हां वह अफसर थी एक बड़े विभाग की वरिष्ठ अधिकारी. सब बहुत अदब करते थे. मिजाज से सख्त. कम बोलने वाली. कुशाग्रबुद्धि की स्वामिनी. बुद्धि और रूप का सुंदर समागम थी. मानिनी नाम उस के व्यक्तित्व के सर्वथा योग्य था.
बड़े घर की प्रतिभासंपन्न रूपवती लड़की थी. किसी के आगे झुकना उस ने सीखा ही नहीं था. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. बचपन में जो चाहा वह मांगने से पहले ही हाजिर होता था. मातापिता की इकलौती संतान थी.
मानिनी के कड़क स्वभाव के चलते पूरी कालेज लाइफ में कोई भी लड़का उस से कभी प्यारमुहब्बत का इजहार न कर सका था और न ही मानिनी को कोई ऐसा लगा जिस को पाने की उस ने कामना की हो.
जब उस का चयन प्रशानिक सेवा में हो गया तो विवाह योग्य होने पर पिता ने बड़ी ही दूरदर्शिता से उस के दबंग व्यक्तित्व को देखते हुए ही एक बहुत ही विनम्र और गरीब घर के उसी के साथ चयनित योग्य लड़के को उस के जीवनसाथी के रूप में चुना.
पिता फौज में थे. कोई जंग कैसे जीती जाती है उन्हें बखूबी पता था. मनोबल सब से बड़ा बल होता है.
पिता ने इस मनोविज्ञान को समझा कि उन के उच्च घराने की गुणी अधिकारी बेटी से उन का अति सामान्य आर्थिक वर्ग से आने वाला दामाद कभी भी कोई विवाद करने की हिम्मत नहीं कर सकेगा यानी दामाद का मनोबल कम ही रहे तो इस तरह मेरी इस दबंग बेटी का दांपत्य निभ ही जाएगा. और दांपत्य की गाड़ी बिना खटरपटर के चल भी रही थी. कम से कम आवाज तो बिलकुल नहीं करती थी.
विवाह के पश्चात 2 बच्चे हुए. बच्चों का पालनपोषण और घर की देखभाल के लिए नौकरचाकर की फौज थी. किंतु बेचारे पति तरसते रह गए कि पत्नी कभी उन की पसंद का कुछ बना कर या नौकरों से ही बनवा कर उन का खाने पर इंतजार करे या कभी बनसंवर कर पति के सामने मधुरता से पेश आए. पति बस उस के हर आदेश का पालन करते थे. बच्चों ने भी पिता को देखा और उन का अनुसरण करते हुए मां की हर बात को बस माना.
मानिनी बहुत ही अनुशासनप्रिय थी. औफिस तो औफिस घर में पति बच्चे सब को बहुत ही अनुशासन में रखती थी. उस के कहे को कोई टालता नहीं था. बच्चे भी उस के संरक्षण में अच्छे पढ़लिख रहे थे. लेकिन मानिनी को कभीकभी कुछ तो खटकता था. फिर वह इस विचार को झटक देती थी और उसे लगता था सबकुछ बहुत ठीक चल रहा है तो कुछ भी सोचना फुजूल की बात है. लेकिन उस घर में कुछ कमी थी.
उस कमी को समझना भी सब के बस की बात नहीं थी. जैसे एकदम हरेभरे करीने से संवारे हुए बगीचे में सूखे पत्तों की कमी खटकती है क्योंकि सूखी पत्तियों से ही बगीचे का नैसर्गिक सौंदर्य उभरता है. वैसे ही उस परिवार में कुछ खटकता था. शायद बच्चों की उन्मुक्त खिलखिलाहट, पतिपत्नी की मीठी नोकझोंक की कमी. कभी हंसनाहंसाना, कभी रूठनामनाना. कभी बच्चों का जिद करना, कभी मां से लाड़दुलार करवाने के लिए झूठमूठ में गुस्सा हो जाना. ये सबकुछ ऐसे भाव थे जो इस आलीशान कोठी में कहीं दूरदूर तक नजर नहीं आते थे.
घर में सब लोग एक नियमित दिनचर्या का पालन करते थे. ठीक समय पर सोना और
जगना होता था. खानानाश्ता सब टाइम पर होता था. मजाल नहीं थी कोई नाश्ते की टेबल पर ठीक समय पर न पहुंचे.
हालाकि मैडमजी को कभी ऊंची आवाज में बात करते किसी ने नहीं सुना था. किंतु खौफ इतना था कि कभी आंख टेढ़ी कर देख भी लें तो लोगों के पसीने छूट जाते थे. अब औफिस में तो एक बार को यह ऐटीट्यूड चल भी जाए वैसे अब तो औफिस तक में लोग अपने मातहतों से बातचीत में लहजा नर्म ही रखते हैं. किंतु घर में तो आप खुद को हार कर ही परिवार का दिल
जीतते हैं.
यही घर और औफिस में फर्क होता है. घर में आप के अपने होते हैं जोकि आप के
साथ एहसासों से जुड़े होते हैं. किंतु मानिनी को इस का किंचित भी आभास नहीं था कि पत्नी कैसे पति की हर बात मानते हुए भी अपनी बात कैसे मनवा लेती है. बच्चों के नखरे कैसे उठाए जाते हैं. बच्चों को कैसे फुसलाया जाता है. वह बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान खोज लेती थी. लेकिन पति के दिल का रास्ता खोजना उस को कभी नहीं सुहाता था. अलबत्ता पति की जबान पर ताला लगा दिया था उस ने या पति ने खुद ही मुंह बंद रखा था यह कोई नहीं जान पाया था.
कभीकी मानिनी को भी यह बात अखरती थी, कुछ कमी महसूस होती थी. कभीकभी उसे लगता था कि उस के परिवार और अन्य परिवारों में कुछ अंतर है. किंतु क्या वह कभी समझ नहीं सकी और न उस ने इस विषय पर बहुत सोचा ही.
समय अपनी गति से चलता जा रहा था. अचानक मानिनी को उस के कालेज के समय की सहपाठी सुधा मिल गई उस के अपने ही शहर मुंबई में. सुधा कालेज में मानिनी ने बहुत तो घुलीमिली नहीं थी. किंतु जब मानिनी ने उसे पहचान कर बात की पहल की तो सुधा ने भी गर्मजोशी से उस से मुलाकात की और तब मानिनी को पता चला कि सुधा बैंक में काम करती है और बेचारी का ट्रांसफर 1 हफ्ता पहले मुंबई में हो गया है. अब वह अकेली ही यहां आई है. परिवार आगरा में है और अपने रहने के लिए कोई मकान ढूंढ़ रही है. फिलहाल किसी होटल में रुकी हुई है 3 दिनों से.
अभिमानी मानिनी ने सोचा सुधा को अपने घर एक हफ्ते रोक ले. सुधा की मदद भी हो जाएगी और सुधा को उस का ऐशोआराम तथा रोबदाब दिखाने का भी अवसर सहज ही मिल जाएगा.
वैसे भी सुधा का बैंक उस के घर से काफी नजदीक था. सुधा मानिनी के बड़े से बंगले के गैस्टरूम में शिफ्ट हो गई. सुबहसुबह तो सुधा की मानिनी के पति और बच्चों से एक औपचारिक छोटी सी मुलाकात हुई थी, जिस में सब से नमस्तेबंदगी और नाश्ता हुआ. शाम को सुधा जल्द ही बैंक से छूट गईं और ज्यादा दूर न होने के कारण जल्द ही सुधा मानिनी के घर पहुंच गई.
उस ने बच्चों के लिए आइसक्रीम और केक पैक करवा लिया. घर पहुंच कर सुधा बच्चों से मिलने उन के रूम में चली गई और कुछ ही देर में बच्चे सुधा से हिलमिल गए.
सुधा ने उन से ढेर सारी बातें की. और वह क्रम रात में खाने की टेबल पर भी चालू रहा. वैसे मानिनी बच्चों के सुधा से काफी जल्दी घुलनेमिलने को नोटिस तो कर रही थी. किंतु प्रत्यक्ष में उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. ऐसे ही 2 दिन बीत गए. अब संडे आ गया. सुधा ने देखा सभी सो रहे हैं तो किचन में जा कर चाय बनाई. थोड़ी ही देर में उस का नौकर किचन में पहुंच गया और वह चुपचाप उदास सा काम कर रहा था. सुधा ने पूछा तो बोला उस के बच्चे को बुखार आ गया है और उस की पत्नी अकेले नहीं जा सकती है.
सुधा ने कहा तुम यहां की चिंता मत करो और जाओ बच्चे को दिखा दो लेकिन हां अपने मालिक और मालकिन की इजाजत ले लेना.
उस ने कहा वैसे तो हमेशा कभी जाना होता था तो मालिक यही कहते थे मैसेज डाल कर कोई अर्जैंसी हो तो चले जाया करो हां खानापीना बना कर. सुधा ने कहा फिर तुम मैसेज डाल दो और जाओ. सुधा ने उस से पूछा सब लोग नाश्ते में क्या खाते हैं.
नौकर ने जो कुछ बताया सुन कर सुधा ने कहा अच्छा आप जाओ आज का नाश्ता मैं तैयार कर देती हूं. सुधा बड़ी बेतकल्लुफी से सब के लिए नाश्ता बनाने में जुट गई. इतने में उस ने
देखा कि मानिनी के दोनों बच्चे भी किचन में
आ गए. आंटी क्या बना रही हैं आप. बच्चों की आवाज सुन कर मानिनी के पति भी वहीं आ गए.
बच्चों को हिदायत देने लगे कि आंटी को परेशान मत करना. लेकिन वे भी वहीं खड़ेखड़े सुधा और बच्चों से बातें करने लगे.
मानिनी जब नाश्ते के लिए टेबल पर आई तो देखा पूरी टेबल करीने से व्यंजनों से सजी थी और उस की खुशबू पूरे कमरे में फैल गई थी. मानिनी बड़े अचरज में थी कि सुधा ने एकदम नई रसोई में भी इतना अच्छा खाना कैसे बना लिया.
बच्चे, मानिनी और उस के पति काफी तारीफ कर रहे थे खाने की. सुधा के साथ सबने खूब गप्पें लगाईं. हमेशा खामोश रहने वाली मानिनी को भी यह बदलाव काफी अच्छा लगा. सुधा के आने से घर में एक रौनक आ गई थी. उस के सन्नाटे वाली हवेली में से भी कहकहों की आवाजें सुनाई देती थीं. मानिनी को बदलाव तो अच्छा लगा था, किंतु बदलाव के केंद्र में सुधा का होना खटक रहा था मानिनी को. सुधा का बच्चों से खूब बातें करना और मानिनी के पति राकेश की आंखों में भी सुधा के लिए प्रशंसा के भाव रहते थे.
इसी बीच सुधा को एक फ्लैट मिल गया और वह उस में शिफ्ट हो गई. मानिनी का घर फिर खामोश हो गया था सुधा के जाने से. इसी बीच शुक्रवार की शाम को सुधा सीधे बैंक से मानिनी के घर आई और अगले संडे को सुधा ने मानिनी के पूरे परिवार को अपने घर खाने पर बुलाया. उस ने बताया स्कूल में भी क्रिसमस की छुट्टियां हैं तो सुधा के पति राज बच्चों के साथ मुंबई आए हैं. इसी बहाने सब एकदूसरे से मिल लेंगे.
मानिनी के बच्चे और पति बहुत प्रसन्न थे इस आमंत्रण से. मानिनी कुछ बोल न सकी और हां कर दी. किंतु सुधा जैसी सामान्य लड़की जो पद और रंगरूप में मानिनी से काफी कम थी उस ने चुटकियों में मानिनी के परिवार में अपनी ऐसी जगह बना ली थी कि मानिनी के अंदर कुछ कमतरी के एहसास से भर रहे थे.
सुधा के घर मानिनी सपरिवार पहुंची. राज और सुधा ने सब की खूब आवभगत की. लाजवाब खाना और सलीके से सजा हुआ छोटा सा घर. सुधा के बच्चों के साथ मानिनी के दोनों बच्चे खूब घुलमिल गए. बड़ा ही खुशनुमा माहौल था वहां का. सुधा के घर जा कर मानिनी ने देखा उस के हमेशा खामोश रहने वाले पति राकेश कितने हंसमुख स्वभाव के हैं. वैसे आज तक अपने घर में उस ने राकेश को
मौन ही देखा था और हर बात का जवाब हूं और हां में ही देते थे. साथ ही मानिनी ने नोटिस किया सुधा के परिवार में सुधा का समर्पण जो देखते ही बनता था.
बच्चों ने अपनी पसंद की चीजें भी अपनी मां से तुरंत फरमाइश कर के बनवा ली थीं और सुधा खुशीखुशी बना भी लाई थी.
सब लोग खापी कर बातें कर रहे थे. इतने में सुधा के पति राज ने सब के लिए कौफी बना दी और बातों का दौर चल पड़ा. मानिनी से राज ने कहा आप ने सुधा को अपने घर पर एक बहन के जैसे रखा था. अब इस लिहाज से आप मेरी साली हुईं. सब लोग हंस पड़े. यह हलकाफुलका माहौल देख कर मानिनी मन ही मन अपने घर के सन्नाटे को याद कर रही थी, जिसे वह अनुशासन कहती थी.
मानिनी ने सुधा का बहुआयामी व्यक्तित्व देखा. सुधा एक पढ़ीलिखी नौकरीपेशा महिला थी. वह स्ट्रौंग इतनी थी कि आगरा जैसे छोटे शहर से मुंबई में ट्रांसफर हो कर अकेली रह रही थी और घरेलू इतनी कि घर के हर काम को परफैक्शन के साथ करती थी.
पति के लिए एक अच्छी बीबीबच्चों की ममतामई मां एक अच्छी दोस्त, एक हमदर्द इंसान जो एक ही दिन में उस के नौकर की भी खामोशी को भांप कर उस को जाने को बोल खुशीखुशी नाश्ता तैयार करने लगी. सच में सुधा कितनी मिलनसार और समझदार है और उस के सामने मानिनी की एकमात्र पहचान थी मैडमजी की.
आज मानिनी को अपनी हर उपलब्धि और रोबदाब अनुशासन मुंह चिढ़ाते नजर आ रहे थे. आज एक कर्नल की बेटी को लग रहा था कि जीवन की बिसात पर एक अदना सा प्यादा सुधा ने उसे चैक मेट कर दिया है.
शायद इसी हार से मानिनी को पति और बच्चों के दिल जीतने का रास्ते का भी आभास हो चुका था. मैडमजी अब अपने परिवाररूपी बगिया की सिर्फ मालिक नहीं एक माली बनने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी.
