राइटर –  पूर्ति खरे

यों  तो यह सफर मैं कई दफा तय कर चुका था पर आज इंदौर से सागर तक का यह सफर बहुत सुहाना लगा रहा था. जुलाई महीने की रिम?िम बारिश बरबस तुम्हारी यादों को गीला कर रही थी. ट्रेन की खिड़की पर पड़ती बारिश की बूंदें आंखों को सुकून दे रही थीं. विदिशा के आसपास कहीं आउटर में ट्रेन रुकी तो छोटेछोटे बच्चों को बारिश में खेलता देख कर तुम से जुड़ी बचपन की वे यादें ताजा हो गईं…

वह भी ऐसा ही बारिश का एक मौसम था जब पापा का सागर ट्रांसफर होने पर हम नएनए सागर आए हुए थे. हलकीहलकी बारिश में लाल रंग की फ्रौक पहने तुम बारिश में कूद रही थीं और मैं उस अजनबी शहर में अपने लिए कोई दोस्त तलाशता हुआ दरवाजे से टेक लगा तुम्हें एकटक देखे जा रहा था. अपने बारिश के खेल से ध्यान हटा कर तुम ने मु?ो देखा तो मेरी ओर हवा में अपना हाथ हिला दिया. जब मैं ने भी धीरे से अपना हाथ हिलाया तो तुम दौड़ती हुई मेरे पास आ कर बोलीं, ‘‘नए आए हो क्या?’’

तुम्हारे सवाल पर मैं ने सिर्फ ‘हम्म…’ बोलते हुए सिर हिलाया तो तुम आगे बोलीं, ‘‘हमारे साथ बारिश में खेलोगे?’’

‘‘नहीं सर्दीजुकाम हो गया तो मम्मी डांटेंगी.’’

मेरे न कहते ही तुम मुंह चिढ़ाती हुई बोलीं, ‘‘लाइफ में ऐसे जोखिम लेने से डरोगे तो लाइफ में ऐंजौय कैसे करोगे?’’

मुझ पर हंसती हुईं तुम वापस जा कर बारिश में खेलने लगीं तो कुछ ही पल में कुछ सोचता हुआ मैं भी तुम्हारे पास आ गया. बस इसी तरह उस बारिश में बिना दोस्ती का कोई प्रस्ताव लिएदिए ही हम दोस्त बन गए.

ट्रेन में बैठा हुआ मैं तुम्हें याद करता हुआ मन ही मन मुसकरा ही रहा था कि

‘चायचाय…’ कहता हुआ चाय वाला पास से गुजरा तो उस से एक कप चाय ले ली. चाय की चुसकी और सुहानी सी बारिश तुम्हारी यादों के पन्नों को और जोर से खोलने लगी तो लाइफ का वह एक और बारिश वाला चैप्टर याद आ गया जिस बारिश में मैं सब से ज्यादा रोया था. हम कितने अच्छे पड़ोसी थे. अमन फैमिली की तुम और सोहन परिवार का मैं. हम दोनों में और हमारे पड़ोसी परिवारों में अच्छीखासी बनती थी. हमारी दोस्ती बहुत स्मूथली चल ही रही थी कि तभी इश्क नाम का वह कीड़ा मेरे मन में पनपने लगा जिस ने हम दोनों की दोस्ती को बरबाद कर दिया.

यह वह समय था जब मैं इंदौर से बीटैक कर रहा था और तुम सागर में अपनी पढ़ाई. मैं पढ़ाई की खातिर सागर से इंदौर चला तो गया

था पर तुम्हारे बिना वहां मन नहीं लगता था. कुछ रोज को इंदौर से सागर आया तो यह सोच कर आया कि अब की बार तुम से दिल की बात कह कर ही इंदौर जाऊंगा. अपनी छतरी को हाथों से घुमाती हलकी बारिश के बीच तुम. उस रोज कालेज से लौट रही थीं जब मैं ने तुम्हें 2 मिनट के लिए रोक कर बड़ी हिम्मत दिखा कर तुम से इस दुनिया के सब से जुदाई शब्द कहे, ‘आई लव यू नेहा.’

तो तुम मेरी बात पूरी हुए बिना ही मुंह फेर कर वहां से चली गईं. मेरी हां या न का उत्तर तो

दूर तुम ने तो मु?ा से बोलना ही छोड़ दिया. वह बारिश मेरी लाइफ की सब से बुरी बारिश थी जिस में मैं अकेला रोया था, अकेला भीगा था. तुम्हारा उत्तर अगर न भी होता तो भी मु?ो मंजूर था. प्यार सही न सही दोस्ती तो रह सकती थी हमारे बीच? पर तुम ने उस दिन के बाद कभी मु?ो पलट कर नहीं देखा. एक गहरी उदासी ले कर मैं इंदौर वापस आ गया.

तुम्हारे इस मौन के चलते मैं लंबे समय तक सागर नहीं लौटा. कुछ ही सालों में मेरी बीटैक पूरी हुई तो अपने लिए जौब तलाशता मैं बैंगलुरु पहुंच गया. कई इंटरव्यू देने के बाद भी जब जौब नहीं मिली तो कुछ दिनों के लिए मन बहलाने को मम्मी ने सागर बुला ही लिया. वह भी आज के सफर जैसा ही एक सफर था. मैं कुछ और सोचता कि चाय खत्म हो गई. चाय खत्म हो गई थी पर सफर अब भी बाकी था. बाकी के सफर में इयरबड्स लगा कर म्यूजिक सुनता हुआ मैं फिर खिड़की से बाहर देखने लगा.

‘‘रिमझिम रिमझिम, रिमझिमर भीगीभीगी रुत में तुमहम, हम तुम…’’ ‘1942 ए लव स्टोरी’ मूवी का यह प्यारा सा गाना फिर तुम्हारी यादें ले आया तो पिछला सफर याद आ गया. बिना जौब का मैं थकाहारा मम्मी के कहने पर मन बहालने को सागर आ तो गया था पर घर के पास ही पहुंचा तो देखा घर के बाहर काफी रौनक थी. घर के नजदीक ही पहुंचा तो महल्ले के रमन अंकल मिल गए, ‘‘क्या बात है बेटा क्या खूब दिन आया है. आज रमा आंटी की बेटी की सगाई है.’’

रमा आंटी की बेटी मतलब तुम? तुम्हारी सगाई? क्या इतना पराया हो गया था मैं नेहा कि तुम ने अपनी सगाई के बारे तक में मुझे कुछ नहीं बताया. खुद ही खुद से कई सवाल करता मैं सीधे घर पहुंच कर चुपचाप लेट गया.

‘‘रोहन, हाथमुंह धो कर जल्दी से तैयार हो जाओ, रमा आंटी के यहां सगाई में चलना है,’’ मम्मी बोली.

यह सुन कर मैं तुनक कर बोला, ‘‘मुझे कहीं नहीं जाना, थका हुआ हूं, सोने दो, आप

को जाना है तो जाओ.’’

‘‘कैसा लड़का है, बगल में सगाई है और यह यहां सो रहा है. प्रीति को पता चलेगा कि तुम यहां हो कर भी उस की सगाई में नहीं गए तो कितना बुरा लगेगा उसे.’’

‘‘प्रीति की सगाई है?’’ मैं एक दम से उठ कर बोला तो मम्मी बोलीं, ‘‘और क्या? तुझे

क्या लगा?’’

मम्मी के इस जवाब से मन को न जाने क्यों तसल्ली सी हुई, जबकि मुझे यह अच्छे से पता था कि नेहा की सगाई मुझ से तो नहीं होगी फिर भी आज उस की नहीं बल्कि उस की छोटी बहन प्रीति की सगाई है यह सुन कर मन को बड़ा सुकून मिला.

राखी आंटी ने मेरे आने की खबर सुनी तो स्पैशली उन्होंने मुझे सगाई में आने का बुलावा भेजा दिया. मैं भी तैयार हो कर उन के घर पहुंचा तो नेहा को देखते रह गया. गुलाबी रंग के शूट में, लंबे खुले बालों में कहर ढह रही थी वह. दूल्हे के दोस्त और उस के भाइयों की सब की नजरें नेहा पर थीं. नेहा भी सब से खूब हंसबोल कर बातें कर रही थी. यह सब देख कर मेरे मन में एक जलन सी हो रही थी. कुछ ही देर में सगाई हो गई. सब अपनेअपने घर लौटे तो मैं भी अपने घर लौट आया.

उस रात बारिश शुरू हुई तो राखी आंटी ने छत से आवाज दी, ‘‘रोहन बेटा जरा फटाफट

छत से सामान उठाने में मदद कराने के लिए आ जा.’’

आंटी की आवाज सुन कर मैं फुरती से अपनी छत पर चढ़ा और अपनी छत से ही सीधे उन की छत पर कूद गया क्योंकि हमारे घर आपस में जुड़े हुए थे. मैं फटाफट सामान नीचे उतारता गया. जब सारा सामान नीचे चला गया तब नेहा ने अकेले में छत पर मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘अब तक तुम्हारे सवाल का जवाब बाकी है रोहन.’’

मैं ने नेहा की तरफ आंखें उठा कर देखा तो वह मुझे अपनी तरफ खींच कर बोली, ‘‘शादी करोगे मुझ से?’’

मैं बेबाक एकटक उसे देखता रहा तो वह आगे बोली, ‘‘रोहन, मेरे पापा की डैथ के बाद मेरी और प्रीति की सारी जिम्मेदारियां मां पर आ गई थीं, ऐसे में तुम से कैसे कहती कि मुझे भी तुम से प्यार है. उस समय मुझे वह बात दिल में छिपानी ही ठीक लगी और तुम से सामना होने के लिए मैं इसलिए डरती रही कि कहीं तुम्हारे सामने आने से दिल की बात जबान पर न आ जाए. प्यार लाइफ का बड़ा जोखिम होता है रोहन. वह हमें बना भी सकता है और बिगाड़ भी.’’

‘‘लेकिन नेहा तुम ही तो कहती थीं कि लाइफ में जोखिम लेने चाहिए, फिर खुद ही डर गईं.’’

‘‘नहीं रोहन, जोखिम लेने से मैं कभी नहीं डरती, मैं ने अपने प्यार को हां और न से परे रखा इस से बड़ा जोखिम और क्या हो सकता है भला? ऐसे में तुम किसी और के भी तो हो सकते थे? मैं तुम्हें और तुम्हारे प्यार को खो भी तो सकती थी? इस से बड़ा जोखिम और क्या था मेरे लिए?’’

बारिश और तेज हो चली थी. हम दोनों उस प्यार की बारिश में जम कर

भीगे थे.

‘‘लो भाई आ गया सागर,’’ किसी यात्री के इन शब्दों ने मुझे तुम्हारे खयालों से बाहर निकाला तो मैं अपना बैग उठा कर ट्रेन से उतरने को हुआ ही कि तुम नीले रंग का शूट पहने आसमानी रंग की छतरी के नीचे मेरा इंतजार करती सागर स्टेशन पर खड़ी दिखीं. तुम्हारे हाथों की मेहंदी और मेरी आंखों की चमक यह साफ बयां कर रही थी कि हम दोनों एकदूजे के साथ कल की सगाई के लिए पूरी तरह तैयार हैं. कुछ ही देर में हम दोनों एक ही छतरी के नीचे आधे गीले आधे सूखे स्टेशन से बाहर जा रहे थे और तुम आज भी मुझे हमेशा की तरह ही बारिश की बूंदों सी प्यारी लग रही थीं.

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