राइटर : संयुक्ता त्यागी

Stories : आदत  सी बन गई है सोने से पहले फेसबुक, व्हाट्सऐप टटोलने की. आज भी फेसबुक स्क्रौल करने लगी तो अचानक एक पोस्ट पर नजर टिक गई.

दूध सा उजला रंग, बड़ीबड़ी खूबसूरत लेकिन सूनी आंखें, सपनों से रिक्त… अतीत के बो झ से थकी हुई आंखें मानो सारे दर्द को काजल बना आंखों में भर लिया हो. होंठों पर फीकी सी मुसकराहट… साफ पता चल रहा था कि सैल्फी के लिए जबरन मुसकरा रही है. फोटो में बाल दिख नहीं रहे थे लेकिन याद आ गया इस के बाल तो तब भी बहुत लंबे थे जब हम पहली बार मिले थे.

मैं ने 9वीं क्लास में एडमिशन लिया था और वह क्लास मौनीटर थी. तब उस की आंखों में सूनापन नहीं जुगनू चमकते थे, मोहिनी, यही नाम बताया था उस ने पहली मुलाकात में सब की मदद करने वाली, मिलनसार, खुशमिजाज मोहिनी. जैसा नाम वैसी ही मन मोहने वाली. उस समय वह मेरी बहुत खास सहेली तो नहीं थी लेकिन जब भी मौका मिलता हम खूब बातें किया करते थे. दुबलीपतली मोहिनी बहुत हंसमुख थी. आज के इस फोटो में उस मोहिनी का थोड़ा सा अक्स भी नहीं नजर आता. तब कहां सोचा था कि जिंदगी कौन से रंग दिखाएगी… वह उम्र सोचने की नहीं जीने की थी और वह खूब जीती थी.

ऐसे ही स्कूल में हंसतेमुसकराते, बेशुमार यादें संजोते कब 4 साल बीत गए पता ही नहीं चला. स्कूल खत्म होने के बाद मेरी फैमिली मेरठ छोड़ गाजियाबाद शिफ्ट हो गई. इस के बाद उस से कोई कौंटैक्ट नहीं रहा.

मेरी बहुत खास सहेली अनु का घर मोहिनी के घर के पास ही था. करीब 2 साल बाद अनु ने बताया कि मोहिनी के पापा नहीं रहे. सुन कर बहुत दुख हुआ, साथ ही कितने सवाल एकसाथ जेहन में घूमने लगे. अब क्या होगा उस का और उस के परिवार का. एक बड़ा भाई था वह भी पढ़ रहा था. मन बहुत दुखी हुआ उस के बारे में सोच कर. कुछ लोग हमारी जिंदगी में इतने साइलैंट होते हैं कि नौर्मली हमें याद तक नहीं रहते लेकिन जब उन के दुख से मन परेशान होता है तब सम झ आता है कि वे हमारे लिए खास हैं. ऐसा ही कुछ मैं तब मोहिनी के लिए महसूस कर रही थी.

जीवन अपनी गति से चलता रहा. कुछ साल बाद फिर अनु से पता चला कि मोहिनी के भाई की रोड ऐक्सीडैंट में मौत हो गई. सुनते ही आंखों से आंसू बह निकले. मोहिनी के दुख को मैं दूर से, बिना मिले ही महसूस कर पा रही थी. कुदरत इतनी क्रूर कैसे हो गई? इतनी हंसमुख लड़की की हंसी क्यों छीन ली? लेकिन इतनी हिम्मत नहीं हुई कि अनु से उस का फोन नंबर ले कर बात करती या मिलने ही चली जाती.

वक्त के साथ मोहिनी की याद भी मेरे मन में हलकी पड़ने लगी. पढ़ाई पूरी करने के बाद शादी कर मैं वापस मेरठ ही आ गई. अपनी ही दुनिया में इतनी खो गई कि और कोई याद ही नहीं रहा. इस बीच 2 बच्चों की मां बन गई और मातृत्व सुख और कर्तव्य निभाने में 5 साल यों ही निकल गए.

एक दिन फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वैस्ट आई… ‘मोहिनी’ पल भर भी नहीं लगा पहचानने में, ऐक्सैप्ट कर मैसेज किया, ‘यार तू तो मोटी हो गई.’ और तुरंत ही जवाब आया, ‘मोटी नहीं अब मैं नौर्मल हूं, तब अंडरवेट थी.’

कुछ ही देर में हम फोन पर बातें कर रहे थे. वही खनकती हंसी लेकिन एक खालीपन था उस की आवाज में. मैं सवाल पूछती रही और वह जवाब देती रही. अपना पुराना मकान बेच वह उसी इलाके में रह रही थी, जहां मेरा घर था. इतने करीब कि हमारे घर में एक ही मेड काम करती थी और हम सालों से अनजान थे. अपने पापा की सरकारी नौकरी उसे मिल गई थी लेकिन शादी नहीं हुई थी.

‘‘मम्मी की जिम्मेदारी मेरी है. ऐसे कैसे शादी कर लूं. जो शख्स मेरी मम्मी को ऐक्सैप्ट करेगा उसी से शादी करूंगी.’’

गलत कहां थी वह. मां को इस उम्र और परिस्थिति में अकेले नहीं छोड़ा जा सकता था. जल्द ही उस ने सारी क्लासमेट्स को ढूंढ़ढूंढ़ कर व्हाट्सऐप गु्रप बना लिया. ऐसा लगता हम वहीं स्कूल में पहुंच गए हैं. सभी की शादियां हो चुकी थीं और हम सब दिल से चाहते थे कि मोहिनी की भी किसी सम झदार और प्यार करने वाले शख्स से शादी हो जाए. शायद उस के दिल के जख्म जीवनसाथी के स्नेह से, भीगे स्पर्श से भर जाएं. अपने दर्द को छिपाने में माहिर थी, हमेशा हंसीमजाक ही करती रहती.

फिर एक दिन उस ने सरप्राइज दिया. ग्रुप पर मैसेज आया, ‘मेरी शादी है!’ बहुत खुश थी और हम सब भी. लड़का लखनऊ में डाक्टर था, अच्छाखासा संपन्न परिवार. मोहिनी अपनी शादी की तैयारियों में लग गई, ट्रांसफर के लिए ऐप्लिकेशन भी दे दी और आसपास के लोगों से मकान को बेचने के लिए कहना शुरू कर दिया क्योंकि उस ने लड़के से पहले ही बात कर ली थी कि उस की मम्मी भी मेरे साथ लखनऊ ही शिफ्ट होंगी. मम्मी को ससुराल के पास में ही एक फ्लैट दिलवा देंगे जिस से मोहिनी उन का अच्छी तरह खयाल रख सके और मम्मी का आत्मसम्मान भी बरकरार रहे. मु झे मोहिनी का यह फैसला बहुत अच्छा लगा.

शादी लखनऊ में ही थी. हम शादी में नहीं गए बस तसवीरें देखीं. मोहिनी 34 की उम्र में भी गुडि़या सी लग रही थी और लड़का किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं था. रामसीता की जोड़ी लग रही थी. पता नहीं क्यों मु झे उस हैंडसम लड़के के चेहरे पर सौम्यता की जगह अजीब से कुटिल भाव दिख रहे थे. मन में सोचा कि मोहिनी ने सोचसम झ कर ही फैसला लिया होगा. मु झे ये सब इग्नोर करना चाहिए लेकिन यह मेरी मात्र सोच नहीं शायद सिक्स्थ सैंस थी.

1-2 बार फोन पर बात हुई तो मोहिनी काफी खुश लगी. मन को तसल्ली हो गई कि वह अपने जीवनसाथी के साथ खुश है. उस का ट्रांसफर हो गया था और उस ने वहीं लखनऊ में अपना औफिस जौइन भी कर लिया था.

मोहिनी जब भी सोशल मीडिया पर अपनी और अपने पति के फोटो अपलोड करती तो दोनों एकसाथ काफी खुश और सुंदर दिखाई देते थे. मन को सब्र आ जाता था कि बहुत कुछ खोने के बाद भी अब उसे अपने हक की खुशियां मिल गई हैं.

मोहिनी ने धीरेधीरे सोशल मीडिया पर दिखना कम कर दिया. यहां तक कि व्हाट्सऐप गु्रप भी छोड़ दिया. मु झे लगा शायद परिवार में व्यस्त हो गई है. कुल मिला कर अब हमें मोहिनी की कोई खबर नहीं थी. 1-2 बार फोन भी मिलाया लेकिन स्विच औफ था. मन के किसी कोने में कुछ खटक रहा था लेकिन अकसर हम दिल में पनप रहे नकारात्मक विचारों को अनदेखा कर देते हैं या फिर कबूतर की तरह संकट देख कर आंखें बंद कर लेते हैं.

उस दिन मैं बच्चों को स्कूल भेज स्कूटी से मार्केट के लिए निकली. मेरे ठीक आगे एक औरत स्कूटी पर जा रही थी. अचानक मन में आया कि यह तो बिलकुल मोहिनी जैसी लग रही है. फिर खुद ही अपनी सोच को नकार दिया कि भला मोहिनी यहां क्यों होगी? वह तो लखनऊ में सैटल हो चुकी है. यहां तक कि उस की मम्मी भी वहीं चली गईं हैं. जैसे ही मैं उस के बराबर से गुजरी, पलट कर देखा तो वह मोहिनी ही थी.

मोहिनी अपने औफिस के सामने रुकी और स्कूटी खड़ी कर अंदर चली

गई. मु झे कुछ सम झ नहीं आ रहा था. मैं भी उस के पीछेपीछे औफिस में अंदर चली गई और सीधे जा कर उस के सामने खड़ी हो गई. मु झे वहां देख वो सकपका गई.

‘‘कैसी हो मोहिनी?’’

‘‘यह मेरा फोन नंबर, कल मिलते हैं,’’ एक कागज का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ाते हुए उस ने मेरी तरफ देखा. उस की आंखें नम थीं. न जाने कितना कुछ था उस के भीतर जो उसे खोखला कर रहा था. वही खोखलापन उस की आंखों में साफसाफ दिख रहा था. मैं वहां से चली तो आई लेकिन मन में सवालों के बवंडर उठ रहे थे. शाम को उस ने मैसेज कर के अपना पता और मिलने का समय बताया. यह उस के घर का पता नहीं था, याद आया कि उस का घर तो बिक गया था.

मन ही मन अटकलें लगाती मैं उस के दरवाजे पर पहुंच गई. मोहिनी ने दरवाजा खोला और फीकी सी मुसकान के साथ मेरा स्वागत किया.

‘‘जानती हूं तेरे मन में बहुत से सवाल उठ रहे हैं, बताती हूं. सब बताती हूं. मैं भी चाहती हूं किसी से कह कर मन के बो झ को हलका करना. यह बो झ मु झे जीने नहीं दे रहा.’’

मैं नि:शब्द, बुत बनी उस की बात सुन रही थी. उस ने कहना शुरू किया, ‘‘शादी के बाद मु झे मेरे पति ने कभी स्वीकार ही नहीं किया. सच तो यह है कि वह किसी और लड़की को चाहता था लेकिन फैमिली प्रैशर में मु झ से शादी कर ली थी. जब मु झे यह पता चला तो मैं टूट गई. जब पत्नी का प्यार, अधिकार नहीं देना था तो क्यों की थी यह शादी? लेकिन मेरे किसी भी सवाल का जवाब तक देना उस के लिए जरूरी नहीं था. शायद उस ने सोचा था कि मैं ‘बेचारी’ लड़की हूं, जिस पर वह तरस खा कर शादी कर रहा है. बहुत अच्छी तरह जानता था कि एक बार शादी हो गई तो मैं मम्मी की वजह से खामोशी से उस के साथ रहती रहूंगी और समाज में उस की साफसुथरी छवि बनी रहेगी. गलत भी कहां था वह. सबकुछ जानतेसम झते, आत्मनिर्भर होने के बावजूद मैं चुप थी. डरती थी कि कहीं मम्मी को पता चल गया तो सह नहीं पाएंगी. बहुत बार मन में आता कि क्यों बरदाश्त कर रही हूं मैं इस लाश से रिश्ते को? क्यों नहीं तोड़ कर आजाद हो जाती? फिर खुद को ही सम झा देती कि इतना आसान नहीं है मम्मी को ये सब बताना.

‘‘एक कुशल अभिनेत्री की तरह उस नकली रिश्ते के साथ मैं मुसकराती रहती.

फिर कोरोना ने पांव पसारे और मम्मी को अपने साथ ले गया. बहुत कोशिश की उन्हें बचाने की लेकिन शायद मु झे यह दुख भी देखना था. वे चली गईं.

‘‘अब मेरे पास कोई वजह नहीं रह गई थी उस घुटन भरे रिश्ते के साथ जीने की. मैं ने अपने पति को साफ शब्दों में कह दिया कि सिर्फ और सिर्फ मम्मी की वजह से मैं इस छल से भरे रिश्ते को ढो रही थी लेकिन अब और नहीं. वह मु झे तलाक नहीं देना चाहता था क्योंकि इस से समाज में उस की बदनामी होती. उस का कहना था कि तुम्हें कमी क्या है यहां, जैसा चल रहा है वैसा चलने दो. उस के शब्द मेरे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ा रहे थे और एक पल भी वहां रुकना. मेरा दम घोट रहा था. फैसला हो चुका था.

‘‘मैं ने खुद को उस के छल से आजाद कर लिया और तलाक ले वापस आ गई अपने घर. शायद कुदरत ने मेरे हिस्से में अकेलापन ही लिखा है. मन में बहुत कसक है. मु झे हर किसी ने छला है फिर चाहे वह इंसान हो या कुदरत.

‘‘अब अकेली हूं और बहुत हद तक संतुष्ट भी कि अब कुछ बाकी ही नहीं बचा जिसे कोई मु झ से छीन सके’’ कह कर वह हौले से मुसकरा दी. उस की बड़ीबड़ी खूबसूरत आंखों से आंसू नहीं टपके, शायद उन्हें वहीं बसने की आदत जो हो गई थी.

मैं खामोश बैठी उस की बातें सुनती रही. सांत्वना देने के लिए शब्द नहीं थे. तभी दरवाजे पर घंटी बजी और मोहिनी ने खुद को संयमित करते हुए उठ कर दरवाजा खोला. सामने एक 10-12 साल की प्यारी सी बच्ची खड़ी थी.

‘‘हाय आंटी? पता है वह मेरी फ्रैंड रिया है न…’’ दरवाजे से अंदर घुसते हुए अपनी बात कहती वह बच्ची मु झे देख ठिठक गई.

‘‘आन्या, यह मेरी स्कूल फ्रैंड है.’’

मोहिनी ने मेरा परिचय दिया तो उस के चेहरे पर प्यारी सी मुसकान खिल गई.

‘‘ओह, सौरी, मु झे पता नहीं था कि आप की फ्रैंड आई हैं. मैं बाद में आती हूं. बहुत सारी बातें बतानी हैं आप को,’’ अपनी बात पूरी करती आन्या हवा के  झोंके की तरह लौट गई.

‘‘यहीं सामने वाले घर में रहती है, बड़ी प्यारी है. लेकिन नियति ने इसे भी नहीं बख्शा. 5 साल की थी जब एक हादसे में इस की मां चल बसीं. कुछ बरस दादी ने पाला, 2 साल पहले वे भी नहीं रहीं. पापा अपने काम में व्यस्त रहते हैं, इस के पास अपनी बात कहनेसुनने वाला कोई भी नहीं है. अकेली है… तभी तो जैसे ही मैं औफिस से आती हूं तो मेरे साथ ही आ जाती है, फिर सारे दिन की हर बात… चाहे दोस्तों की हो या पढ़ाई की, सब बताती है. मेरे ही साथ डिनर कर के रात को अपने पापा के आने के बाद घर जाती है. बस हम दोनों एकदूसरे का अकेलापन बांट हलका महसूस करते हैं. जानती है इस की उम्र इतनी कम है लेकिन फिर भी मेरे दर्द को बिन कहे सम झती है. दर्द ने ही जोड़ रखा है हम दोनों को.’’

मोहिनी की बातों में आन्या के लिए सिर्फ हमदर्दी ही नहीं थी, वात्सल्य भी था, ममता भी थी. बिलकुल एक मां की तरह.

मेरे मन में विचार आया कि यदि मोहिनी और आन्या के पापा… लेकिन इस विचार को

वहीं  झटक दिया. मोहिनी ने इतना कुछ देख लिया है, अब किसी नए रिश्ते पर विश्वास करना उस के लिए असंभव है. आन्या के पापा को भी दूसरी शादी करनी होती तो कब की कर ली होती. नहीं, यह महज एक विचार है जो बेमकसद मेरे मन में आ गया है. ऐसा कभी नहीं हो सकता. 2 साल ऐसे ही निकल गए.

फेसबुक पर मोहिनी की पोस्ट देख सब याद आ गया. स्क्रौल करते ही अगले फोटो में मोहिनी आन्या के साथ थी. दोनों बहुत खुश लग रही थीं और मोहिनी की आंखों का वह सूनापन कहीं नहीं दिख रहा था. मन को सब्र आया कि कोई तो है जिस के कारण मोहिनी की आंखों में चमक उभर आती है.

जब भी मौका लगता है मोहिनी को फोन कर लेती हूं. उस दिन फोन पर बात करते हुए

उस की आवाज भीगी हुई थी. पूछने पर टाल गई. मु झ से रुका नहीं गया और शाम को उस के घर पहुंच गई.

‘‘क्या हुआ? सब ठीक तो है न?’’

‘‘आन्या के पापा उसे होस्टल भेज रहे हैं,’’ इतना कह मोहिनी फूटफूट कर रो पड़ी. मैं ने उसे गले लगा लिया. वह रोती रही मानो बरसों की पीड़ा आज बह जाने वाली थी.

‘‘मैं उस के बिना नहीं रह सकती…’’

‘‘और वह.. वह रह लेगी तेरे बिना?’’

‘‘नहीं… मैं आप के बिना एक दिन भी नहीं रह सकती.’’ आन्या ने दौड़ कर मोहिनी के गले लगते हुए कहा. उस के पीछे उस के पापा मयंक भी खड़े थे. आंखों में आंसू लिए हारे हुए योद्धा की तरह.

‘‘जब आप मेरे बिना नहीं रह सकतीं तो मेरी बात मान क्यों नहीं लेतीं,’’ आन्या ने सुबकते हुए कहा, ‘‘पापा भी नहीं मान रहे.’’

मैं ने मोहिनी की तरफ देखा. वह सकपका गई, ‘‘आन्या चाहती है कि मैं उस के पापा से शादी कर लूं… तू ही बता क्या यह आसान होगा?’’

‘‘मोहिनीजी सही कह रही हैं, हम दोनों के लिए ही यह आसान नहीं है. मानता हूं कि मैं आन्या को समय नहीं दे पाता, इसलिए उसे होस्टल भेजने का डिसीजन लिया है.’’

मैं सम झ नहीं पा रही थी कि क्या जवाब दूं. एक लंबी गहरी सांस लेने के बाद मैं ने दोनों से कहा, ‘‘मानती हूं कि शादी का यह निर्णय आप दोनों के लिए बहुत मुश्किल है और वह भी उम्र के इस पड़ाव पर… इतना कुछ सहने के बाद एक नई शुरुआत के बारे में सोचना भी नामुमकिन लगता है लेकिन यह भी सच है कि आन्या पिता के साथ मां का साथ भी चाहती है. कोई भी बच्ची किसी औरत को अपनी मां के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती, वह मोहिनी को आप की पत्नी नहीं, अपनी मां के रूप में देखना चाहती है क्योंकि उस ने मोहिनी से मां का प्यार पाया है. सच कहना मोहिनी, क्या तुम आन्या को दिल की गहराइयों से मां की तरह प्यार नहीं करतीं?’’

मेरी बात सुन मोहिनी ने आन्या की तरफ देखा और धीरे से स्वीकृति में गरदन हिला दी.

‘‘मयंकजी, आप ने अब तक इसलिए शादी नहीं की थी क्योंकि आप डरते थे कि दूसरी मां आन्या को अपनाएगी या नहीं. कुदरत का खेल देखिए आन्या ने अपनी मां खुद चुन ली. अगर अब आप इन दोनों को अलग करते हैं तो शायद…’’ मेरे शब्द हलक में ही अटक गए.

मयंक और मोहिनी दोनों खामोश थे. दोनों ही खुद को इस फैसले के लिए मन

ही मन तैयार कर रहे थे. मयंक ने आन्या के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘ठीक है बेटा, तेरी खुशी मेरे लिए सबकुछ है. मैं इस शादी के लिए तैयार हूं अगर मोहिनीजी तैयार हों तो.’’

आन्या ने मोहिनी की आंखों में सीधे  झांकते हुए देखा. उसे मोहिनी से बात करने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं थी. मोहिनी ने आंखों ही आंखों में स्वीकृति दे दी और मजबूती से आन्या का हाथ थाम लिया, एक नई शुरुआत के लिए.

मी ऐंड

माई पैट

एक खास रिश्ता

मे रा मोक्ष सिर्फ एक पालतू नहीं, मेरे परिवार का हिस्सा है. उस की मासूम आंखों में इतना अपनापन और सम झदारी है कि वह बिना कुछ कहे ही हमारी हर बात को समझ लेता है. मोक्ष कभी शरारती नहीं रहा बल्कि हमेशा शांत और सम झदार रहा. ऐसा लगता है जैसे वह हमारे दिल की हर बात जानता है. उसे देख कर लगता है कि वह सिर्फ एक जानवर नहीं बल्कि भावनाओं से भरा एक संवेदनशील जीव है. पिछले 14 वर्षों से मोक्ष हमारे साथ है, हर खुशी, हर मुश्किल में एक सच्चे साथी की तरह. उस ने हमें सिखाया है कि प्यार शब्दों का मुहताज नहीं बल्कि सच्ची भावना और साथ ही सब से बड़ी भाषा है. मेरे लिए मोक्ष हमेशा खास रहेगा.

मोहिनी ने धीरेधीरे सोशल मीडिया पर दिखना कम कर दिया. यहां तक कि व्हाट्सऐप ग्रुप भी छोड़ दिया…

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