Hindi Story : तीखे  नैन नक्श, काले लंबे बाल, रंग गोरा होने से रुचि भीड़ में भी अलग ही दिखाई दे जाती थी. हरकोई उस से बात करने को लालायित रहता. रुचि खुले बालों में जब भी औफिस जाती तो उस के सहयोगियों की नजरें हटाए नहीं हटतीं.

मायके में मां अकसर रुचि के खुले बाल देख कर उसे डांटतीं, ‘‘रुचि तुम्हें सम?ा क्यों नहीं आता… गुरुजी ने कितनी बार समझाया है कि खुले बालों में कोई भूतप्रेत लग जाएगा,’’ उन्होंने उस के बालों में रबड़बैंड लगा दिया.

रुचि ने बचपन से ही श्मशान में भूतपिशाच, आत्माएं रहती हैं. इस तरह की बातें और कहानियां सुन रही थीं. उसे श्मशान वाले रास्ते से हमेशा डर लगता था. पढ़ाई के दौरान कालेज के बाद घर पर ही रहती. अगर कोई दोस्त रात पार्टी को बोलते तो वह तुरंत मना कर देती थी.

कहते हैं जिस चीज से हम डरते हैं अकसर वही डर हकीकत बन कर सामने आ जाता है.

रुचि सुबह औफिस जाती तो कई बार श्मशान के सामने चौरहे पर जादूटोना, तंत्रमंत्र किए नीबू, लाल कपड़ा आदि सामग्री अकसर उसे रास्ते में दिख जाती थी. उसे देख वह डर जाती. रास्ते में पड़ी उस तंत्र सामग्री से दूर हो कर भगवान का नाम लेते हुए जाती थी. अगर उसे औफिस से घर आने में देर होती तो उस की सांसों की गति बढ़ जाती. मगर क्या कर सकती थी? उस की मजबूरी थी क्योंकि दूसरा रास्ता बहुत लंबा था.

जब रुचि की शादी हो रही थी तब भी उस की मां ने उसे कई हिदायतें दी थीं. हलदी लगने के बाद घर से नहीं निकलना, पेड़, नदी के पास नहीं जाना, शाम में बाल खोल कर नहीं रहना.

रुचि जब भी मां से इन के बारे में पूछती तो मां यही कहतीं, ‘‘विवाह के दौरान भूतप्रेत, आत्माएं लग कर परेशान करती हैं.’’

यह सुन रुचि हमेशा डर जाती. शादी होने के बाद रुचि अपने ससुराल आई. शादी को 2-4 दिन ही गुजरे थे, कि उसे कभी दोपहर में तो कभी शाम में कुछ अजीब सी बदबू आती, एक दिन वह सासूमां से बोली, ‘‘आप को कुछ अजीब सी बदबू आ रही है क्या?’’

‘‘नहीं मुझे तो नहीं आ रही है.’’

यह जवाब सुन कर रुचि चुप रह गई.

शादी में आई बूआ, मामी, काकी सास सभी अब अपनेअपने घर जा चुके थे, उस की शादी की थकान भी अब उतर गई थी. एक दिन शाम के समय वह कपड़े उतारने छत पर गई तो दूर उसे कुछ जलता हुआ दिखाई दिया. वह नीचे आ कर अपने काम में लग गई. कुछ दिनों बाद उस के औफिस से ट्रांसफर लैटर भी आ गया. पहले दिन तो उसे औफिस पति रमेश ने छोड़ दिया.

औफिस से शाम में जब रुचि पैदल घर आ रही थी, उस के घर से करीब 2 सौ मीटर पहले. उसी रास्ते पर एक ओर बड़ा सा गेट लगा था. गेट के ऊपर बडे़बड़े अफसरों में ‘मुक्तिधाम’ लिखा हुआ था. वह देख डर गई, उस ने अपनी चलने की गति तेज कर दी.

उसे पहली बार पता चला कि उस का घर श्मशान से इतना नजदीक है. उस की दिनचर्या घर और औफिस तक ही थी. उस के अच्छे काम की वजह से उसे औफिस में प्रमोशन दी गई. वह बहुत खुश थी. औफिस की छुट्टी होते ही वह खुशीखुशी घर पहुंची. मां और रमेश को प्रमोशन की बात बताई. सभी खुश हो कर बोले, ‘‘वाह मैनेजर मैडमजी…’’

रमेश बोला, ‘‘आज तो पार्टी बनती है मैडमजी.’’

‘‘बताओ कहां चले?’’ रुचि ने पूछा.

‘‘थोड़ी ही दूरी पर एक नया रैस्टोरैंट खुला है वहीं भोजन कर के घर आ जाएंगे.’’

सभी को यह सु?ाव अच्छा लगा. सभी डिनर करके लोट रहे थे. तभी श्मशान के पास गाड़ी खराब हो गई. रमेश गुस्सा होते हुए बोला, ‘‘अरे यार, इसे भी अभी खराब होना था. थोड़ी दूर और चल जाती तो क्या हो जाता.’’

‘‘कुछ नही बेटा, थोड़ी दूरी पर ही घर है. अगर स्टार्ट नहीं होती तो पैदल ही चलते. गाड़ी सुबह मैकैनिक को बुला कर सही करा लेना.’’

रमेश ने गाड़ी स्टार्ट करने की बहुत कोशिश की किंतु नही हुई. रुचि के मन में तरहतरह के डरावने विचार आने लगे कि कहीं कोई आत्मा ने तो बंद नही कर दी गाड़ी. शायद कोई आत्मा अचानक गाड़ी के सामने आ गई हो, जिस से खुदबखुद गाड़ी बंद पड़ गई हो. वह गाड़ी के अंदर बैठेबैठे सोच रही थी.

मां बोलीं, ‘‘चलो पैदल ही चलना पड़ेगा, कब तक बैठे रहेंगे.’’ यह सुन रुचि गाड़ी से नीचे उतर गई और सभी पैदल चलने लगे. रमेश ने मोबाइल में टार्च चालू कर ली, आगेआगे रमेश और पीछेपीछे मां रुचि चल रही थीं.

रात के लगभग 11 बजे होंगे चारों ओर सुनसान, अजीब सी आवाजें महसूस हो

रही थीं. ऐसा लग रहा था कि हवा भी दमखोटू रही हो. आसमान में तारे तो थे, किंतु किसी की रत्तीभर भी रोशनी नही थी. रुचि की नजरें बारबार श्मशान की ओर जा रही थीं. श्मशान के बड़े से लोहे के गेट पर छोटीछोटी रेडियम की पट्टियां चमक रही थीं, उस अंधेरी रात में ऐसा लग रहा था जैसे गेट पर छोटे बल्बों की लड़ी लगा दी हो. लेकिन उस की कोई रोशनी नहीं थी. पास में लगे बड़ेबडे़ बरगद और पीपल के पेड़

दूर से किसी विशालकाय राक्षस के समान दिख रहे थे.

रुचि को बारबार महसूस हो रहा था कि उस के पीछे कोई आ रहा है. वह पीछे मुड़ कर देखती तो कोई नहीं दिखता. काली अंधेरी रात में ?ाडि़यों की हिलने की आवाजें आ रही थीं. रुचि का ध्यान उस ओर गया. वह देख डर कर पसीनापसीना हो गई और जोर से चिल्लाई ‘‘मां… मां… मां…’’

मां और रमेश न घबरा कर पीछे देखा. रमेश ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? क्यों चिल्ला रही हो?’’

‘‘देखो वहां कुछ चमक रहा है.’’

रमेश ने मोबाइल टौर्च से देखा तो कुत्ते

की आंखें चमक रही थीं. कुछ कुत्ते इधरउधर घूम रहे थे.

‘‘देखो कुछ नहीं है, यहां कुत्ते हैं, जब देखो डरती रहती हो,’’ कह कर सब आगे चलने लगे.

रुचि डरते हुए बोली, ‘‘मां रुको न… थोड़ा धीरे चलो.’’

मां अब रुचि का हाथ पकड़ कर चलने लगीं. घर पहुंचते ही रुचि की जान में जान आई. उस ने तुरंत मुंहहाथ धोए और भगवान को हाथ जोड़ कर बिस्तर पर लेटते हुए रमेश से बोली, ‘‘अब तो कभी रात को न आऊंगी, न जाऊंगी, बस अपना घर ही ठीक है.’’

अब रुचि शाम होने से पहले ही घर

आने की पूरी कोशिश करने लगी. अगर औफिस में कोई पार्टी की बात करता तो तुरंत मना कर देती.

उस दिन शाम को रुचि औफिस से आई तो मां बोलीं, ‘‘कल तुम्हारी मामी सास आ रही हैं, सुबह 6 बजे तुम्हें लेने जाना पड़ेगा रेलवे स्टेशन.’’

‘‘रुचि ने ‘हां’ में सिर हिला तो दिया किंतु उसे डर भी लग रहा था. फिर अचानक मन में आया कि सुबह तो उजाला हो जाएगा.

‘‘ठीक है, मांजी,’’ बोलते हुए रुचि कमरे में चली गई.

अगली सुबह जब रुचि श्मशान के सामने से निकली तो उसे वहां एक लाल साड़ी पहने, खुले बालों में औरत दिखाई दी. वह देख घबरा गई और फिर गाड़ी फुल स्पीड पर भगा दी.

रेलवे स्टेशन से मामी को लिया तब तक उजाला हो चुका था. घर आने पर

जल्दीजल्दी कुछ घर के काम निबटाए और तैयार हो कर औफिस चली गई. जब रात को रुचि ने लाल साड़ी वाली औरत की बात रमेश को बताई तो रमेश कहने लगा, ‘‘इतना वहम मत रखा करो वरना हमेशा डरती रहोगी… ऐसा कुछ नहीं है, वहां.’’

उस ने औफिस से घर आते समय सोचा कि मामीजी आई हुई हैं, कुछ सब्जियां और फल खरीदती चलूं. घर पर सब्जियां खत्म हो गई हैं. अत: बाजार से कुछ सब्जियां खरीद कर घर की ओर जाने लगी. गोधुली बेला में रात ने पूरा पहरा अभी नही दिया था. अभी स्ट्रीट लाइटें भी नहीं जली थीं. उस की नजर श्मशान की ओर गई. उस ने देखा 2 बच्चे सफेद शर्ट पहने खेल रहे हैं. कुछ धुंधलाधुंधला सा दिख रहा था. बच्चों के चिल्लाने और तेज हंसने की आवाजें गूंज रही थीं.

शाम के समय लोगों का ज्यादा आनाजाना इस राह पर नहीं था. उस समय रुचि ही उस रास्ते से गुजर रही थी. उस ने चारों ओर देख कोई दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने अपनी स्कूटी की रफ्तार तेज की और सीधे घर पहुंची. घर तक भी रुचि की सांसें तेज चल रही थीं. डर से चेहरा पीला पड़ चुका था.

मां ने पूछा, ‘‘अरे क्या हुआ, इतना क्यों हांफ रही हो?’’

रुचि खुद को संभालती हुई बोली, ‘‘मांजी मुझे श्मशान में 2 बच्चे खेलते हुए दिखाई दिए. उन की खिलखिला कर हंसने, चिल्लाने की आवाजें सुनीं… पक्का मां जी वहां आत्माएं

घूमती हैं… मुझे कई बार वहां लाल साड़ी में औरत भी दिखाई देती है, आज तो मैं ने वहां बच्चे भी देखे…’’

मां ने एक पंडित को फोन किया तो उन्होंने पहले 100 रुपए औनलाइन मंगाए और फिर उपाय बताया.

‘‘अभी श्राद्ध पक्ष चल रहा है, दोनों बेला मिल रही हैं, शायद तुम्हें ऐसा एहसास हुआ होगा. इस समय कुछ अतृप्त आत्माएं विचरण करती तुम्हें दिख गई होंगी. तुम नहाधो कर भगवान को दीपक बत्ती कर दो, डर निकल जाएगा.’’

रुचि ने ऐसा ही किया भगवान के सामने थोड़ी देर के बाद मां ने रुचि को आवाज लगाई, ‘‘रुचि मेरे पास आओ,’’ और फिर एक छोटा सा पीतल का चाकू और कुछ राई के दाने उसे दुपट्टे के कोने में बांधने को कहा. यह सलाह भी पंडित ने ही दी थी.

रुचि ने पूछा, ‘‘इस से क्या होगा मांजी?’’

‘‘पंडितजी ने कहा है कि तुम्हें डर नहीं लगेगा, जो तुम्हें आत्माएं दिखाई दे रही हैं, वह भी नहीं दिखेंगी.’’

यह सुन रुचि को बहुत अच्छा लगा. वह मुसकरा कर मां के गले लग गई.

रुचि की जिंदगी में डर खत्म सा हो गया था. उस की घर की छत से पूरा श्मशान दिखाई पड़ता था. गरमियों में अकसर वह छत पर ही रात को टहलती थी. एक रात खाना खा कर छत पर टहल रही थी. तभी उस की नजर श्मशान की ओर गई. वहां देख उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस ने देखा, वहां लाल साड़ी में दुलहन, शादी का जोड़ा पहने दूल्हा और साथ में 4-5 लोग दिखाई दे रहे थे.

यह देख रुचि पसीनापसीना हो गई, वह दौड़ कर नीचे आई और दुबक कर चादर से मुंह ढक कर लेट गई और भगवान के मंत्र बोलने लगी. वह बताती भी तो किसे क्योंकि उस रात रमेश और मां दोनों घर पर नहीं थे. वे दोनों किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए थे. भगवान का नाम लेते हुए रात उस ने खुली आंखें में गुजारी. सुबह रमेश और मां आ गए. मां ने रुचि को देख पूछा, ‘‘क्या हुआ सोई नहीं क्या रात में? आंखें देख कैसी हो रही हैं? आज औफिस मत जा दिन में आराम कर लेना.’’

रुचि ने मां को पूरी बात बताई तो मां ने फिर से पंडितजी को फोन कर के सारी बात बताई. पंडितजी ने पहले तो दक्षिणा के 1001 रुपए मांगे और फिर कहा कि यह लाल साड़ी वाली औरत रुचि की मां की मामी की आत्मा है. वह रुचि के माध्यम से रुचि की मां से बदला लेने आई है. पंडितजी ने यह भी कहा कि अब वे घंटेभर में विशेष अनुष्ठान कर देंगे और फिर वह लाल साड़ी वाली औरत नहीं दिखेगी.

वह फिर भी जल्दी से तैयार हो कर औफिस निकल गई. पूरा दिन उस का ध्यान रात वाली बात पर था. उस का काम में भी मन नहीं लग रहा था. जैसेतैसे दिन निकला. वह जब घर आ रही थी, तभी श्मशान के पास ही उस की स्कूटी खराब हो गई. बहुत कोशिश की किंतु वह स्टार्ट नहीं हुई. वह उसे हाथ से खींचते हुए चलने लगी. तभी

उस का पैर जमीन पर पड़े लाल कपड़े पर पड़ गया. उस का ध्यान जब पैर की ओर गया तो देख घबरा गई.

घर पहुंचतेपहुंचते कई डरावने विचार उस के मन में घूमने लगे. घर पहुंच कर स्कूटी खड़ी करते ही वह चक्कर खा कर गिर गई. मां और रमेश यह देख तुरंत उस के पास पहुंचे. उसे उठा कर घर के अंदर बिस्तर पर लेटाया. रमेश ने मुंह पर पानी के छींटे मारे. उसे थोड़ा होश आया, उसे पानी पिलाया. रुचि घबराई, डरी हुई, मां और रमेश का हाथ जोर से पकड़ कर बोली, ‘‘मां, मैं ने कहा था न वहां मेरी ताई की आत्मा घूमती है, आज मेरी गाड़ी भी खराब कर दी, उस आत्मा ने.’’

मां और रमेश रुचि की स्थिति देख दु:खी हो रहे थे.

रमेश बोला, ‘‘थोड़ा आराम कर लो ठीक लगेगा.’’

‘‘मुझे घबराहट, बेचैनी हो रही है, जरूर वह आत्मा मेरे साथ घर आ गई.’’

मां ने उसे समझ कि पंडितजी के अनुष्ठान के बाद ऐसा नहीं हो सकता.

‘‘नहीं मां ऐसा होता है.’’

रमेश ने डाक्टर को फोन लगाया. थोड़ी देर में डाक्टर भी आ गए. डाक्टर देख बोले, ‘‘इन्हें को हाईएसिडिटी हुई है, शायद इन की नींद पूरी नहीं हुई, खाना भी समय पर नहीं खाया होगा, इस कारण इन्हें ऐसा हो रहा है. कुछ दवाइएं लिख दीं.’’

दूसरे दिन रुचि बिलकुल ठीकहो गई. 2 दिन रैस्ट कर के जब औफिस जा रही थी, तभी उस की नजर श्मशान के पास खड़े सब्जी के ठेले पर पड़ी. पहले तो वह देख डर गई. वही औरत. डरतेडरते वह भी ठेले के पास पहुंची, उस के सामने सब्जी लेते हुए वही औरत थी जो उस दिन सुबह दिखी थी.

डरते हुए वह भी सब्जियों के दाम पूछने लगी, लाल साड़ी वाली औरत सब्जी की टोकरी ले कर श्मशान की ओर जाने लगी. उस के आने के बाद रुचि ने उस से पूछा, ‘‘ताई तुम सब्जी भी खरीदती हो.’’

वह औरत यह प्रश्न सुन हंसते हुए बोली, ‘‘क्या मैडम हम भूत नहीं, इंसान हैं, पेट

तो भरना ही पड़ेगा.’’

रुचि ने फिर पूछ लिया, ‘‘क्या तुम यही रहती हो?’’

‘‘हां, मैडम कहां जाएंगे? जहां रोजीरोटी होगी वहीं रहेंगे.’’ तभी पीछे से किसी की आवाज आई, ‘‘मां… मां… जल्दी करो स्कूल जाना है,’’ वे दोनों बच्चे उस के पास आ कर बोले.

‘‘हां, चलो’’ कह कर वह मुक्तिधाम की ओर जाने लगी.

तभी रुचि ने पीछे से पूछा, ‘‘अभी कुछ दिन पहले यहां शादी… या कुछ था क्या?’’

वह पलट कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘मेरी छोटी बहन की शादी हुई थी, मैं नहीं जा सकी उस की शादी में, इसलिए वह रात में मिलने आई थी.’’

यह सब सुन रुचि सन्न रह गई. फिर हंसने लगी. रुचि को हंसते हुए देख सब्जी वाला बोला, ‘‘हंस क्यों रहे हो मैडम?’’

रुचि मन में ही बोली कि अपनी मूर्खता पर और मां की गलत सीख पर व पंडित की धूर्तता.

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