Senior citizens : बुढ़ापा न तो सजा है न मुसीबत. अगर इस बात को समझ लें और आप के आसपास के लोग इस बात की गहराई को दिल और दिमाग से समझें तो बुढ़ापा सजा बनने के बजाए मजा बन सकता है. अगर बुढ़ापे के दौरान एनर्जी कम हो जाती है, कई बीमारियों का आगमन हो जाता है, तो यह एहसास हर उम्र के लोगों को अपनी बढ़ती उम्र के साथसाथ होता रहता है क्योंकि जैसे समय एकसा नहीं रहता, वैसे ही उम्र के साथसाथ बदलाव आना लाजिमी है.

उम्र कोई भी हो अगर शरीर कमजोर है, कोई इंसान मानसिक या शारीरिक तौर पर अस्वस्थ है, तो बीमारी और कमजोरी उस को घर कर सकती है. जैसे आजकल टैंशन, गलत खानपान, सुकून की कमी की वजह से जवान लोग भी उम्र से पहले ही बूढ़े हो रहे हैं और कई बीमारियों से घिरे नजर आते हैं, जिस के चलते कम उम्र में भी ऐसे लोगों की उम्र ज्यादा नजर आती है और वे जवानी में भी बूढ़े नजर आने लगते हैं.

लेकिन कई उम्रदराज लोग अच्छे खानपान और अच्छे स्वास्थ्य की वजह से जहां लंबे समय तक जिंदा रहते हैं, वहीं दूसरी ओर स्ट्रैस और कई बीमारियों के चलते 40 से 50 उम्र के करीब आते हार्ट अटैक से मर रहे हैं. छोटी उम्र के लोग भी ब्लड प्रेशर, थायरायड, डायबिटीज जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं.

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जिंदगी और मौत का भरोसा नहीं

हालांकि मौत और जिंदगी अपने हाथ में नहीं होती, लेकिन अच्छी तरह जिंदगी जीना हमारे हाथ में जरूर होता है. जैसेकि कई लोग कम उम्र में ही अपनेआप को बूढ़ा मान कर निराशा भरी जिंदगी जीने लगते हैं और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपनी बढ़ती उम्र को स्वीकार नहीं करते और हमेशा अपनेआप को जवान ही समझते हैं. जैसे फिल्मी कलाकारों की बात करें तो सलमान, शाहरुख, आमिर खान 60 की उम्र में न सिर्फ डांस, रोमांस और एक्शन कर रहे हैं, बल्कि आमिर खान जैसे स्टार्स 60 की उम्र में तीसरी शादी भी कर रहे हैं. वहीं 70 की उम्र के करीब अनिल कपूर, संजय दत्त आज भी लाखोंकरोड़ों फैंस के प्यार के चलते फिल्मों में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं.

मिसाल हैं ये

इसी तरह अमिताभ बच्चन जो 80 पार कर चुके हैं, वे अभी तक अभिनय कैरियर में सक्रिय हैं और उन से भी बड़ी उम्र के धर्मेंद्र ने मरते दम तक फिल्मों में काम किया.

कहने का मतलब यह है कि बुढ़ापा एक ऐसा एहसास है जो बढ़ती उम्र के साथ नहीं बल्कि गलत और निराशावादी मानसिकता और समाज द्वारा एहसास कराए जाने की वजह से ज्यादा महसूस होता है .

बढ़ती उम्र, बुढ़ापे में बेकार होने की भावना इंसान को बूढ़ा बना देती है. आप के अपने ही जो आप के सब से करीब हैं वे सहानुभूति दिखाते हुए इस बात का एहसास कराते हैं कि अब आप बूढ़े हो चले हो इसलिए आप किसी काम के नहीं रहे. आप को उस समान की तरह समझा जाता है, जो कोने में बेकार पड़ा रहता है और किसी काम का नहीं होता.

तय नहीं बाउंड्री

अगर इस मामले में विदेशों की बात करें तो वहां उम्र को ले कर कोई बाउंड्री तय नहीं होती. हमारे देश में जहां कार को भी कुछ सालों के बाद बेकार माना जाता है, वहीं विदेशों में मौल, होटल और प्राइवेट जगह पर उम्र को न देखते हुए पर डे यानि प्रतिदिन के हिसाब से काम दिया जाता है जबकि हमारे देश में रिटायरमेंट के बाद औफिस में रोजमर्रा काम करने वाला ऐंपलाई रिटायर होते ही पूरी तरह बेकार हो जाता है, सिवाय पैंशन की सहूलियत के कोई और ऐसी सुविधा नहीं होती जिसे पा कर बुढ़ापे में बिना किसी टैंशन के चैन की जिंदगी गुजार सकें.

देश में बुजुर्गों की हालत खराब

देश में बुजुर्गों के हालात पर अकसर चिंता जताई जाती है, लेकिन क्या बुजुर्गों को सम्मानजनक जिंदगी जीने के लिए  वे सब सुविधाएं दी जाती हैं जैसी कई विकसित देशों में बुजुर्गों के लिए उपलब्ध हैं ताकि उन का बुढ़ापा आराम और सम्मानजनक तरीके से गुजारे और उन को किसी पर निर्भर न रहना पड़े?

फिनलैंड जैसे स्केडिनेवियन इंडैक्स दुनिया में बुजुर्गों की देखभाल के लिए सब से आगे माने जाते हैं. जापान के अलावा फिनलैंड सब से ज्यादा बुजुर्ग आबादी वाले देशों में से हैं. यहां पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, सिक्योरिटी सिस्टम के कारण बुजुर्गों की लाइफ 84 वर्ष तक होती है. यहां पर 60 साल से अधिक उम्र का हर इंसान ओल्डएज पैंशन का हकदार है. इस के अलावा सिटी प्रशासन की ओर से बुजुर्गों को फिजिकल और सोशली ऐक्टिव रहने के लिए कई तरह के कदम उठाए जाते हैं. सरकार बुजुर्गों के घर पर हैल्थकेयर और मैडिकल चैकअप जैसी सारी सुविधाएं देती है.

इस के अलावा स्थानीय एजेंसियां उन के घरों की सीढ़ियां ऐसी डिजाइन करती हैं जहां पर बुजुर्ग आसानी से चल सकें और अपना जरूरी काम कर सकें. इस के अलावा पब्लिक ट्रांसपोर्ट में डिस्काउंट, जिमपार्क, म्यूजियम लाइब्रेरी, थिएटर में भी छूट का प्रावधान है.

ऐसी ही कई सहूलियतों के साथ विदेश के कुछ देशों में बुजुर्गों के लिए सम्माननीय और आरामदेह जिंदगी वहां पर उपलब्ध है.

गले की हड्डी

वहीं इस के विपरीत हमारे देश में बूढ़ा इंसान किसी काम का नहीं रहता. कुछ परिवारों के लिए वह गले की हड्डी जैसा बन जाता है जिसे न तो उगल सकते हैं और न निगल सकते हैं.

ऐसे में, अगर बुजुर्गो को ओल्डएज होम में भी रखा जाए तो वह किसी अनाथ आश्रम से कम नहीं होता.

बुरा व्यवहार

खबरों के अनुसार कुछ वृद्धाश्रम में बुजुर्गों के साथ बहुत बुरा व्यवहार होता है. उन को अफीम खिला कर, सुला कर और डायपर पहना कर व्हीलचेयर पर आंगन में सुला दिया जाता है और शाम को डायपर बदल कर खाना खा कर सुला दिया जाता है, ताकि स्टाफ को तकलीफ न हो और वे अपना काम आराम से कर सकें.

बुजुर्गों के अच्छे भविष्य के लिए सरकार और प्राइवेट एजेंसीज बिना अपनी जेब से खर्च किए भी मदद कर सकती हैं.

कोई नहीं सहारा

मुंबई जैसे बड़े शहरों में जहां पतिपत्नी अकेले रहते हैं या कोई बुजुर्ग बिना पति के या बिना पत्नी के अकेला रहता है, उन का कोई सहारा नहीं है, न ही पैसे हैं. बच्चे मांबाप को बोझ समझ कर साथ नहीं रखना चाहते या अगर उन को साथ भी रखते हैं तो उन के साथ बुरा व्यवहार करते हैं. तो ऐसे कई बड़ी उम्र के लोगों के लिए अगर सरकार और प्राइवेट एजेंसीज चाहें तो अपने तरीके से मदद कर सकते हैं, जैसे कि बिल्डर रीडेवलपमैंट वाली बिल्डिंगों में बुजुर्गों को ध्यान में रख कर ऐसे फ्लैट बना सकते हैं जिस में एक हिस्सा बुजुर्गों को ध्यान में रख कर बनाया जाए जो कम बजट के हों और उस में सीढ़ियां और फ्लोरिंग ऐसे हों जिस में बुजुर्ग अपनेआप अपना काम कर सकें यानि बुजुर्गों के लिए ओल्डएज होम जैसे ही कम बजट और काम स्क्वायर फीट के छोटेछोटे कमरे हों लेकिन वह ओल्डएज होम जैसे नहीं बल्कि इंडीपेंडेंट घर हों, जिन के दाम कम हों और जो बुजुर्ग बजट और इनकम के हिसाब से खरीद सकें.

जरूरी सुविधाओं की जरूरत

इन जगहों पर बूढ़ों के लिए जरूरी सहुलियते हों जैसे पार्क, इनडोर, आउटडोर गेम्स खेलने के लिए एक कमरा और बाहर आंगन. बुजुर्गों के लिए हिसाब से पार्टी क्लब जहां पर वे जमा हो कर मजाकमस्ती कर सकें. एक ही जगह पर 50-60 लोग एक ही उम्र के होंगे तो खुश भी रहेंगे और एकदूसरे का साथ भी देंगे.

री डेवेलपमेंट वाली बिल्डिंग में बिल्डर ऐसा 1 मंजिल या ग्राउंड फ्लोर बुजुर्गों के लिए अलाट कर सकते हैं जो 60 से ऊपर के लोगों को ही एलाट हो और आगे भी जो भी उस फ्लैट को खरीदे उस की उम्र 65 तक होनी चाहिए. ऐसी बिल्डिंग में सरकार की तरफ से कंसेशन में एक कमरा मैडिकल रूम का, 2-3 व्हीलचेयर और मैडिकल स्टोर्स की सुविधा करवा दे ताकि बुजुर्गों को समय रहते मदद मिल सकें.

खास बात यह है कि अगर ये फ्लैट्स बुजुर्गों को ही अलाट होंगे तो उन को कोई घर से बाहर नहीं निकाल पाएगा. इसी तरह जैसे दिल्ली शहर में पिंक औटो रिकशा लड़कियों के लिए बनाया गया है, उसी तरह बुजुर्गों के लिए भी एक अलग रंग के साथ सरकार रिकशा उपलब्ध करा सकती है, जिस में ऐप के जरीए रिकशा बुक करने की सुविधा हो. इस रिकशा को चलाने वाला भी बड़ी उम्र का ही आदमी हो जिसे आराम से रिकशा चलाने आता है और वह बरसों से रिकशा चला रहा हो.

सरकार चाहे तो ऐसे बुजुर्ग ड्राइवर को अलग से स्पैशल ड्राइविंग लाइसेंस बना कर दे सकती है जो सिर्फ बुजुर्गों तक ही सीमित रहे, जिस के तहत बुजुर्गों के लिए अलग रिकशा सर्विस शुरू की जा सकती है. ऐसे रिकशे का कलर भी अलग हो और चलाने और बैठने वाले दोनों ही बड़ी उम्र के हों.

ऐसे बुजुर्गों के लिए बनाए गए रिकशे के लिए परमिट और पार्किंग दोनों की सहुलियत हो क्योंकि बुजुर्गों के पास पैसे ज्यादा नहीं होते, उन के लिए सरकार खास रियायत बरते.

सरकार की जिम्मेदारी तय हो

सरकार ऐसे फ्लैट्स के लिए बिल्डरों को एक सहयोग दे सकती है कि वह ऐसे फ्लैट्स के लिए उतनी जगह एफएआर में नहीं गिरने की छूट दे दें तो ऐसे में बिल्डर का उतना पैसा नहीं होगा. बिल्डर को अपनी जेब से कुछ नहीं लगाना पड़ेगा और एफएआर की छूट मिलने के बाद बिल्डर को बुजुर्गों के लिए बनाए मकान को ले कर नुकसान भी नहीं होगा और कई सारे बुजुर्ग अपनी जमापूंजी से या बेटे की मदद से ऐसी जगह खुद का घर खरीद लेते हैं तो उन के लिए बहुत अच्छा हो जाएगा.

यहां पर मौजूद डाक्टर व नर्स अपनी उम्र के दोस्त होने पर बुजुर्ग भी अपनेआप को अच्छी तरह संभाल पाएंगे और किसी पर बोझ न बनते हुए सम्मानजनक जिंदगी जी पाएंगे.

जब सीनियर की बुकिंग में जीएसटी नहीं लगेगा तो फिर ईएमआई की किस्त अपनेआप ही कम हो जाएगी. सरकार स्पैशली बुजुर्गों के लिए भले ही खुद की जेब से पैसा न लगाए लेकिन जीएसटी हटा कर या बिल्डर को बुजुर्गों के लिए बनाए जाने वाले मकानों में जरूरी रियायतें दे कर जैसे मकान और हौस्पिटल की जमीन को एफएआर में न गिन कर मदद कर सकते हैं क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो अस्पताल और मकान का खर्चा अपनेआप ही काम हो जाएगा.

व्हीलचेयर की व्यवस्था

आजकल होटल, एअरपोर्ट, हौस्पिटल, रेलवे स्टेशन आदि में सरकार ने व्हीलचेयर की व्यवस्था की है. ऐसे में बाकी जगह भी खासतौर पर बुजुर्गों के लिए एफएआर न ले कर बाकी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं.

सरकार चाहे तो जिस तरह बच्चों और जवान लोगों के लिए मैकडोनाल्ड, केएफसी, कौफी कैफे और कई तरह के होटल उपलब्ध हैं वैसे ही बड़ी उम्र के लोगों के लिए भी ऐसे होटल का निर्माण कर सकती है जहां पर बुजुर्ग अकेले जा कर भी आराम से चिल कर सकें और अपनी पसंद का खाना खा सकें, जो बिना तेल, बिना तीखे मसाले और बिना सोडा वाला हलकाफुलका खाना हो.

सरकार ऐसे रेस्टोरैंट बुजुर्गों के लिए बना सकती है जिस में कुरसी, मेज और अन्य सुविधाएं भी सीनियर के हिसाब से हों. बुजुर्गों के बैठनेउठने की जगह पर हैंडल लगे हों ताकि उन को उठने और बैठने में तकलीफ न हो.

अगर मैकडोनाल्ड, केएफसी की तरह सरकार बुजुर्गों के लिए सिंपल रेस्टोरैंट भी उपलब्ध कराएगी तो बुजुर्ग वहां जा कर बैठना जरूर पसंद करेंगे.

जीएसटी में कटौती

गौरतलब है कि अगर सरकार या प्राइवेट एजेंसीज बुजुर्गों को ध्यान में रख कर मकान, होटल और अस्पताल की विशेष सुविधाएं देती हैं तो इस में न तो सरकार के जेब से पैसा जाएगा और न ही प्राइवेट एजेंसीज का. बस, ऐसी सहुलियतें देने के लिए लालच न करते हुए और बुजुर्गों को ध्यान में रखते हुए बस कंसेशन ही देना होगा जिस में सरकार और बिजनेसमैन को कोई नुकसान भी नहीं होगा और बूढ़े लोगों की जिंदगी संवर भी जाएगी, ठीक उसी तरह जैसे सरकार मंदिरों में, गवर्नमेंट स्कूलों में पूरी तरह छूट नहीं देती लेकिन टैक्स और जीएसटी में कटौती कर के सुविधा देती है, वैसे ही बुजुर्गों के लिए बनाई गई चीजों में भी कंसेशन दे सकती है.

इस बात को ध्यान में रख कर कि इस दौर से हरकोई गुजरता है चाहे फिर वह खुद हो या उन के मांबाप ही क्यों न हों, बुढ़ापा हर किसी को एक दिन आना है.

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