Kahaniyan : आलोका  के मना करने के बावजूद निर्झरा मानी नहीं, उस के पति के घर चली ही आई.

‘‘इतनी तारीफ करी थी तू ने तो मुझसे रहा नहीं गया. शादी में तो तेरी पहुंची नहीं सकी थी. तेरे नए घर और प्यारे जीजाजी को देखने की तीव्र इच्छा भला कैसे मैं रोक पाती सो चली आई,’’ हाथ में लाल रंग के अपनी रोलिंग बैग से पकड़े वह मोबाइल से आलोका से बात करती झरने की तरह निर्बाध अंदर घुसी चली आई. आलोका को सामने पा कर व प्रसन्नता से खिल उठी और बैग को छोड़ उस ने लपक कर आलोका को कस के प्यार की झप्पी दी.

निर्झरा के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं. वह बिंदास आलोका के

अप्रत्याशित आगमन पर वहीं बैठे सुदीप के पेरैंट्स के सामने हैरान, कुछ परेशान सी हो उठी.

‘‘क्यों क्या हुआ तेरी तबीयत तो ठीक है? मुझअचानक देख कर अच्छा नहीं लगा क्या?’’

‘‘नहींनहीं ऐसी बात नहीं,’’ उस ने पलट कर सुदीप के पेरैंट्स को देखा वे उसे ही घूर रहे थे.

‘‘मम्मीपापा मेरी सहेली निर्झराहै…’’

‘‘नमस्ते आंटी. नमस्ते अंकल.’’

उन्होंने भी जवाब में सिर हिला दिया.

आलोका निर्झराको पैर छूने के लिए इशारे किए जा रही थी. सुदीप के पेरैंट्स पुराने जमाने की सोच वाले दोगले किस्म के लोग थे. वैसे तो उन्हें भी हर आधुनिक चीज चाहिए पर बिहेवियर वही 15वी सैंचरी का हो.

‘‘यार तू बहू है मैं तो बेटी हुई… पर चल तेरे लिए.’’ उस ने स्फुट स्वर से कहा और फिर उस ने पैर छू लिए.

‘‘सौभाग्यवती भव का ब्लैसिंग नहीं देना आंटी आप दोनों… मुझबस सदैव खुश व सेहतमंद रहने का आशीष दें,’’ वह खिलखिला उठी.

उन को चुप देख कर वह बोली, ‘‘आंटीअंकल वह क्या है न, मैं ने इतने से जीवन में बहुत सौभाग्यवतियां देखी हैं कि तबीयत हिल गई. उन्हें उन के पतियों और ससुराल वालों ने उन्हें दुर्भाग्यवती बना कर रखा हुआ है परंतु दुर्भाग्यवश ऐसे पतियों के जीवित रहने तक वे दुर्भाग्यवतियां सौभाग्यवतियां ही पुकारी, सम?ा जाती हैं, जबकि होता एकदम उलटा है. व्हाट ऐन आयरनी. अच्छा है आप लोग उन में से नहीं हैं. आलोका तो तारीफ करते नहीं थकती आप लोगों की… तभी तो पहले सब से मिलने आ गई,’’ कह कर वह मुसकराई.

‘निर्झराकितनी बोलती है. उन की अजीब नजरों को सहमी सी आलोका सम?ा रही थी.

निर्झराको इशारा करते हुए सुदीप की मम्मी ने कहा, ‘‘बैठो और आलोक जा कर ब्रेकफास्ट का इंतजाम करो. पहले माधव के साथ पानी भिजवा दो इस के लिए,’’ कहते हुए सीरियस चेहरे पर तनिक भी स्माइल न थी निर्झराने यह देखा था. सरप्राइज भी हुआ. उन का बिहेवियर कुछ रूखा सा लगा.

‘‘कहां रहती हो… क्या नाम बताया?’’

‘‘नि?र्ारा… मेरठ.’’

‘‘पूरा नाम?’’

‘‘निगम’’

‘‘हम शर्मा ब्राह्मण हैं, हम तो बस ब्राह्मणों

में ही शादी करते हैं ऊंचे कुल में, तुम तो कायस्थ हो न… शादी हो गई तुम्हारी?’’ सुदीप की मां

ने अपनी जातिगत सुपीरियरिटी अनाउंस करते हुआ कहा.

‘‘जी अभी नहीं,’’ ‘अजीब ही हैं आप शर्मा हैं, ब्राह्मण हैं, मैं कायस्थ तो इस बात का ढोल बजाया जाए?’ मुंहफट निर्झराअपने को संभालते हुए बुदबुदाई.

‘‘फैमिली में कौनकौन है?’’

‘‘पापामम्मी और एक भाई,’’ ‘बाप रे पूरा इंटरव्यू ही ले कर रहेंगे ये लोग’ वह उकताने लगी.

‘‘आलू… आलू… कहां है तू? कहां चली गई,’’ निर्झराने पुकारा था. आलू पुकारने पर मातापिता उसे हैरानी से देख रहे थे.

निर्झराआलोक को आलू कहती थी. वह उठ खड़ी हुई, ‘‘मैं देखती हूं उसे. वाशरूम भी जाना है… उधर है?’’ उस ने पूछा मगर जवाब से पहले उस ओर बढ़ चली. ट्रे थामे आ रही आलोका टकरातेटकराते बची.

‘‘यार आलू ये हैं तेरे बड़े… पेरैंट्स… कैसी रहती है तू. लग रहा है कोई इंटरव्यू

देने आई हूं. बता आलू, वाशरूम कहां है.’’ वह धीरे से बोल कर मुसकराई. आलोका ने आंखों के इशारे से बता दिया.

‘‘आलोका कहां मस्त हो… कुछ सुनाई पड़ रहा है? 4 दिन आए नहीं हुआ न जाने क्या जांचपड़ताल करती रहती है मेरे सामान की, लव लेटर ढूंढ़ना चाहती हो क्या? मेरा सामान छूती ही क्यों हो भला? मेरी ब्लू फाइल कहां है?’’ तभी आलोका का पति सुदीप चीखता हुआ बाहर आ गया और साथ ही निर्झरावाशरूम से…

निर्झरा… ये…’’

‘‘मैं… मैं समझ गई परिचय कराने की जरूरत नहीं. जीजाजी राइट,’’ उस ने उस के रूखे बोलों से अंदाज लगा लिया था.

‘‘माईसैल्फ निर्झरा… जीजाजी आलू की पक्की सहेली बचपन से एमबीए तक की फ्रैंड.’’

उस ने सोफे की बगल में रखे उस के बैग को देखा.

‘‘घबराइए नहीं जीजाजी ज्यादा दिन ठहरूंगी नहीं यहां,’’ कह निर्झराहंसी. ‘‘क्या करती मुझआप के शहर ने एक बढि़या जौब दे कर बुला लिया तो खिंची चली आई. सोचा पहले अपनी आलू और आप सब से मिल लूं, बड़ी तारीफें सुनी थीं आलू से आप सब की.’’

‘इसे बताया नहीं कि यहां तुम्हें सिर्फ आलोका नाम से ही पुकारा जाता है आलू, कद्दू कहना किसी को अच्छा नहीं लगता. ऐसा भी कोई नाम रखता है भला,’ सुदीप मन ही मन बुदबुदाया फिर बोला, ‘‘अच्छा, आप मांपापा के पास बैठो, चायवाय पीयो और तुम आलोका पहले मेरी अभी के अभी ब्लू फाइल ढूंढ़ कर दो. मेरी चीजें छूती ही क्यों हो? न जाने क्या ढूंढ़ना चाहती हो?’’ सुदीप ने आलोका को बादशाह की तरह हुक्म दिया हो जैसे.

आलोका ट्रे रख तुरंत फाइल ढूंढ़ने चली गई.

‘वाहवाह जिल्ले ईलाही क्या रोब है.’ मन हुआ था निर्झराका कि ताली पीट कर दाद दे दे पर शान में गुस्ताखी हो जाएगी जनाब के यह सोच कर चुप रही. सोफे पर बैठ कर उस ने उस की रिप्ड स्टाइलिश जीन्स को घूरते मांबाप को देखा और टेबल पर रखा गिलास का सारा पानी गटक लिया.

तभी सलवारकुरते में किसी महिला ने प्रवेश किया. निर्झराको समझते देर न लगी

कि वह आलू की ननद मोहिनी जीजी है.

वह अपने बालों का जुड़ा बनाते हुए उस की बगल में आ बैठी.

‘‘नमस्ते जीजी मैं निर्झराआ… आलोका की परम मित्र.’’

‘‘अच्छाअच्छा, हमें पहले कभी बताया तो  नहीं आलोका ने पक्की दोस्त हो तो बताना चाहिए था.’’

‘‘हां यह तो बड़ी भारी मिस्टेक हो गई उस से,’’ निर्झरामुसकराई.

‘‘ऐसी कटीफटी जींस हमारे यहां तो कोई नहीं पहनता… खैर, अपनेअपने फैशन का चलन… हमें क्या? कैसे आना हुआ?’’ उन का सपाट स्वर था.

‘‘वह शादी में आ नहीं पाई थी, इस शहर आई तो सोचा चल कर पहले मिल आती हूं दोस्त से… आप सब से.’’

‘‘कोई रिश्तेदार नहीं है तुम्हारा यहां? ठहरने आई हो? पहले ही बता दूं यहां 4 ही बैडरूम हैं. मु?ा से तो बैड शेयर नहीं किया जाता,’’ उन्होंने अपना भारीभरकम शरीर दिखाते हुए कहा, ‘‘और एक गैस्टरूम में आरंभ, हमारे चचेरे भाई, उस ने डेरा जमा रखा है.’’

‘‘नोनो आप चिंता ना करें मुझकंपनी ने फ्लैट भी दिया है. आलू सौरी आलोका का घर रास्ते में था सो पहले… अभी तो 11 ही बजे हैं 3-4 बजे तक आराम से पहुंच जाऊंगी… कल जौइन भी करना है.’’

आलोका चायनाश्ता सब ले आई थी.

‘‘नहीं यार तू तो खातिरदारी में लग गई. फाइल मिली या नहीं तेरी?’’

‘‘हां… वहीं सामने ही थी,’’ कह आलोका ने मांपापा को चाय के कप थमा दिए.

‘‘जीजी आप भी लो मुझमालूम नहीं था कि आप सो कर उठ आई हो,’’ कह उस ने निर्झराका कप उन्हें थमाते हुए कहा, ‘‘मैं इस के लिए और बना लाती हूं.’’

‘‘हां लाओ दो, मुझतो उठते ही चाय चाहिए होती है, पर याद रखना इतने छोटे कप मैं नहीं पीती, पहले भी बताया था,’’ और वह सैंटर टेबल पर आराम से पैर फैला कर बैठ गई थी.

आलोका को विचित्र सी स्थिति में फंसा देख निर्झराने ?ाट बात संभाली, ‘‘अरे तू बैठ बात कर. कर ली खातिर बहुत… चाय, कौपी कोल्ड ड्रिंक कुछ नहीं चाहिए. खाती हूं न ये गरमागरम पकोड़े, चाय नहीं पीनी,’’ और निर्झराने आलोका का हाथ पकड़ कर पास बैठा लिया.

फिर उस ने पकौड़े खाए और पानी पी कर ?ाट उठ खड़ी हुई, ‘‘ठीक है आलू अभी

चलती हूं, फिर आराम से मिलूंगी. थोड़ी जल्दी है. औफिस का बंदा फ्लैट पर चाबी ले कर वेट कर रहा होगा. नमस्ते जीजी, नमस्ते अंकलआंटी,’’ कह कर निर्झराने पैर छुए और बैग के साथ बाहर निकल ली.

‘‘देख यह है मेरा पता आलू मैं व्हाट्ऐप कर दूंगी. यहां से ज्यादा दूर नहीं है. मैं मिलती रहूंगी तु?ो, ऐसा कैसे चल सकता है. सब के साथ अपना भी खयाल रखा कर. अजीब ही है इनलाज… तेरी लाइफ तो दमघोटू है. कोई अपनापन नहीं दिखता किसी में.’’

‘‘इसलिए तुझयहां आने को मना कर रही थी मैं कि तुझे दुख होगा.’’

‘‘तो सच क्यों नहीं बताया मुझफोन पर?’’

‘‘क्या बताती, पहले कुछ दिखाया बाद में कुछ और निकला… हो क्या सकता है अब?

7 फेरे लिए हैं. मांपापा भी हैरानपरेशान. सच कहूं तो अब बहुत पछतावा भी हो रहा है उन्हें कि उन्होंने केवल अपनी जातिबिरादरी और खानदान की इज्जत के लिए तेरे भेजे अपने भाई के रिश्ते को ठुकरा दिया.’’

‘‘और तू भी मान गई जबकि तू भी नीलेश दा के जैसे उन को प्यार करती थी. मैं जानती थी तभी तो मम्मी मेरे जिद करने पर तेरे रिश्ते की बात करने तेरे घर गईर् थीं. तेरी मम्मी भी बहुत खुले विचारों की तेज लेडी हैं. हर हाल में सब को तैयार कर लेतीं पर तू भी न एक ही है. एक बार मांबाप ने कह दिया तो मान गई. कुछ बोला क्यों नहीं. कौन कहेगा तू आज के जमाने की पढ़ीलिखी एमबीए लड़की है. पूरी डपोरचंद है… तेरी वजह से निलेश दा भी अभी तक सभी रिश्तों के लिए न ही किए जा रहे हैं. अच्छा चलती हूं. ओके. अपना खयाल रखना,’’ उस ने गले लग कर कस कर ?ाप्पी ली. दोनों की आंखें नम थीं और मन भारी. निर्झराकी टैक्सी आ गई थी. तभी आरंभ आता दिखाई दिया.

‘‘ये कौन जनाब? वही कजन?’’

‘‘हां… आरंभ. यह मेरी बचपन की पक्की सहेली निर्झराहै जो यहां ट्रांसफर पर आई है और निर्झराये सुदीप के कजन आरंभ जो नियुक्ति के पथ पर हैं,’’ कह कर आलोका मुसकराई.

‘‘मतलब ऐग्जाम की तैयारी कर रहे हैं. राइट? गुड लक. मी नि?र्ारा,’’ उस ने हाथ मिलाया.

‘‘नियुक्ति पर मतलब लथपथ अग्निपथ अग्निपथ. निर्झरा…

जी.’’ वह जानबूझ कर अटकते हुए बोल कर मुसकराया, ‘‘मी आरंभ.’’

‘‘नाइस मीटिंग. चल निर्झराकुछ तो ताजा सी हवा महसूस हुई यहां,’’ उस ने फिर आलोका को संबोधित किया.

‘‘अच्छा डौंट वरी आलू यार मेरे होते हुए तुझउदास होने की जरूरत नहीं, होने को अभी भी बहुत कुछ हो सकता है. कुछ मिल कर सोचते, करते हैं…’’ वह फिर मुसकराई. ने हाथ हिला कर बाय किया और कैब में बैठ गई.

निर्झराआतीजाती रही और कभी आलोका भी आरंभ के साथ निर्झराके फ्लैट पर पहुंच जाती. तीनों की खूब छनने, बनने लगी. आलोका दमघोटू वातावरण से निकल कर खुली हवा में चैन से सांस ले पाती. उसे हंसतेबोलते देख आरंभ को भी बहुत अच्छा लगता कि ‘कहां वह दबीसहमी घर में कैदी सी आलोका भाभी यहां आजाद सी बिलकुल अलग खिलखिलाती कितनी नौर्मल दिखती है. उस ने मन की बात सा?ा की.

‘‘समझ नहीं आता इतनी हंसमुख आप से सुदीप इतना रूखारूखा क्यों रहता हैं. 2 महीने की शादी हो गई. अभी कहीं घूमने भी नहीं गए. बस चिड़चिड़ा सा औफिस का काम किए जा रहा है.’’

‘‘कोई तो कारण होगा ही. शादी नहीं करनी चाहिए थी फिर उन्हें. इस से बढि़या तो पत्नी के बजाय कोई नौकरानी ही रख लेते. मुझभी उन का व्यवहार आलू के प्रति कभी सही नहीं लगा,’’ निर्झराने सहमति प्रकट की.

कुछ दिनों में आरंभ अपने ऐंट्रैंस टैस्ट में सफल गया. उस ने हाई स्कोर किया. कई बढि़या कंपनीज में अप्लाई किया. निर्झराने उसे अपनी कंपनी में भी अप्लाई करने का सु?ाव दिया.

‘‘अरे वह तो इतनी बड़ी कंपनी है?’’

‘‘देखो वैकैंसी भी है अप्लाई करने में क्या हरज है?’’

‘‘चलो ठीक है निर्झरामैडम.’’

‘‘वैकैंसी बौस की है क्या पता मेरे बौस ही बन जाओ. फिर मैं कहा करूंगी आ… आ… रंभ सर’’ और वह हंस पड़ी.

‘‘घीशक्कर तुम्हारे मुंह में.’’

‘‘ओह नो… शोगुल्ला,’’ वह मुसकराई.

‘‘डन.’’

कुछ ही दिनों बाद निर्झराको अपनी सहकर्मी से पता चला कि उस की एक सहेली

ज्योति को उस के औफिस के सुदीप नाम के उस के बौस ने छला है और दूसरी से शादी कर ली मजे से. सुदीप नाम सुन कर उस का माथा ठनका. उस ने आरंभ से बताया तो उस ने सुदीप के औफिस से पता किया. बात सही थी. सुदीप का अपने औफिस में ज्योति नाम की एक विजातीय लड़की से संबंध रहा है पर मांबाप की रूढि़वादिता के कारण उस की उस से शादी नहीं हो सकी. उसे मातापिता के दबाव में अपने जैसे ब्राह्मण परिवार की बेटी आलोका से विवाह करना पड़ा.

सुदीप ने ज्योति को बहुत समझया. गर्भपात के लिए भी जोर दिया. पैसों से भी मदद करनी चाही पर ज्योति ने साफ इनकार ही नहीं किया बल्कि स्पष्ट शब्दों में कह दिया वह जी ले अपनी जिंदगी परंतु वह कायर नहीं वह स्वयं घरपरिवार. समाज से लड़ना भी पड़े तो वह अपने बच्चे को जन्म देगी. अपने दम पर पालेगी बड़ा करेगी. वह आज भी औफिस आती है सब को पता है सुदीप की करतूत.

नि?र्ारा, आरंभ यह सब जान कर स्तब्ध

रह गए. वह आलोका से कुछ भी कहने के पूर्व सुदीप के मुंह से पूरी सचाई सुन लेना चाहती

थी. फिर एक दिन निर्झराने सुदीप को अकेले में घर लिया, ‘‘सारा रोब पत्नी पर है समाज से टकराने की हिम्मत नहीं आप में, जब प्यार

करते समय जाति नहीं देखी तो उसी से विवाह करना चाहिए था आप को. उसे उस के हाल

पर छोड़ कर आलोका से ब्याह रचा कर आप ने 3-3 जिंदगियां बरबाद करीं… न आप खुश हैं नहीं आलोका खुश है और न जिसे छोड़ा वह ज्योति ही खुश है.’’

‘‘तुम उसे कैसे…’’ सुदीप हैरान था.

‘‘वह सब छोडि़ए. उस बेचारी का तो घर में जीना हराम हो गया. आप ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा पर वह बेचारी बन कर नहीं आज हिम्मत से सब के सामने खड़ी है. आज भी स्वाभिमान से औफिस आ रही है. आप को शर्म आनी चाहिए. आप ऐसे उसे छल कर, अब खुद को तनाव में रख कर, ग्लानि या क्रोध में, अपनी पत्नी आलोका या अपने पेरैंट्स को भी कैसे खुश रख पाएंगे? यह आप को पहले ही सम?ाना चाहिए था. इसी कारण आप चिढ़ेचिढ़े से रहते हो. आप का सारी फुस्ट्रेशन, क्रोध फिर आलोका पर निकलता है. वह आप से सौभाग्यवती नहीं बल्कि आप से दुर्भाग्यवती ही है. आप से मिलने से पहले वह सौभाग्यवती थी क्योंकि सामने अच्छा कैरियर था, प्यार और इज्जत देने वाले अच्छेअच्छे रिश्ते थे.

जमाना कहां निकल गया और आप न जाने किस सदी

में भटक रहे हैं. कुदरत माथे पर टैग लगा के नहीं पैदा करती कि यह ब्राह्मण है वह क्षत्रिय या वह शूद्र होगा. पर पुश्त दर पुश्त जाति बना कर उन का यही कर्म बना देना बहुत अनुचित निर्णय रहा उन का. सभी को समान अधिकार मिलने चाहिए. क्या आप को ऐसा नहीं लगता?’’

‘‘वाहवाह क्या लैक्चर दिया है तुम ने,’’ आरंभ तालियां बजाते हुए पास आ खड़ा हुआ.

‘‘मैं अब क्या कर सकता हूं?’’ सुदीप ने हताशा से कहा.

‘‘बस आलोका से तलाक,’’ निर्झराका स्पष्ट उत्तर था.

‘‘व्हाट? बच्चों का खेल है?’’

‘‘आप ने तो यही सम?ा कर खेला है. अब मैच्योर दिमाग से काम लीजिए. आप आलोका को कभी दिल में वह स्थान नहीं दे पाएंगे जिस की एक पत्नी अधिकारिणी होती है. मातापिता

या जाति, खानदान के विषय में सोचना था तो

सब कुछ करने से पहले सोचना था. तो बेहतर यही है आप आलू को तलाक दीजिए और उस बेचारी ज्योति को विवाह कर घर ले आइए. यह आप के, उस के अजन्मे बच्चे की पूरी जिंदगी का सवाल है.’’

‘‘आलोका तैयार होगी इस के लिए?’’

‘‘क्यों नहीं, वह एक सुल?ा हुई क्वालिफाइड लड़की है. लीजिए आप खुद ही

पूछ लीजिए…’’

आलोका ने आरंभ के साथ ही कमरे में प्रवेश किया था. वह हत्प्रभ सी पीछे खड़ी थी.

‘‘सौरी. मैं तुम्हारा गुनहगार हूं आलोका,

मैं जान गया हूं ज्योति के साथ अन्याय कर के

मैं कभी खुश नहीं रह सकता न ही किसी को

खुश रख सकता हूं. अब जब तुम सबकुछ जान चुकी हो तो क्या तुम मुझ से तलाक के लिए तैयार हो?’’

‘‘अगर विवाह बंधन के बाद पतिपत्नी में से एक भी कहीं और समर्पित है तो विवाह जैसे रिलेशन का कोई मूल्य नहीं रह जाता ऐसे में अलग हो जाना ही बेहतर है,’’ आलोका का शांत स्पष्ट उत्तर था.

‘‘तुम ने मेरी उझन सुलझा दी थैंक्यू,’’ उस ने हाथ जोड़े थे.

‘‘थैंक्यू सुदीप भाई अब सही जा रहे हो.

हम साथ मिल कर आप की असली सौभाग्यवती को लाएंगे. अब मुसकरा भी दो. देखो आलोकाजी भी जबरदस्ती के बंधन की मुक्ति से खुश हैं,’’ आरंभ मुसकराया.

‘‘तो फिर ठीक है तय हो गया. जब तक तलाक नहीं हो जाता, आलू मेरे साथ रहेगी. आप बस ज्योति और अपने अजन्मे बच्चे के विषय में सीरियसी सोचिए और सोचिए मातापिता को कैसे डील करना है?’’

‘‘इसी में सब की भलाई है. ठीक है फिर मैं आती हूं कल. आप सामान तैयार रखने में, घर से निकलने में आलोका की मदद करिएगा. मैं इसे ले जाऊंगी,’’ निर्झराने कार्यक्रम बता दिया.

वह वादे के अनुसार अगले दिन एक टैंपो ले कर पहुंच गई. सुदीप के पेरैंट्स बाहर गए थे.

‘‘चल आलू,’’ निर्झराने आलोका का सामान बैग आरंभ की मदद से टैक्सी और टैपों में रखवा दिया.

‘‘चलें?’’

‘‘पेरैंट्स के आने का टाइम है… इंतजार कर लेती हूं.’’

‘‘यह काम तो सुदीपजी पर छोड़ो. वह देखो दूर चुपचाप खड़े हैं. उन को ही हम

लोगों के जाने के बाद हिम्मत कर के स्वयं सब सच कहना पड़ेगा. यदि वे ज्योति को स्वीकार नहीं करते तो फिर यह सम?ा सकते हैं कि तब ज्योति के साथ अलग घर बसाने में इन्हें अब क्या परेशानी है? पेरैंट्स की केयर अलग रह कर भी की जा सकती है. फिर उन के साथ इतनी वयस्क उन की बेटी मोहिनी भी तो हैं, उन्हें भी अपने मातापिता और घर के प्रति अपने कुछ टास्क अब सम?ाने ही चाहिए.’’

‘‘हां ज्योति से विवाह के बाद आलू तू अंकलआंटी का एक असली सौभाग्यवती बन आशीर्वाद लेना.’’ निर्झराने जोड़ा.

‘‘दुर्भाग्यवती बने रह कर सौभाग्यवती का नकली आशीष किस काम का?’’ निर्झराका आशय आलोका की हार्दिक इच्छा, उस की पढ़ाई की सार्थकता, उस का कैरियर और उस के नीलेश दा के साथ आलोका के विवाह से था, जिसे उस की आलू ही अच्छी तरह समझ रही थी.

‘‘बिलकुल पते की बात कही तूने निर्झरा, सुदीप की असल सौभाग्यवती तो ज्योति ही है,’’ आरंभ ने कहा.

‘‘हां तो चलो. आरंभ इस प्रक्रिया का शुभारंभ करो शीघ्र… सामान रखवाओ, इस से पहले कि अंकलआंटी आ जाएं,’’ निर्झराने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जो हुक्म मैम नि..र..?र्ारा,’’ उस ने सिर झुका कर हाथ अपनी छाती पर रखा और फिर हंसते हुए सामान रखवाने लगा.

आरंभ को वास्तव में निर्झराके बौस की ही नौकरी मिल गई थी. आरंभ ढेर सारे पेस्ट्रीज ले कर निर्झराके फ्लैट पहुंच गया.

‘‘इतने सारे… हो गया तुम्हारा सलैक्शन? कहां?’’

‘‘देखो तुम्हारी जबान कितनी सच्ची थी… मेरा सलैक्शन हो गया अब, मैं बौस हूं तुम्हारा, यह सारा का सारा ले लो,’’ कह कर आरंभ हंसने लगा.

‘‘सच्ची?’’ वह चीखी, ‘‘ऐक्सलैंट,’’ कहते हुए उस से लिपट गई.

‘‘होल्ड… होल्ड. अब तो लगता है आंटीअंकल को एक और ?ाटके के लिए तैयार होना पड़ेगा,’’ आलोका ने छेड़ा.

‘‘सौरी,’’ निर्झरा?ोंपते हुए आरंभ से अलग हो गई. प्यार अंकुरित तो हो चुका था, यह आज दोनों ने स्वीकार किया पर समस्या इन के साथ भी वही थी दूसरी जाति में विवाह के लिए परिवार को मनाना. पर मनाना तो पड़ेगा ही. आज नहीं तो कल यह रूढि़वादिता टूटनी ही है.

‘‘किस सोच में गुम हो नि?र्ारा? फोन उठा. कब से बज रहा है तेरे बैडरूम में,’’

आलोका ने ध्यान तोड़ा तो वह भागी कमरे में गई.

‘‘आलू… नीलेश दा का फोन था, हमारी सारें समस्या का समाधान. कल मां यहां आ रही हैं ले कर… क्या?… आलू… तेरा जौइनिंग लैटर, नीलेश दा की कंपनी में. घर में और उन के

दिल में,’’ निर्झराखुशी से चीखते हुए बोली और पास आ कर आलोका का हाथ पकड़ उसे गोलगोल घुमा दिया. खुशी में आरंभ के हाथ में पकड़े डब्बे से सारी पेस्ट्री उस के दिल की तरह बाहर निकलने को बेताब थी. उस ने शीघ्रता से डब्बे का ढक्कन खोल दिया. अब यहां कोई दुर्भाग्यवती नहीं बल्कि 3-3 बनी सौभाग्यवतियां एकसाथ, वह भी अपने दम पर, ज्योति, आलोका और निर्झरा.

राइटर : डा. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू

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