखी जा रही थी.
सुनीति ने उसे माफ तो किया ही, वह सीडी सुनने के बाद लौटा भी आई. फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा. एक सीडी लौटाती और बदले में दूसरी सीडी मिल जाती. इस तरह सीडी के लेनदेन में कब दिलों का लेनदेन हो गया दोनों में से किसी को पता नहीं चला. चूंकि सुनीति हर रोज तो जाती नहीं थी. अत: किसी को कोई अंदेशा नहीं हुआ.
आलम 2 महीने की छुट्टी पर आया था. पहली नजर में ही सुनीति उस के
दिल में उतर गई थी. सुनीति ने भी आलम की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया था. बोर्ड का ऐग्जाम सिर पर था. नीतू और वह जबतब इकट्ठे परीक्षा की तैयारियां करती थीं. प्रीबोर्ड ऐग्जाम से पहले स्कूल में कुछ ऐक्स्ट्रा क्लासें भी होती थीं. क्लास के बाद उन बिंदुओं पर डिस्कस करने के लिए उस समय सुनीति आलम को भी कालेज के लैंडलाइन फोन से खान चाचा की दुकान पर फोन कर बुला लिया करती थी. इस तरह मदद करतेकरते आलम के दिल में सुनीति के लिए एक खास जगह बन गई थी. आलम सुनीति से 3 साल सीनियर था. दोनों में पढ़ाई के अलावा अन्य विषयों पर भी बातें होने लगी थीं.
10वीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास होने पर सुनीति खान चाचा के लिए मिठाई भी ले गई थी. कालेज में दाखिला ले लिया था पर फिर भी खान चाचा का हालचाल लेना नहीं भूलती. आलम भी अब जल्दीजल्दी इस शहर में आने लगा. जब भी आता सुनीति से अवश्य मिलता. 2 सालों तक दोनों का यों ही मिलनाजुलना चलता रहा.
सुनीति को आलम का साथ बहुत भाता था. जीवनसाथी के रूप में भी वह लड़का पसंद था उसे परंतु वह जानती थी कि सनातनी ब्राह्मण कुल में जन्मी एक लड़की के लिए दूसरे धर्म के लड़के से प्रेम करना तो दूर सोचना भी खतरनाक हो सकता है. जरा सी भी किसी को भनक मिल गई तो उस की आजादी तो छिनेगी ही, साथ में खान चाचाजी की दुकान भी बंद हो जाएगी. उस ने कई बार आलम को बताने की कोशिश की कि वे दोनों कभी एक नहीं हो सकते. बदनामी के सिवा और कुछ हासिल नहीं हो सकता. फिर भी आलम कहता, ‘‘अब इस दिल का क्या करूं जो तुम्हारे सिवा किसी और को वह स्थान दे ही नहीं पाता.’’
‘‘पर अभी इस रिश्ते की कोई मंजिल नहीं है. मैं अपने परिवार के खिलाफ जाना तो दूर, उन के ऊपर बदनामी का एक दाग भी लग जाए तो मैं जी नहीं पाऊंगी.’’
‘‘प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता. मंजिल न मिले तो क्या, मैं तुम्हें आजीवन प्रेम
करता रहूंगा.’’
‘‘पर जानते हो न इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. अगर यह बात खुल गई तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.’’
‘‘चिंता मत करो. मैं ऐसा होने नहीं दूंगा. मेरा प्रेम रूहानी है. अब से तुम्हारा नाम भी मेरी जबान पर नहीं आएगा. तुम मेरी ‘सुग्गी’ बन कर मेरे दिल की मलिका बनी रहोगी.’’
जहां सुनीति ने परंपरागत सुशील कन्या का धर्म निभाते हुए परिवार की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ़ी, वहीं आलम एक सच्चे प्रेमी की तरह एकतरफा और खामोश प्रेम करता रहा और अपनी महबूबा की याद में बेहतरीन गजलें लिखता रहा. कुछ ही दिनों में एक मशहूर शायर बन चुका था जिस की गजलों में जुदाई की तड़प इतनी संजीव होती थी कि गजल की समाप्ति के बाद सुनने वालों की आंखें गंगायमुना बन जाती थीं.
इधर घर में सुनीति के विवाह की चर्चा होने लगी. ढेर सारे रिश्तों के बीच आया राकेश का रिश्ता सभी को जंच गया. हर मांबाप की पारंपरिक सीख ‘ससुराल में सब को खुश रखना’ की गठरी के साथ सुनीति राकेश के घर आ गई. राकेश सचमुच बहुत अच्छे इंसान थे. उन की गजलों में कोई रुचि नहीं थी, फिर भी सुनीति की पसंद के सभी गजलकारों की सीडी का कलैक्शन सजा दिया था उस के कमरे में जिन में आलम की गजलें भी थीं.
एक दिन राकेश ने कहा भी, ‘‘तुम ने आलम की सीडी का पैक भी नहीं खोला है.
सुना है, दर्द की ऐसी तसवीर उकेरी है उस ने कि सुनने वाला उस दर्द के दरिया में डूबे बिना नहीं रह पाता.’’
‘‘इसीलिए तो मु झे नहीं सुननी ऐसी करुण झंकार. मु झे नहीं देखनी गमों की बरसात… मु झे अपने सुखी संसार में दर्द का एक कतरा भी नहीं चाहिए.’’
अपने इस जवाब से उस ने राकेश को तो संतुष्ट कर दिया परंतु वह जानती थी कि कितना मुश्किल है उस के लिए उस की गजलों से दूर रहना.
नीतू बताती थी कि उस की गजलों की नायिका तो वही होती है. एकएक शेर दिल को छूने वाला. जिस मुहब्बत का इजहार कभी लबों से न कर पाया, उसे लफ्जों में बड़ी खूबसूरती से ढाला है.
राकेश भी तो कह रहे थे, ‘‘एक बार सुनोगी तो दीवानी हो उठोगी. एकएक लफ्ज दर्द में लिपटा हुआ. लगता है जनाब को उन की माशूका नहीं मिल पाई होगी. अनुभव की स्याही में डूबे अल्फाज ही दिल के पन्ने पर उतर पाते हैं.’’
सुनीति भी बातों को रफादफा करने के लिहाज से बोल उठी थी, ‘‘आप की तो गजलों में कोई रुचि नहीं. फिर कैसे इतनी तारीफ? जिस गजल को सुन कर रोना आए, उसे नहीं सुनना ही बेहतर. क्यों फोर्स करते हैं मुझे?’’
उस दिन के बाद राकेश ने सचमुच फिर कभी जिक्र नहीं किया. वैसे सुनीति अपने परिवार में खुश थी. इतना प्यार करने वाला पति और प्यारेप्यारे 2 बच्चे थे उस की झोली में. दुखी रहने का कोई कारण भी तो नहीं था. फिर भी कभीकभार उस लौक्ड कोने को सहला भी देती थी. वैसे भी घरगृहस्थी में रमने के बाद एक स्त्री का अपना जीवन तो कई टुकड़ों में बंट जाता है. सासससुर, पति, बच्चों के साथसाथ सामाजिक व्यवहार इन सब के बीच उल झ कर अपने निजी शौक, सपने यहां तक कि अपना वजूद भी गुम हो जाता है.
राकेश का तबादला होता गया. उस के साथ वह भी शहरदरशहर बदलती रही. सारे पुराने संपर्क लगभग टूट चुके थे. बस, नीतू ही थी जिस से अब तक संपर्क बना हुआ था. नीतू का पति उसी शहर में टीचर था और वह भी वहीं के किसी स्कूल में पढ़ाने लगी थी. स्कूलों में तबादले बहुत कम हुआ करते थे.
नीतू से ही पता चलता रहा था कि खान चाचाजी का इंतकाल हो गया है और दुकान उन के बड़े बेटे इमरान संभालते हैं. उन्होंने दुकान का काफी विस्तार कर लिया है. स्टेशनरी के साथसाथ कौस्मैटिक्स और गिफ्ट आइटम्स भी रख ली हैं. यह भी कि आलम ने निकाह नहीं किया. एक कमरे की उस की दुनिया थी जहां शायरी बिछाता और शायरी ही ओढ़ता. इमरान भाई ने उस पर काफी दबाव डाला निकाह करने के लिए. यहां तक कि इस के लिए भी तैयार थे कि यदि कोई लड़की पसंद हो तो बता दे वे खुद उस के मांबाप को राजी करेंगे. परंतु उस ने तो जैसे चुप्पी साध ली थी. जब सम झासम झा कर थक गए तो उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.
बात महल्ले वालों तक भी पहुंची. जब किसी बात का किसी के ऊपर कोई असर नहीं
पड़ता तो लोग उसे उसी रूप में स्वीकार करने को बाध्य हो जाते हैं. किसीकिसी ने तो उस का नाम पागल दीवाना ही रख दिया था.
आपस में बातें करते, ‘‘मजनूं भी शायद ऐसा ही रहा होगा. मगर इस की लैला का तो पता ही नहीं.’’
नीतू लोगों की बातें अकसर बताया करती थी, ‘‘कैसा दीवाना है यह जिस ने अपनेआप को मिटा दिया पर अपनी महबूबा की इज्जत पर एक खरोंच भी नहीं आने दी.’’
नीतू की इन बातों से सुनीति कुछ समय के लिए विचलित होती पर तुरंत ही स्वयं को संभाल लेती. कभीकभी उसे ग्लानि भी होती, ‘‘बेवफाई क्या इसी को कहते हैं? क्या आलम की हालत के लिए वही दोषी है?’’
फिर स्वयं ही उत्तर देती, ‘‘नहीं. उस ने तो कभी कोई वादा नहीं किया था और न ही कभी प्यार का इजहार ही किया था. हां, यह सच है कि उसे आलम अच्छा लगता था परंतु अपनी खुशी के लिए परिवार और समाज को दुख पहुंचाना न्यायसंगत नहीं था. शायद इसीलिए बचपन से ही लड़कियों को स्त्री के त्याग की गाथा सुनासुना कर त्याग और बलिदान की घुट्टी पिला दी जाती है. वह भी तो उसी परंपरा को निभा रही थी…’’
किंतु आज इस खबर को सुन कर उस के दिल का वह कोना लहूलुहान हो उठा. दर्द की एक लहर उठी जो खंजर बन कर खुरच गई. उस कोने को. बरसों से जबरदस्ती बंद किया हुआ सोता फूट पड़ा. बहुत देर तक बिस्तर पर निष्प्राण सी पड़ी रही.
राकेश ने सोचा ‘शायद तबीयत कुछ नासाज होगी. आराम करेगी तो ठीक
हो जाएगी.’ यही सोच कर डिस्टर्ब नहीं किया बच्चों को खिला कर सुला दिया और स्वयं औफिस का काम करने बैठ गया.
पता नहीं कब आंख लग गई थी उस की. चिडि़यों के चहचहाने की आवाज कानों में दस्तक दे रही थी.
‘‘अरे, सुबह हो गई?’’
थोड़ी चैतन्य हुई तो नीतू के फोन की याद आई. तो क्या वह शाम से ही सो रही है. राकेश ने जगाया भी नहीं? जगाता भी कैसे? उसी ने तो एक बार कहा था कि जब तक कोई अति आवश्यक कार्य न हो उसे कच्ची नींद से न जगाया करे. सिर भारी हो जाता है उस का और फिर पूरा दिन बरबाद हो जाता है.
सुनीति दौड़ कर किचन में गई. जूठे
बरतन देख कर सम झ गई कि राकेश ने बच्चों
को खाना खिला दिया था. वह सोचने लगी, ‘ओह, कितने अच्छे हैं राकेश. एक अच्छे इंसान के साथ वह अब तक धोखा करती आ रही है. अपना पूरा दिल भी उसे न सौंप सकी. उस का एक कोना वंचित ही रहा उस की प्रेम सुधा से. राकेश ने तो पूरे मन से अपनाया है उसे, पर बदले में उसे उस का आधाअधूरा प्यार ही मिला. वैसे भी अब उस कोने में शून्यता के अलावा कुछ भी नहीं है.’
परंतु अगले ही पल सुनीति का अंतर्मन बोल पड़ा, ‘‘कोई धोखा नहीं किया. दोनों को उस के हिस्से का पूरा प्यार मिला. एक मुखर रहा तो दूसरा मौन. प्रेम प्रतिदान नहीं मांगता. राकेश ने जो किया, वह उन का प्रेम है. आलम ने जो किया वह उस का. तुम ने तो दोनों से वफादारी निभाई. यह तो खुशी की बात है कि आलम के हिस्से का प्रेम भी अब राकेश को मिलेगा.’’
रातभर की तड़प, आत्मग्लानि घुल रही थी. जैसे सूर्य की प्रथम रश्मि के पड़ने पर शबनम की बूंदें पिघलती हैं. मौसम स्वच्छ हो आया था. सुनीति एक हाथ में चाय की प्याली लिए राकेश के माथे पर जागरण का चुंबन दे रही थी.
राकेश सम झ ही नहीं पा रहा था कि सूर्य पूरब से उगा है या पश्चिम से क्योंकि आज से पहले तो यह सीन उलटा हुआ करता था, सुनीति को देर से जगने की आदत जो थी.
राइटर गीता चौबे गूंज
