Drone Parenting: आज के समय में पेरैंटिंग पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है. बच्चों की पढ़ाई, उन की सेहत, दोस्ती, स्क्रीन टाइम, खानपान और यहां तक कि उन के मूड तक पर मातापिता लगातार नजर रखते हैं.
बच्चे घर के किसी कमरे में हों, स्कूल में हों या दोस्तों के साथ बाहर मातापिता का ध्यान अकसर उन्हीं पर टिका रहता है. यही आदत धीरेधीरे ‘ड्रोन पेरैंटिंग’ का रूप ले सकती है.
ड्रोन पेरैंटिंग का नाम उस ड्रोन कैमरे से आया है, जो ऊपर से लगातार हर गतिविधि पर नजर रखता है. इसी तरह कुछ मातापिता भी अपने बच्चों की जिंदगी में इतनी बारीकी से नजर रखने लगते हैं कि बच्चे के पास अपनी दुनिया बनाने और अपने फैसले लेने की जगह कम पड़ने लगती है.
हर समय बच्चे पर नजर
बच्चा क्या कर रहा है, किस से बात कर रहा है, स्कूल में किस के साथ बैठा, उस ने खाना पूरा खाया या नहीं, होमवर्क कब किया, मोबाइल पर कितनी देर रहा वगैरह सवालों का जवाब जानना मातापिता की चिंता का हिस्सा हो सकता है.
चिंता तब समस्या बनती है, जब बच्चे की जिंदगी का लगभग हर छोटाबड़ा फैसला मातापिता की निगरानी में होने लगें.
आज तकनीक ने यह निगरानी और आसान कर दी है. फोन की लोकेशन देखना, मैसेज चैक करना, स्कूल की हर गतिविधि पर अपडेट लेना या बच्चे के सोशल मीडिया अकाउंट पर लगातार नजर रखना, इन सब के पीछे मातापिता का उद्देश्य अकसर सुरक्षा ही होता है. लेकिन सुरक्षा और जरूरत से ज्यादा निगरानी के बीच एक बहुत महीन रेखा है.
चिंता प्यार से शुरू होती है
ड्रोन पेरैंटिंग को समझने के लिए यह भी समझना जरूरी है कि इस के पीछे अकसर मातापिता का प्यार और डर होता है. वे चाहते हैं कि उन का बच्चा किसी परेशानी में न पड़े, गलत फैसला न ले और उसे किसी तरह की चोट या असफलता का सामना न करना पड़े.
लेकिन जिंदगी में हर परेशानी से बच्चे को बचाना संभव नहीं है. बच्चे का गिरना, गलती करना, किसी बात में असफल होना और फिर उस से सीखना भी जरूरी है. अगर हर मुश्किल से पहले ही मातापिता रास्ता साफ कर देंगे, तो बच्चा मुश्किल आने पर खुद उस से निबटना कैसे सीखेगा?
क्या हम बच्चों को उन की अपनी जिंदगी जीने दे रहे हैं
कई बार मातापिता बच्चों की पसंद को भी अपनी पसंद से जोड़ लेते हैं. बच्चे को कौन सा खेल पसंद होना चाहिए, किस विषय में अच्छे नंबर लाने चाहिए, किस तरह के दोस्तों के साथ रहना चाहिए या भविष्य में क्या बनना चाहिए, इन सब पर मातापिता की उम्मीदें हावी हो सकती हैं.
बच्चा अगर अपनी पसंद बताता भी है, तो तुरंत सलाह मिलने लगती है कि ऐसा मत करो, वह सही नहीं है, तुम्हें यह करना चाहिए…वगैरह.
धीरेधीरे बच्चा अपने फैसलों पर भरोसा करना कम कर सकता है.
यहां सवाल यह नहीं है कि माता-
पिता बच्चों को सलाह दें या नहीं. सवाल यह है कि क्या हर बार सलाह देना जरूरी है?
बच्चों को थोड़ी आजादी भी चाहिए
बच्चे को आजादी देने का मतलब उसे अकेला छोड़ देना नहीं है. इस का मतलब है कि उस की उम्र और समझ के अनुसार उसे कुछ फैसले खुद लेने दिए जाएं.
वे अपने कपड़े चुनें, अपना कमरा व्यवस्थित करें, दोस्तों के साथ छोटे फैसले लें, कभीकभी गलतियां करें और उन के परिणाम को समझें. मातापिता की भूमिका यहां एक ‘कंट्रोलर’ की नहीं, बल्कि एक ‘गाइड’ की हो सकती है.
बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर उस के मातापिता उस के साथ खड़े हैं, लेकिन हर कदम पर उस की निगरानी नहीं कर रहे.
परफैक्ट पेरैंट बनने का दबाव
ड्रोन पेरैंटिंग की एक वजह मातापिता पर बढ़ता सामाजिक दबाव भी है. सोशल मीडिया पर हर बच्चा किसी न किसी उपलब्धि के साथ दिखाई देता है. किसी का बच्चा पढ़ाई में आगे है, कोई खेल में अच्छा है, कोई संगीत सीख रहा है तो कोई नई भाषा.
ऐसे में मातापिता को लग सकता है कि उन्हें भी अपने बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रखनी चाहिए. लेकिन हर बच्चे की अपनी गति होती है. बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करने के बजाय यह देखना ज्यादा जरूरी है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ रहा है या नहीं.
निगरानी से ज्यादा जरूरी है भरोसा
एक स्वस्थ रिश्ते की नींव सिर्फ चिंता नहीं, भरोसा भी है. बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि उस के मातापिता उस की बात सुनेंगे, उस की गलतियों पर केवल डांटेंगे नहीं, बल्कि उसे समझने की कोशिश करेंगे.
शायद अच्छी पेरैंटिंग का मतलब यह नहीं कि हम बच्चे की जिंदगी के हर पल को नियंत्रित करें, बल्कि यह है कि हम उसे इतना मजबूत बनाएं कि जब हमारी नजर उस के ऊपर न भी हो, तब भी वह सही और गलत के बीच फैसला कर सकें.
आखिरकार, बच्चों को हमेशा हमारी छाया में नहीं रहना है. उन्हें अपनी जिंदगी जीनी है, अपने फैसले लेने हैं और अपनी गलतियों से सीखना है. इसलिए कभीकभी प्यार का सब से खूबसूरत रूप यह भी हो सकता है कि हम एक कदम पीछे हटें, बच्चे को थोड़ा स्पेस दें और दूर से बस इतना कहें कि तुम कोशिश करो, जरूरत पड़ेगी तो हम यहीं हैं.
