Personal freedom : 2 बालिग इंसान किस के साथ रहें, कैसे रहें और शादी करें या न करें, यह उन का पूरी तरह से व्यक्तिगत निर्णय है. लेकिन जब सरकार सुरक्षा के नाम पर हमारे बैडरूम में झांकने लगे और निजी रिश्तों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दे, तो यह सुरक्षा नहीं बल्कि निजता पर सीधा हमला बन जाता है.
हाल के दिनों में लिवइन रिलेशनशिप के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन को ले कर उठी बहस ने नागरिक स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच एक नई जंग छेड़ दी है. एक तरफ जहां सरकार इसे अपराध नियंत्रण और अधिकारों की सुरक्षा का जरीया मानती है, वहीं दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग इसे व्यक्तिगत फैसलों में सरकारी तानाशाही और रुढ़िवादी सामाजिक सोच का विस्तार मानता है.
दरअसल, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकार ने अपने समान नागरिक संहिता (यंसीसी) के अंतर्गत नए नियम बनाए हैं, जो लिवइन रिलेशनशिप के पंजीकरण को अनिवार्य बनाते हैं.
इस पर सरकार का कहना है कि अकसर देखा गया है कि लिवइन रिलेशनशिप खत्म होने या किसी विवाद की स्थिति में महिलाओं के पास कोई कानूनी दस्तावेज नहीं होता. रजिस्ट्रेशन से उन्हें मैंटेनेंस और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिलती है. लेकिन कई लोगों की नजरों में यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप माना जा रहा है. हालांकि, इसे लागू करने के पीछे सरकार और कानूनविदों के अपने तर्क हैं.
देश के अन्य हिस्सों में ऐसा कोई केंद्रीय अनिवार्य रजिस्ट्रेशन कानून नहीं है. हालांकि, उत्तराखंड के इस कानून को भी सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत निजता के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई है. लोकतंत्र में सरकार के फैसलों या कानूनों का विरोध करना और अपनी असहमति जताना संवैधानिक अधिकार है.
आइए, जानें आजकल की नई युवा पीढ़ी यानी कि जेन जी और मिलेनियल को इस से आपत्ति क्यों है :
संविधान के अनुच्छेद 21 का हनन है यह फैसला2 बालिगों का आपसी सहमति से एकसाथ रहने का फैसला उन का पूरी तरह से व्यक्तिगत निर्णय है. जब सरकार इस रिश्ते की जानकारी सरकारी रजिस्टर में दर्ज कराना अनिवार्य करती है, तो यह नागरिकों के बैडरूम और निजी जिंदगी में सीधे सरकारी दखल की तरह देखा जाता है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को अपनी निजी जिंदगी जीने की आजादी है. 2 बालिग आपसी सहमति से किस के साथ रहते हैं, उस में सरकार या पुलिस का हस्तक्षेप तानाशाही जैसा महसूस होता है.
सामाजिक तानाबाना और उत्पीड़न
भारत में आज के समय में भी कई परिवारों में लव मैरिज करना अपराध माना जाता है और इसी वजह से आएदिन औनर किलिंग जैसे मामले आते रहते हैं, जिस में पिता बेटी को सिर्फ इसलिए मार देता है क्योंकि उस ने दूसरी जाति के लड़के से प्यार करने की हिमाकत की.
जहां तक बात लिवइन रिलेशनशिप की है तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में लिवइन रिलेशनशिप को आज भी सामाजिक स्वीकार्यता पूरी तरह नहीं मिली है.
रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था से जोड़ों की जानकारी सार्वजनिक होने, उन के परिवारों को सूचित किए जाने या पुलिस द्वारा प्रताड़ित किए जाने का डर बना रहता है. इसलिए रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य करना उन प्रेमी जोड़ों के साथ अन्याय होगा जो अपनी मरजी से बिना किस को नुकसान पहुचाए अपनी मरजी से जिंदगी गुजारना चाहते हैं.
व्यक्तिगत पसंद पर पाबंदी
जब 2 लोग शादी न कर के लिवइन में रहने का रास्ता चुनते हैं, तो उन का उद्देश्य ही औपचारिक कागजी काररवाई से बचना होता है. ऐसे में रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य करना शादी की तरह ही एक कानूनी बंधन थोपने जैसा लगता है.
जानकारी लीक होने पर प्रेमी जोड़ों की जान को खतरा
जो जोड़े अंतर्जातीय या अंतरधार्मिक रिश्ते में हैं, उन के परिवारों को जानकारी मिलने से उन की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. जोड़ों की जानकारी लीक होने पर समाज, मकानमालिक या कट्टरपंथी समूहों द्वारा उन्हें परेशान किया जा सकता है.
सामाजिक आडंबर से दूर रहना चाहते हैं प्रेमी जोड़े
कई लोग शादी की परंपरा और उस से जुड़े भारीभरकम खर्चों, धार्मिक रस्मों (पंडित/मौलवी की मध्यस्थता) और सामाजिक आडंबरों से दूर रहना चाहते हैं. इस में पैसा भी खर्चा नहीं होता, कोई दहेज और तलाक का चक्कर नहीं होता. दिखावे के लिए पैसे को नहीं लुटाया जाता क्योंकि यह जिंदगी प्यार करने वाले जोड़ों की अपनी होती है. वे खुद के लिए जीते हैं किसी और को दिखाने के लिए नहीं.
आप इसे पंडितखोरी बनाना चाहते हैं
आप चाहते हैं कि शादी करो ताकि पंडितों की दुकान चलती रहें. लिवइन में न तो फेरे लेने होते हैं, न निकाह पढ़ना होता है और न ही कोई धार्मिक मंत्र पढ़े जाते हैं. लिवइन का विचार ही यही है कि 2 लोग बिना किसी धार्मिक या कानूनी औपचारिकताओं के सिर्फ आपसी भरोसे पर साथ रहें. लेकिन इस में सब से ज्यादा नुकसान अगर किसी का होता है तो वह है पंडितों का.
सरकार सिर्फ पंडितों के लिए काम कर रही है
दरअसल, यह सरकार सिर्फ पंडितों के लिए काम कर रही है. इन सरकारों का काम यही है कि पंडितों का धंधा चलता रहे क्योंकि जो शादी विधिवत होती है उस के लिए कम से कम 20 बार पंडितजी आते हैं. बहुत से घरों में आज भी रिश्ता भी वहीं बताते हैं. इस के बाद जो रिश्ते आ रहे हैं उन के लिए कुंडली मिलाने का काम भी पंडितजी करते हैं. कम से कम एक शादी के लिए 10 लड़के देखें जाएंगे तो उस के लिए 10 बार पंडितजी कुंडली मिलाने आएंगे और दक्षिणा लेंगे.
फिर सगाई पर आते हैं. हलदी, मेहंदी में भी आते हैं. शादी में भी मोटी रकम लेते हैं और आप लिवइन में रह कर उन के सारे धंधे को चौपट करना चाहते हो. पंडितजी का एक क्लाइंट कम हो जाएगा.
यही वजह है कि सरकार लिवइन के नियम को कठिन बना रही है ताकि कोई लिवइन में न रह पाएं और इस वजह से पंडितों की दुकान भी बंद न हो.
दरअसल, जब लोग पारंपरिक इंस्टीट्यूशन औफ मैरिज (Institution of Marriage) का हिस्सा नहीं बनना चाहते, तो वे लिवइन का रास्ता चुनते हैं. हालांकि, इसी कारण जब सरकार लिवइन में भी रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करती है, तो लोगों को लगता है कि जिस प्रशासनिक और सामाजिक नियंत्रण से वे दूर भाग रहे थे, सरकार वापस उन्हें उसी कागजी चक्कर में खींच रही है.
सवाल तो यह है कि एक तरफ तो आप अधिकार देने और लोकतंत्र की बात करते हैं और दूसरी तरफ लिवइन में रजिस्ट्रेशन को जबरदस्ती हम पर थोप रहे हैं. आज के युवाओं का कहना है कि हम इस का विरोध करते हैं. यह तानाशाही है और यह हमारी मरजी है कि हम रजिस्ट्रेशन करवाएं या नहीं, शादी करूं या न करूं यह हमारा फैसला है. आप क्यों बीच में आ रहे हैं? आप होते कौन हैं हमें बोलने वाले?
