Story In Hindi : ‘‘अरे आज क्लास में स्ट्रैंथ कम क्यों है, मारिया?’’ सुप्रिया ने झुंझलाते हुए सवाल किया, ‘‘जाओ सब को इन्फौरमेशन दो कि मैं क्लास में आ चुकी हूं, सब आ जाएं जल्दी.’’

‘‘जी मैडम,’’ मारिया ने मेज को साफ करते हुए उत्तर दिया और फिर डस्टर लगने से पेपरवेट जैसे ही नीचे गिरा, उस की जान मानो उस के हलक में ही अटक गई. अपने ओहदे का खयाल न करते हुए उस ने फर्श से स्वयं ही उठा कर हाथों में कोमलता से सहेजा जैसे वह निर्जीव पेपरवेट न हो कर नवजात शिशु हो. फिर वापस मेज पर सजा दिया. जैसे उस की कोई चोरी पकड़ी गई हो. पलभर की कोमलता विलुप्त हो कर पुन: भिंचे होंठ और सख्त मुद्रा में बदल गई.

मारिया भी उस का खराब मिजाज भांप कर तेजी से बाहर की ओर निकल गई.

‘‘हुंह… क्लास क्या खाक लूंगी इस तरह, जब एचओडी की क्लास में ये बच्चे इतने अनुशासनहीन हो सकते हैं तो दूसरे टीचर्स की क्लास में क्या ही करते होंगे,’’ कह कर वह खुद से बड़बड़ाते हुए अपनी चेयर पर बैठ गई. कलफ लगी तांत की सूती नारंगी रंग की साड़ी में उस का गेहुआं व्यक्तित्व अलग ही खिल रहा था. माथे पर बड़ी सी सिंदूरी बिंदी लगाए, कर्णचुंबी बड़ेबड़े खिले पनीले से नयनों में काजल की रेखा ऐसे लग रही थी मानों सागर की सीमारेखा तय कर दी हो किसी ने. फाइन आर्ट की प्रवक्ता थी. वह स्वयं भी रूपरंग में अपनी तराशी हुई मूर्तियों का ही कोई हिस्सा सी लगती.

विद्यार्थी उसे पीठ पीछे कड़क कौटन कैंडी कहा करते थे. उसे बड़ी कुढ़न होती कि आखिर मेरे ही हिस्से में प्यार क्यों नहीं था. सोचती थी कि काश ये बच्चे आखिर दुख देने वाली भावना से दूर क्यों नहीं रहते? उस का बस चलता तो एक भी जोड़े को साथ बैठने न देती. उस का प्रेम आज भी उस के रोमरोम में गहरे समाया हुआ था. आज भी जलरंगों की पेंटिंग बनाते समय बैकग्राउंड में अधिकतर शेड्स को निखारने के लिए उसी तरह कूची के स्थान पर कपास का इस्तेमाल किया करती थी.

उस की सूनी आंखों में अरसे बाद फिर से नमी उमड़ने को हुई तो अपने मन को सम?ाने का भरसक प्रयत्न करते हुए उस ने अपनी नजरें टेबल पर रखे अपने रेजिन आर्ट से बने हुए फैवरिट कपास के फूल वाले पेपरवेट पर टिका दीं.

उस की यादों के गलियारों में एक बार फिर से सौरभ घूम गया…

जब गांव से लौटने के बाद आखिरी बार उस ने उस दिन उसे वे कपास के फूल दिए थे, वह बेसाख्ता उस के इस अनाड़ी से प्रेम पर हंस पड़ी थी.

‘‘अरे बुद्धूराम कुछ पता है तुम्हें उपहार में गुलाब देते हैं, ये कपास का फूल नहीं,’’ उस ने चलतेचलते कहा.

‘‘बस यों ही मनमौजी हूं, मु?ो नियमों से बंधना रास नहीं आता कभी. फिर किस ने कहा कि मु?ो प्रेम है. भई यह जकड़न कमजोर करती है रिश्ता,’’ वह बोला था.

‘‘अरे छोड़ देना चाहिए कुछ बातों को आजाद और बेपरवाह, गुलाब हो या कपास क्या फर्क पड़ता है?’’ वह थोड़ा रुक कर फिर बोला.

‘‘अच्छा अगर यह प्रेम नहीं है तो फिर तुम बातबात पर क्यों खोजते हो मु?ो?’’ उस ने पूछा.

‘‘तुम से कह कर मन हलका महसूस होता है. ऐसा लगता है कि मन का भारीपन कुछ कम हुआ बात कर के तुम से?’’

‘‘किसलिए?’’

‘‘तुम ध्यान से जो सुनती हो.’’

और वे मुसकरा दी, ‘‘तो तुम मु?ो अपनी निराशा की नाव मानते हो.’’

‘‘पता नहीं?’’

‘‘कुछ तो है हमारे बीच जो मु?ो तुम्हारे पास खींच लाता है.’’

‘‘हां शायद यही. वह अदृश्य बंधन है, वह बारीक सा तंतु जिसे तुम देख नहीं पाते और तुम्हें पास ले आता है,’’ वह थोड़े गंभीर अंदाज में बोला.

‘‘हां, एक बेचैनी सी होती है, जब तक तुम से बात न कर लूं.’’

‘‘हां कुछ तो है जो मुझे भी खींच लाता है तुम्हारे पास, जब भी मन भरा होता है,’’ उस ने कंधे पर सिर रख कर कहा.

दुपट्टे के छोर पर उंगलियां लपेटतेखोलते हुए उस ने कहा, ‘‘जानते हो यह सूती दुपट्टा भी कपास से बना है, यही सोखता है दर्द और मुसकान के आंसू. शायद हमारे बीच कपास के फूल सा ही नाता है शुभ्र, सरल और पवित्र.’’

इस बार उस ने कपास का वह फूल अपनी आंखों पर रखा, ढुलके हुए आंसू उस में जज्ब हो चुके थे.

‘‘हां तुम मेरे लिए कपास हो मेरी उदासियों की चादर हो, सोख लेती हो मेरी सारी पीड़ा,’’ उस ने भरे गले से कहा और फिर न जाने कब कपास का वह फूल माथे से लगाया और चूम कर किताब में रख लिया.

‘‘हूं. तुम मेरी कपास हो, सब से खूबसूरत, गुलाब से बेहतर है कपास हो जाना,’’ कह कर वह मुसकरा दिया.

उन दोनों को प्यार पहली ही नजर में हुआ था एकदूसरे से, दोनों ही फाइन आर्ट्स के

मेधावी स्टूडैंट्स थे. क्लास में सब से जीवंत आंखें बनाता था सौरभ जो न जाने कब हर स्कैच हर पेंटिंग में सुप्रिया की आंखें बन बैठतीं. सुप्रिया भी उस की शालीनता और निश्छलता पर मर मिटी थी. उस का पुरुषोचित स्वभाव और उस के प्रति सुरक्षा की भावना, क्लास में या बाहर उस के लिए सब से लड़ जाना उसे कहीं न कहीं सुकून भी देता था.

सुप्रिया नेचर स्टडी (प्रकृति चित्रण) और स्कल्पचर (मूर्तिकला)के विषय मे सिद्धहस्त थी और उस का प्रिय फूल था गुलाब. क्लास में पहली बार जब दोनों मिले थे तो सौरभ उस की गहरी आंखों में गिरफ्तार हो कर रह गया. स्कैच हो या औयल पेंटिंग्स उस की बनाई आंखें बड़ी जानदार बनतीं. वह अधिकतर ब्रश के स्थान पर अपने गांव से लाई हुई कपास का प्रयोग करता बिंम्ब रचना के लिए. और सुप्रिया की मेज पर रखे होते ताजा खिले गुलाब.

पहला संवाद तब हुआ उन के बीच जब एक बार सौरभ हड़बड़ी में  निकलते समय उस की मेज से टकरा गया और उस का सामान फर्श पर गिर पड़ा. उसी वक्त न जाने कब गुलाब की पंखुडि़यों ने भी डंठल का साथ छोड़ नीचे गिर कर कपास के फूलों का वरण कर लिया.

‘‘ए मिस्टर कौटन तुम ने मेरे रोज का सत्यानाश कर दिया,’’ उस ने गुस्से से कहा.

उस ने भी उत्तर दिया, ‘‘नहीं मिस रोज तुम्हारे बेरोजगार गुलाब को बेवफा पंखुडि़यों ने छोड़ दिया है.

‘‘वैसे मेरा नाम सौरभ है मिस्टर कौटन नहीं,’’ वह कालर ऊंचा कर बोला.

‘‘अरे काहे का सौरभ तुम तो नाम के सौरभ हो,’’ वह भी व्यंग्यात्मक रूप से बोली, ‘‘न खुशबू है न रंग कपास के फूल की तरह ही फीके हो.’’

‘‘हां… हां… पर इतनी ताकत कपास में ही होती है कि वे गुलाब की खुश्बू को सोख कर खुद में बसा कर उसे रोक ले.’’

उस की इस बात पर उस के कपोल कुछ सिंदूरी हो गए. क्लास उन की झड़प का मजा ले रही थी और टीचर के आते ही सब अपनेअपने स्थान पर यों बैठ गए मानो कुछ हुआ ही न हो. होस्टल में रहने वाले सादा दिल सौरभ पर वह न जाने कब दिल हार बैठी. वे साथ में प्रोजैक्ट्स बनाते पर कच्ची उम्र के इस प्रेम से सब जान कर अनजान से थे.

मर्यादित सौरभ में प्रेम की सभी मुहर व्यवहार में छपी थीं पर प्रकट में उस ने खुल कर कभी नहीं स्वीकार किया शायद सुप्रिया का ऊंचा जीवन स्तर सौरभ को उस की भावनाएं व्यक्त करने से रोक लेता था.

धीरेधीरे उन का फाइन आर्ट्स के साथ का सफर खत्म होने को आ गया. पर सौरभ ने सदा ही खुद को इतना मर्यादित रखा कि वह भी आंखों से ही प्रेम की मूक अभिव्यक्ति तक सीमित रही.

उसी दिन सौरभ ने उसे लाइब्रेरी के बाहर पार्क में वह कपास का बुके दिया था. नीबू और गुलाब की मिलीजुली खुशबू उन दोनों की सांसों में समाई हुई थी. ढेर सारी बातें करने के बाद आज सभी के रास्ते अलग होने वाले थे.

दीक्षांत समारोह के बाद भीड़ में खोजते हुए सुप्रिया उस के पास आई. हड़बड़ाई सुप्रिया ने उस से कहा, ‘‘मैं आज तुम्हें अपने पापा से मिलवाना चाहती हूं, आज ही बात कर लो वरना जिस से वे चाहेंगे उसे मेरा हाथ सौंप देंगे, बड़ी जल्दी है उन्हें मुझ से छुटकारा पाने की.’’

यह सुन कर सौरभ की पहली बार आंखें कुछ नम हुईं, उस के मन में कुछ टूटा पर छनाक की आवाज भी न हुई.

जबरदस्ती मुसकराने की कोशिश की उस ने और फिर, ‘‘अभी आता हूं,’’ कह कर यूनिवर्सिटी के विशाल प्रांगण में एकत्र विद्यार्थियों के महासागर में लुप्त हो गया.

बाद में देर तक सुप्रिया उसे पागलों की तरह अपने पापा से मिलवाने के लिए खोजती

रही और फिर हताश हो कर उस के होस्टल की तरफ निकल गई. मगर हैरान रह गई वह वहां से जा चुका था, बिना उस से मिले, कुछ कहेसुने. जरा सा समय भी नहीं दिया उस ने मु?ो. वह खाली हाथ, भरे मन से लौटने ही वाली थी कि सामने गैलरी से आते उस के रूममेट अभय ने सुप्रिया के लिए उस के द्वारा छोड़ा गया एक पैकेट जरूर दिया.

घर आ कर उस ने खोला तो दंग रह गई, उस में बहुत सारे सूखे हुए गुलाब थे, एक रेजिन आर्ट से बना कपास का पेपरवेट.

रेजिन आर्ट से बने गुलाब की पंखुडि़यों के  कुछ इयररिंग्स और एक पैंडैंट, और

पत्र जो शायद पहला भी था और अंतिम भी.

सौरभ

‘‘प्रिय सुप्रिया

‘‘आज स्वीकार करता हूं कि मु?ो तुम से प्रेम है पर किसी ने कहा है कि किसी के जख्म की पट्टी तब मत बनना जब तुम्हारी पीठ में पहले से ही छिरा घुसा हुआ हो… तुम्हारे पापा तुम्हें जिसे सौंपना चाहते हैं, उस में मेरी भी खुशी हैं क्योंकि प्रेम पेट नहीं भर सकता, हमें जिंदा रहने के लिए रोटी तो चाहिए ही पर रोटी के साथ और बहुत कुछ भी. गुलाब का सौंदर्य भरे पेट से ही आंखों को भाता है.

‘‘मेरी पसंद शुरू से कपास है क्योंकि यह जख्म पर लगे मरहम को भरने में सहायक होती है. मैं तुम्हें उन कष्टों में नहीं देख सकता जो तुम्हारी नियति नहीं हैं. सच्चा प्रेम कष्ट में प्रिय को देख भी सकता क्योंकि कष्ट मेरी नियति है, तुम्हें उस राह का मुसाफिर नहीं बना सकता. कौन कहता है प्यार पूरा होता है. इस का तो पहला अक्षर ही अधूरा होता है.’’

सौरभ अंतिम पंक्ति की स्याही फैली हुई थी  शायद गीले मन का दर्द अश्रु बन कर बहा होगा. सुप्रिया के सामने यह सत्य तो आ गया कि सौरभ को भी प्रेम था उस से. बाकी जीवन के सारे रहस्य उस शाम को उस के दुनियादार पिता ने उजागर कर दिए, जिन में बारबार सबक यही था कि सदा से रोटी प्रेम पर भारी रही है. इतनी सम?ा तो उसे भी थी ही सौरभ की मुलाकात उस के पिता से उस के उन दोनों को मिलाने से पहले ही हो चुकी थी. इसीलिए उस दिन उसे मिले बिना चला गया, बिना अपना कोई पतेठिकाने का निशान छोडे़.

उस के चहकते होंठों ने उस दिन के बाद खामोशी धारण कर ली. उस बीच जिंदगी उसे नएनए रंग दिखाती रही. बस एक ही रंग अच्छा हुआ जो उसे उसी शहर के अच्छे कालेज में नौकरी मिल गई. नौकरी मिलते ही उस ने खुद को काम में डुबो दिया और अब जिंदगी मशीनी ढ़र्रे पर चल पड़ी थी. दिनभर रंगों से सराबोर रहने वाले हाथों के अपने दिल की दुनिया बड़ी ही बेरंग थी.

मूर्तिकला से मिट्टी और पत्थरों में प्राण फूंक, कविता रचने वाली बस अपने जीवन में ही कोई जान न डाल पाई थी. यंत्रवत कालेज से घर जाना फिर अपने विकलांग हो चुके पिता को हस्पताल ले जाने के अतिरिक्त कोई उमंग शेष न थी. जीवन में यों लगता जैसे सरस्वती ने वैराग्य ले लिया हो.

तब तक मारिया की आवाज से उस की तंद्रा भंग हुई, ‘‘मैम कालेज ग्राउंड में एक आदमी बैठा है उस की आर्ट कमाल की है. जादू है. उस के हाथों में. भीड़ वहीं लगी है.’’

‘‘क्या जादू रचता हो वे, उंगलियों से रंगीन चौक से फर्श पर बने हुए स्कैच ऐसे लग रहे हैं जैसे असली हों. आंखें तो इतनी असली जैसे दिल में उतर जाएं…’’ इस बार सुप्रिया को सौरभ की याद शिद्दत से आई, उस का अपना परिचय देने का तरीका ऐसा ही तो था.

‘‘अच्छा,’’ उस ने ताज्जुब से कहा.

‘‘कौन है वे देखूं तो?’’ कह कर मारिया के साथ उधर चल पड़ी.

ज्यों ही उस आदमी पर नजर पड़ी तो ऐसा लगा कि दुनिया रुक गई हो एक पल को, दिल उछाल मार रहा था, इतनी तेज धड़क रहा था जैसे फट ही जाएगा. वही चेहरा, वही आंखें वही परिचित अंदाज, बस आंखों पर चश्मा था और बालों में थोड़ी चांदी जुड़ गई थी.

‘‘सौरभ,’’ उस के मुंह से हर्षमिश्रित स्वर निकला.

सौरभ ने भी अपने पुराने चिरपरिचित

अंदाज में उस से अभिवादन किया और कहा, ‘‘यह डाक्टर सौरभ आप के कालेज में आप

के सामने देर से आने के लिए आप से माफी चाहता है…’’

‘‘औफिस में चलें?’’ सुप्रिया ने कहा,

‘‘श्योर,’’ सौरभ ने उत्तर दिया,

औपचारिक बातों के बाद सुप्रिया ने उस से शाम को कालेज कैंपस में ही स्थित अपने घर में खाने पर आने का निमंत्रण दिया, जिसे उस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. हलके गुलाबी लखनवी सूट के साथ पिंक सूती दुप्पटा उस की सांवली रंगत को अपूर्व आभा प्रदान कर रहा था. वह स्वयं यामिनी की पेंटिंग की कोई वैरागी नायिका लग रही थी. हरीतिमा से भरी गैलरी उस के कलाकार मन की पूरी चुगली कर रही थी.

अरसे बाद सबकुछ सौरभ और उस की मिलीजुली पसंद का बना था रसोई

में. चाय पीतेपीते सुप्रिया ने सौरभ से उस के परिवार की जानकारी चाही, जिसे सौरभ हंस कर टाल गया.

फिर उस ने सुप्रिया की जिंदगी के बारे में सवाल किया?

‘‘सब ठीक है, बस चल रही है जिंदगी,’’ उस ने बुझ सा उत्तर दिया.

‘‘क्यों?’’ उस ने अचकचा कर सवाल किया, तुम्हारीशादी कैसी चल रही है?’’

‘‘चलती तो तब, जब हुई होती सौरभ उस  रात तुम चले गए, यह सदमा मुझे बरदाश्त न हुआ कि यों जाने से पहले तुम ने मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझ, आखिर मेरी गलती कहां थी. बहुत तलाशा तुम्हें पर तुम्हारा कोई पता नहीं लगा. हार कर पापा की बात पर विचार करते हुए मैं ने संभलने के लिए पापा से थोड़ा वक्त मांगा जो उन्होंने दिया भी.’’

सौरभ खामोशी से सब सुनता जा रहा था,

2 घूंट गिलास से पानी पीने के बाद सुप्रिया ने आगे कहा, ‘‘उस दिन के बाद सिर्फ मैं ही खामोश नहीं हुई, कुछ दिनों बाद पापा भी अचानक ही पैरालाइज्ड हो गए. गिरने से उन की रीढ़ की हड्डी भी चोटिल हुई और वे हमेशा के लिए पराश्रित हो गए.

‘‘समय से पहले रिटायरमैंट लेना पड़ा, उस के बाद बुरे दिन आते ही. उन की पोस्ट, उन का रुतबा और उस पर मंडराने वाले लोग भी धीरेधीरे गायब हो गए.

‘‘मेरे दुनियादार पिता के द्वारा मेरे लिए चुने गए मंगेतर पुनीत को मेरे जीवन में आई परेशानियों से कोई लेनादेना न था. पापा उस की नजर में बो?ा अधिक थे.

‘‘एक शाम उस ने मुझे बुलाया रैस्टोरैंट में, वह जल्दी शादी के पक्ष में था, इसलिए शादी होते ही पापा को ओल्ड एज होम भेजने की सिफारिश कर रहा था. मैं ने उस दिन तुम्हें और तुम्हारी बेवफाई को शिद्दत से याद किया और उस की अंगूठी वापस कर के खुद को उस दमघोंटू रिश्ते से मुक्त कर दिया.

‘‘मम्मी भी शिथिल हो चुकी थीं, बस

उस समय वरदान बन कर आई यह नौकरी, फुलटाइम मेड और नर्स के सहारे मम्मी घर देखती हैं और मैं नौकरी करती हूं. तुम सुनाओ तुम क्या कर रहे हो? क्या बदलाव हुए तुम्हारे जीवन में? तुम्हें मेरी याद कभी आईं या मस्त हो अपनी गृहस्थी में?’’ सुप्रिया ने प्रश्न उछालते हुए उस की ओर देखा.

दूधिया रोशनी में उस का सूती मैरून कुरता, सामने करीने से लगी

खिली गुलाब की क्यारियों का ही हिस्सा लग रहा था. किसी परीक्षा की तैयारी में लगा था, ‘‘यह लो तुम्हारा उपहार, आज कपास का फूल नहीं लाया हूं,’’ कहते हुए उस ने एक किताब सामने रख दी जिस में गुलाब के बहुत सारे अलगअलग पोट्रेट थे, नीचे एस के हस्ताक्षर के साथ.

सुप्रिया ने उसे आश्चर्य से देखते हुए कहा ‘‘मिस्टर कौटन की पसंद गुलाब हो गया?’’

‘‘तो तुम भी तो मिस रोजी से कड़क कौटन कैंडी में बदल गई हो,’’ सौरभ ने जोर से ठहाका लगाते हुए कहा.

जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो, सुप्रिया ने सकपकाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, ठीक है और खुद को भी देखो,’’ कह कर हंस पड़ी.

‘‘बदलाव जिंदगी का हिस्सा है. कोई किसी के लिए नहीं रुकता. बस मन में सवाल था कि तुम ने ऐसा क्यों किया मेरे साथ?’’

उस का जवाब है यह लिफाफा, सौरभ ने उन के रिश्ते की स्वीकृति के लिए उस के पिता का पत्र सामने रख दिया.

जिस में उन्होंने पिछले बरताव की माफी मांगते हुए लिखा था, ‘‘बड़ी मुश्किल से तुम्हारा पता मिला है, तुम अपनी परीक्षा में सफल रहे. कभीकभी हम बड़े भी निर्णय लेने में चूक जाते हैं. तुम्हारे और सुप्रिया के बारे में मैं भी गलत ही साबित हुआ.

‘‘एकदूसरे की पसंदनापसंद को जीवन में आत्मसात करतेकरते, एकदूजे की परछाईं बन गए तुम दोनों. न वह अपनी जिंदगी में आगे बड़ी न तुम, मन का बो?ा हलका हो जाएगा न जाने कब से तुम्हें खोज रहा हूं.

‘‘हो सके तो मु?ो माफ कर के सुप्रिया को अपनी हमसफर बना लो तो चैन से मर सकूंगा.’’

सुप्रिया के पिता को लगा था कि अच्छे पद पर चढ़़ाने वाले हैड औफ डिपार्टमैंट की बेटी का क्लर्क के बेटे के साथ कहां सुखी रह पाएगी. सुप्रिया के प्रेम के किस्से उन तक पहुंच गए थे और उन्होंने कालेज में ही सौरभ को अपने औफिस में बुला कर साफ कर दिया था कि वह सुप्रिया को सुखी नहीं रख पाएगा.

सचाई दर्पण की तरह साफ  थी गिलेशिकवे आंसुओं में बह गए.

‘‘तुम लौट आए हो इस बार अपने कपास को गठबंधन से दिल पर बांध लूंगी सदा के लिए,’’ सुप्रिया ने भावुक हो कर कहा.

‘‘तुम से प्यार जो किया है,’’ सौरभ ने गुलाब के आकार की डिबिया से एक अंगूठी निकाल कर उस की नाजुक उंगली में पहनाते हुए  कहा, ‘‘उस बुक को ध्यान से देखिए मैम आप के कालेज में मेरी बुक चल रही है,?’’

‘‘तो मिस्टर एस तुम हो?’’  उस ने बेयकीनी से कहा.

‘‘अब अपने सिग्नेचर सौरभ या मिस्टर कौटन के तो बनाऊंगा नहीं.’’

सुप्रिया ने अपनी इस नादानी पर शर्म से आंखें ?ाका लीं, अल्हड़ उम्र का

प्रेम अब परिपक्व हो चुका था. सामने से नर्स सुप्रिया के पिता को व्हीलचेयर पर ले कर आ रही थी और उस की मां हाथों में शगुन की थाली और मिठाई ले कर.

इस बार उन्होंने सौरभ से अपने दोनों कमजोर हाथों को हाथ जोड़ कर माफी मांगी तो उस ने उन्हें बीच में ही रोक कर उन के चरण स्पर्श करते हुए कहा, ‘‘मेरी योग्यता आंकना आप का अधिकार था, बेटे के लिए हाथ आशीर्वाद को उठाइए पापा.’’  उन्होंने पूरे मन से उन दोनों को आशीर्वाद दिया. उस गुलाबी शाम में कपास पर गुलाब का इत्र हवा में घुल रहा था और रंग उन दोनों के गालों पर उतर आया था.

राइटर – सुमिता शर्मा

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...