Hindi Kahaniyan : ‘‘सर  दिस विल बी अवर ड्रीम प्रोजैक्ट ऐंड आई एम श्योर इट विल बी हंड्रेड परसैंट सक्सैसफुल,’’ अदिति अपनी रौ में बोले जा रही थी कि तभी उस की नजरें सामने बैठे एक युवक पर पड़ीं जो बिना पलकें झपकाए बस उसी की तरफ देखे जा रहा था.

उसे इस तरह अपने सामने देख कर एक पल को तो वह घबरा सी गई. लगा मानो प्रोजैक्ट पर कमांड ही खो देगी. वैसे भी इस औफिस में उस का यह पहला प्रोजैक्ट था जिसे वह लीड कर रही थी. अगले ही पल उस ने खुद को संभाला और कंटीन्यू करते हुए प्रोजैक्ट को समाप्त किया.

‘‘ओके मैम गो अहैड वी आर ऐक्साइटेड टू सी योर वर्क,’’ यह कह कर जैसे ही उस के बौस अमनजी हाल से बाहर निकले कि उस के सामने वही युवक यानी आलोक आ खड़ा हुआ.

‘‘ओह व्हाट इज प्लेजैंट सरप्राइज टू सी यू हेयर बाय द वे हाउ आर यू?’’ कहते हुए आलोक ने अपना हाथ अदिति की तरफ बढ़ा दिया.

‘ओह यस आई एम आल्सो शौक्ड टू सी यू हेयर. मुझे नहीं पता था कि इतने समय बाद तुम यहां इस तरह से मिलोगे. तुम बैंगलुरु से पूना कब शिफ्ट हुए? कब यह कंपनी जौइन की?’’

‘‘अरे बाप रे इतने सारे सवाल एकसाथ. 3 साल पहले स्विच कर के मैं ने आईसीआईसीआई जौइन किया था. अभी पिछले महीने ही एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में आया हूं. तुम ने कब यहां जौइन किया?’’ आलोक ने उत्सुकतापूर्वक पूछा.

‘‘अभी 2 महीने पहले ही मैं ने स्विच कर के यहां जौइन किया है और यह मेरा पहला प्रोजैक्ट था,’’ अदिति ने कहा.

‘‘और बताओ आंटी कैसी हैं? तुम्हारी जौब कैसी चल रही  है?’’ आलोक ने बात को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से कहा.

‘‘आल इज वैल ऐंड आल आर बिजी इन देयर वर्क, बाय द वे घर पर मेरा सब इंतजार कर रहे होंगे चाय पर. मैं चलती हूं,’’ कह कर अदिति अपनी कार स्टार्ट कर चल दी.

कार चलातेचलाते उसे बीते दिनों की यादें कुरेदने लगीं और वह मन ही मन सोचने लगी, कहां से यह आलोक आ टपका और अगर दिल्ली आना ही था तो यहां मेरी ही कंपनी में. अब हर दूसरे दिन इस का सामना करो और फालतू के सवालों के जबाब दो. खैर, वह कुछ और अतीत में गोते लगाती तभी सिगनल ने ग्रीन लाइट दी, उस ने कार स्टार्ट की और कुछ ही समय में वह अपनी सोसाइटी में आ पहुंची. कार पार्क कर के जैसे ही घर में घुसी तो समोसों की खुशबू से उस का दिल खुश हो गया.

‘‘अरे मां आप से कितनी बार कहा है कि इन सब झंझटों में मत पड़ा करो, आजकल बाजार में सब मिलता है,’’ अदिति ने अपनी सास के गले लगते हुए कहा.

‘‘तो मैं कब कह रही हूं कि बाजार में नहीं मिलता पर बेटा अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाने के सुख के आगे ये रैडीमेड फूड आइटम्स बेकार हैं. मुझे पता था कि आज तेरा इस नई कंपनी में पहला प्रोजैक्ट है और समोसे तुझे पसंद हैं तो समोसे तेरी पसंद के और यह सूजी का हलवा उत्कर्ष की पसंद का. ले खा कर बता कैसे बने हैं?’’ कहते हुए मां ने आधा समोसा मेरे मुंह में भर दिया.

‘‘वाऊ मां इन समोसों के आगे तो सारी दुनिया के समोसे फेल हैं,’’ कहते हुए मैं ने मां के गाल पर एक पप्पी जड़ दी.

‘‘मैं फ्रैश हो कर आती हूं तब तक उत्कर्ष भी आ जाएगा फिर सब मिल कर चाय पीएंगे,’’ कहते हुए मैं बाथरूम में फ्रैश होने चली गई.

वाशबेसिन में मुंह धोतेधोते मुझे अचानक फिर से आलोक का चेहरा याद आ गया. आलोक जो मेरी जिंदगी में होशोहवास में किए गए पहले प्यार का एक झांकी जैसा था, जिसे मैं ने पूरी शिद्दत से चाहा था, जिस के साथ मैं ने अपनी जिंदगी की खुशियों के सपने देखे थे. आश्चर्य तो इस बात का था कि यह कहीं से भी वन साइडेड लव नहीं था और सारे सपने मैं ने अकेली ने नहीं बल्कि हम दोनों ने मिल कर देखे थे पर न जाने क्यों वे सारे सपने खुली आंखों से देखे सपने ही बन कर रह गए थे. उस प्यार की ठंडी मंद हवा के ?ांकों में हम दोनों डूब कर महसूस कर पाते उस से पहले ही सब छिन्नभिन्न हो गया था.

मैं इस के आगे का कुछ सोच पाती तभी मुझे उत्कर्ष की आवाज आई, ‘‘अरे अदिति

जल्दी निकलो क्या आज बाथरूम में ही सोने का इरादा है.’’

सुन कर मैं जल्दी से अपना मुंह तौलिए से पोंछ कर बाहर निकली और डाइनिंगटेबल पर आ कर बैठ गई. मां ने चाय के साथसाथ पूरा नाश्ता ही टेबल पर लगा दिया था. 1 घंटे तक बातें कर के हम अब अपनेअपने काम में लग गए. उत्कर्ष अपनी वाक पर और मां अपनी दोस्तों के साथ पार्क में घूमने चली गईं. डिनर बना कर तो सुशीला मेड चली गई थी बस केवल टेबल पर लगाना था सो मैं आ कर कुछ देर आराम करने के लिए बैड पर लेट गई.

जैसे ही मैं ने अपना सिर तकिए पर टिकाया अचानक 6 साल पहले के बैंगलुरु केदिन याद आ गए, जब मैं पहली बार आलोक से मिली थी. मैं ने अपनी पहली कंपनी छोड़ कर नई कंपनी में जौइन किया था और आलोक मेरा फर्स्ट बौस था. नई कंपनी थी सो काम के सिलसिले में अकसर हम दोनों मिलते रहते. स्वभाव से बेहद सौम्य और सरल आलोक मु?ो पहली ही नजर में अच्छा लगने लगा था. कुछ ही दिनों में हमारी बहुत अच्छी मित्रता हो गई थी. एक दिन मैं औफिस नहीं गई तो आलोक का फोन आ गया, ‘‘क्या हुआ आज औफिस नहीं आईं?’’

‘‘कल रात से बहुत बौडिएक हो रहा था और कुछ फीवर भी लग रहा है तो मैं ने सोचा आज आराम कर लूं.’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया. पर इस के कुछ देर बाद ही मेरे घर की कालबैल बजी. दरवाजा खोला तो सामने आलोक पैथोलौजी वाले को ले कर खड़ा था.

‘‘अरे तुम यहां और ये कौन हैं?’’ मैं ने पैथोलौजी वाले की तरफ इशारा कर के पूछा.

‘‘तुम्हें पता नहीं है क्या कि आजकल डेंगू कितना फैल रहा है. इन्हें अपने ब्लड का सैंपल दो ताकि पता चले कि ऐक्चुअली हुआ क्या है. ऐसे सिर बांध कर पड़े रहने से तो काम नहीं चलेगा न, 2-4 दिन बाद पता चलेगा तुम नौर्मल फीवर मान कर पड़ी रहीं और उधर डेंगू बढ़ गया,’’ आलोक ने कुछ हैरान होते हुए कहा.

खैर, मैं ने ब्लड सैंपल दिया. बहुत सारी हिदायतें दे कर आलोक उस दिन चला गया. अगले दिन सुबहसुबह ढेर सारी दवाएं, फल और ड्रिंक्स ले कर आलोक हाजिर था. उसे इस तरह लदाफदा देख कर मैं चौंक गई. ‘‘यह क्या पूरा बाजार ही खरीद लाए हो. इतना दर्द है पूरे शरीर में कि उठते तक नहीं बन पा रहा और अभी तक रिपोर्ट भी नहीं आई है,’’ मैं ने ?ां?ालाते हुए कह कर उठने की असफल कोशिश की.

‘‘रिपोर्ट आ गई है मैं ने अपने नंबर पर मंगवाई थी ताकि तुम नाहक परेशान न हो. तुम्हें डेंगू हुआ है और डेंगू होने का मतलब है कि कम से कम 15 दिन तो तुम्हें पूरी तरह ठीक होने में लगेंगे. मैं ने तुम्हारे पेरैंट्स को इन्फौर्म कर दिया है. शायद शाम तक वे आ जाएं. देखो डेंगू की कोई खास मैडिसिन नहीं होती केवल आराम करो और जम कर लिक्विड लो ताकि प्लेटलेट्स कम न होने पाएं. लो यह दवा खा लो. अभी प्लेटलेट्स ठीक हैं पर यदि कम हुए तो हौस्पिटल में एडमिड होना पड़ेगा.’’

‘‘उफ, यह कैसे हो गया? अब कैसे ठीक होगा?’’ कह कर मैं बुरी तरह रोने लगी.

किसी तरह आलोक ने मु?ो चुप कराया. मु?ो नौकरी करते अभी केवल 2 साल ही हुए थे और मैं घर से बाहर पहली बार बीमार पड़ी थी. अगले ही दिन फ्लाइट से मेरी मम्मी इंदौर से बैंगलुरु आ गई थीं तब तक आलोक ने ही औफिस से छुट्टी ले कर मेरा पूरा ध्यान रखा. मम्मी को जरूरी हिदायतें दे कर आलोक चला गया.

कहना न होगा कि आलोक के कारण ही मेरा डेंगू समय पर डायग्नोस हो गया और 1 सप्ताह के बाद मैं घर में रह कर ही ठीक भी हो गई पर कमजोरी बहुत थी इसलिए आलोक की ही  सलाह पर मैं ने 1 वीक की लीव और ले ली.

इस के बाद हम दोनों और अधिक नजदीक आ गए. हम दोनों को हर जगह एकसाथ देख कर अब औफिस के लोग भी मजाक बनाने लगे थे और हम औफिस में तोतामैना के नाम से फेमस हो गए. वक्त इसी तरह खुशनुमा बीत रहा था और हमारा प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ रहा था कि एक दिन अचानक औफिस आते हुए आलोक का ऐक्सीडैंट हो गया.

आलोक के पैर में फ्रैक्चर हो गया. पैर में 1 माह के लिए प्लास्टर चढ़

गया और डाक्टर की सलाह पर आलोक ने कुछ समय वर्क फ्रौम होम ले लिया.

आलोक की मम्मी भी दिल्ली से उस की देखभाल करने आ गई थीं. मैं भी लगभग रोज आलोक से मिलने जाती. साथ ही कभी उस के लिए नूडल्स, पेस्ट्री और अन्य चीजें भी ले कर जाती.

एक दिन आलोक की मम्मी शायद बाजार गई थीं कि अचानक आलोक ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बिना किसी लागलपेट के बोला, ‘‘अदिति क्या तुम इसी तरह जिंदगीभर साथ देने को तैयार हो?’’

मैं ने भी सहमति में अपनी पलकें ?ाकाते हुए हां में सिर हिला दिया. इस के बाद तो हम दोनों के प्रेम को मानो पंख लग गए. चूंकि मेरी अपनी मां के साथ बहुत अच्छी बौंडिंग थी सो मैं ने पूरा घटनाक्रम जस का तस अपनी मम्मी को भी बता दिया. मम्मी 1-2 बार आलोक से मिल भी चुकी थीं सो उन्होंने भी इस में सहमति दिखाई. हम दोनों ने ही शायद अपनेअपने मन में एकदूसरे के साथ सुनहरे भविष्य के सपने देखने प्रारंभ कर दिए थे.

एक दिन शाम को जब हम दोनों एक कैफे में थे तो आलोक ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले

कर कहा, ‘‘अदिति मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी जिंदगी में तुम जैसी कोई लड़की आएगी. देखना हम दोनों कितने अच्छे कपल साबित होंगे, मैं किसी दुख का साया भी तुम्हारे ऊपर नहीं पड़ने दूंगा.’’

‘‘अरे तुम तो ऐसे बातें कर रहे हो जैसे कल ही हमारी शादी होने वाली है. अभी तो हमें अपने घर में बताना है. अगर आंटी ने मना कर दिया तो?’’ मैं ने कुछ शंकालु सा होते हुए कहा.

‘‘अरे नहीं यार मेरे पेरैंट्स ऐसे नहीं हैं

और हां यह तुम कान खोल कर सुन लो अगर तुम्हारी मम्मी ने हमारी शादी करने में जरा भी

देर लगाई तो मैं तुम्हें तुम्हारे घर से उठा कर ले जाऊंगा क्योंकि मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

इसी तरह समय बीत रहा था. आलोक के पूरी तरह ठीक हो जाने पर उस की मम्मी

वापस दिल्ली चली गई थीं हां इस बीच में जब मेरी मम्मी बैंगलुरु आईं तो वे उस की मम्मी से 1-2 बार में औपचारिक रूप से मिलीं जरूर थीं पर इस के आगे कोई बात नहीं हुई थी.

वे सर्दियों के दिन थे जब मम्मी ने मुझे से कहा, ‘‘बेटा मैं चाहती हूं कि अब जबकि तुम और आलोक एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताना तय कर ही चुके हो तो क्यों न इस रिश्ते को शादी का अंजाम दे दिया जाए. तुम आलोक से बात कर के मुझे फाइनल बताओ कि मैं उस के पेरैंट्स से मिलने कब जाऊं.’’

अगले दिन खुश होते हुए मैं ने जब

आलोक को यह बात बताई तो वह खुशीखुशी बोला, ‘‘अरे वाह तुम्हारी मम्मी कितनी सम?ादार हैं उन्होंने कैसे सम?ा लिया कि ये लैलामजनूं अब अलग नहीं रह पा रहे. मैं अगले वीकैंड पर जा रहा हूं दिल्ली तभी मांपापा से बात करता हूं और फिर तुम्हें बताता हूं.’’

मगर इस के बाद जब आलोक दिल्ली से बैंगलुरु लौटा और मुझ से मिला तो बहुत उदास था मेरे ज्यादा कुरेदने पर बोला, ‘‘पापा को तो कोई प्रौब्लम नहीं है पर मां इस शादी के लिए जरा भी तैयार नहीं हैं.’’

‘‘तैयार नहीं हैं मतलब? क्या उन्हें हम दोनों के रिश्ते के बारे में कोई अंदाजा नहीं था? क्या तेरी अपनी मां से बात नहीं होती?’’ मैं ने उत्तेजित होते हुए कहा.

‘‘बात होती है पर हां मैं ने इस बारे में मां को कभी कुछ नहीं बताया था.’’

‘‘मां को बताया नहीं और जिंदगी एकसाथ बिताने के सपने देखने लगे तुम, वाह

क्या बात है आलोक तुम्हारा भी कोई जवाब नहीं. बाय द वे आंटी के तैयार न होने का कारण क्या है?’’ अब तक मेरी आवाज काफी एग्रैसिव हो गई थी.

‘‘कोई ऐसी विशेष बात नहीं है जिसे मैं तुम्हें बता पाऊं बस हैं कुछ रीजन्स जिन पर उन्हें आपत्ति है. पर तुम इतनी नाराज मत हो मैं अपनी मां को अच्छी तरह जानता हूं मैं किसी तरह उन को मना लूंगा तुम चिंता मत करो.’’

‘‘मना लूंगा का क्या मतलब है आलोक? मेरी मां शादी की तैयारी कर के बैठी हैं और

तुम कह रहे हो मना लोगे,’’ मैं ने फिर गुस्से से कहा.

‘‘देख अभी हम शादी के लिए थोड़ा रुक जाते हैं. मैं कुछ टाइम में मम्मी को मना लूंगा तब हम शादी कर लेंगे,’’ आलोक ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘वैसे आंटी की प्रौब्लम क्या है, कहीं मेरी मां तो नहीं उन की परेशानी का कारण? क्या तुम्हें नहीं पता था कि तुम्हारी मम्मी इतनी दकियानूसी सोच वाली महिला हैं,’’ मैं ने गुस्से से व्यंग्यपूर्वक कहा.

‘‘उन्हें लगता है कि तुम अपनी मम्मी की एकमात्र संतान हो और आगे चल कर तुम्हारी मम्मी की जिम्मेदारी का भार हम पर आएगा, जिस से तुम उन की तरफ ध्यान कम दे पाओगी. उन्हें एक पंडित मनुस्मृति का वह श्लोक भी पढ़ा गया है जिस में कहा गया है कि पुत्रिका पति. जहां पुत्री उत्तराधिकारी वहां शादी नहीं करनी चाहिए, उन्होंने मुझे मनुस्मृति का वह श्लोक भी पढ़वाया है. पर तुम चिंता मत करो मैं मम्मी को मना लूंगा इस शादी के लिए,’’ आलोक ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘और वे नहीं मानीं तो? फिर क्या करोगे तुम? क्या तुम या तुम्हारे पेरैंट्स इस पंडित की बात को ठुकरा देंगे,’’ मैं ने तलख स्वर में कहा और गुस्से में पैर पटकती हुई घर आ गई. पहली बार मु?ो आलोक के स्वर में परेशानी, हैरानी और डर सबकुछ दिखा.

मेरे घर पहुंचने के 3 घंटे बाद ही आलोक का फोन आ गया, ‘‘अदिति प्लीज मेरी स्थिति सम?ाने की कोशिश करो… मैं एकदम से कुछ नहीं कर पाया. उस समय पंडितजी सामने ही बैठे थे.’’

‘‘प्लीज आलोक मुझे अभी अकेला छोड़ दो, मैं अभी कोई भी बात करने के मूड में नहीं हूं,’’ और गुस्से में मैं ने मोबाइल बंद कर दिया.

मंडे को लंच टाइम में आलोक ने फिर एक बार मुझे पकड़ लिया और फिर से शुरू हो गया, ‘‘मैं मना लूंगा मां को अदिति तुम मेरी बात तो मानो, वे मान जाएंगी, मैं उन की कमजोरी हूं. वे मेरी बात को मना नहीं कर पाएंगी. उन्हें कुछ वक्त देते हैं.’’

‘‘आलोक तुम उन की कमजोरी हो मैं नहीं. देखो तुम आंटी को मना लो या न मना लो मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अब मैं इस शादी के लिए जरा भी तैयार नहीं हूं क्योंकि जिस घर में मेरी ऐक्सैप्टैंस खुशीखुशी न हो, मुझे लाने के लिए तुम्हें अपनी मां की मिन्नतें करनी पड़ें उस घर में मेरी इज्जत क्या होगी यह मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं. आज भले ही तुम्हारी मां तुम्हारे प्रैशर में मान भी जाएं पर आगे दिल से मु?ो वे कभी ऐक्सैप्ट नहीं कर पाएंगी और जिस घर में मेरी ही इज्जत नहीं वहां मेरी मां की क्या इज्जत होगी इसलिए अब मैं तुम्हारे साथ शादी तो नहीं कर सकती. जहां बेटे की इच्छा नहीं पंडेपुजारी की चलती हो मैं उसे टाटावाय कहना ही बेहतर समझूंगी. मैं ने रिश्ते की संभावना पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा.

‘‘अरे यार ऐसा कुछ नहीं है तुम कुछ ज्यादा ही सोच रही हो. मैं कह रहा हूं न मैं मां को मना लूंगा,’’ आलोक ने फिर मेरे दोनों कंधे प्यार से दबाते हुए कहा पर मां को मनाने की बात ने तो मानो मेरे आत्मसम्मान को ही आहत कर दिया था सो मैं ने उस की पकड़ को थोड़ा ढीला किया और बोली, ‘‘पर मुझे ऐसे घर में नहीं जाना जहां खुशी से मुझे ऐक्सैप्ट नहीं किया जाए और तुम क्या मना लोगे जिसे इतना आगे बढ़ने से पहले यह नहीं पता कि मेरी मां इस रिश्ते को तैयार होंगी या नहीं. जिन मातापिता के साथ तुम अब तक के 28 साल से साथ रहते आए हो उन के स्वभाव के बारे में तुम्हें नहीं पता.

‘‘मेरे साथ जीनेमरने के वादे करने से पहले एक बार अपनी मम्मी को तो विश्वास में लेना था. जहां तक मेरी मां की बात है, मैं 6 साल की थी जब मेरे पापा से मम्मी ने डायवोर्स लिया था. नौकरी करते हुए उन्होंने मुझे आत्मनिर्भर बनाया है, उन के लिए मैं ही सबकुछ हूं और जिस दिन, जिस समय उन्हें मेरी जरूरत होगी मैं उन के लिए तत्पर होऊंगी. मेरे लिए मेरा और मेरी मां का आत्मसम्मान सब से पहले है,’’ कह कर मैं ने अपना बैग उठाया और गुस्से से वहां से वापस चली आई.

घर आ कर मैं ने रोतेरोते मां को सारी बात बताई. मां ने सब से पहले मुझे चुप कराया और फिर बोलीं, ‘‘देखो बेटा जल्दबाजी में कोई निर्णय मत लो. यदि आलोक तैयार है तो हम कोर्ट में शादी कर सकते हैं पर इस के लिए आलोक को अपनी मम्मी के अगेंस्ट जाने का साहस करना होगा क्योंकि उन के मानने का इंतजार कब तक किया जाए. कब तक हम लोग यों असमंजस की स्थिति में बने रहोगे. मान लो वे 5 साल तक नहीं मानीं तो? मेरे हिसाब से तुम लोग कोर्ट मैरिज के डिसीजन से उन्हें अवगत करा दो आना होगा तो आ जाएंगी वरना बाद में तो सभी अपनेआप धीरेधीरे मान ही जाते हैं.’’

मुझे भी मम्मी की बात सही लगी सो अगले दिन लंच में सारी बात आलोक को बताई तो आलोक एक दाम से बिदक गया और बोला, ‘‘कैसी बात कर रही हो तुम और तुम्हारी मम्मी. तू ही बता अगर तू मेरी जगह होती तो क्या करती?’’

‘‘मेरी बात मत करो आलोक मैं तो अपनी मां को बिना बताए इतना आगे नहीं आती और यदि बाय द वे नहीं मानतीं तो मैं तुम्हारा साथ देती और उन के खिलाफ जाने की हिम्मत रखती, तुम्हें इंतजार करने को नहीं कहती. हम दोनों के प्यार की सजा मैं तुम्हें कभी नहीं देती?’’ मैं ने स्पष्ट रूप से कहा.

‘‘अरे यार मेरे लिए तो यों कर पाना पौसिबल नहीं है. मैं भी अपने मातापिता का इकलौता बेटा ही हूं कैसे उन्हें इतना दुख दे दूं?’’

‘‘तो फिर तुम्हें उन की पसंद की लड़की से ही शादी करनी थी न,’’ इस के बाद मैं उठ कर अपनी डैस्क पर चली गई.

यह मेरी और आलोक की आखिरी बात थी. इस के बाद मैं ने अपने मोबाइल से आलोक का, व्हाट्स अप चैट और सोशल मीडिया से सभी संपर्क सूत्रों को समाप्त कर दिया था. कुछ दिनों की उदासी के बाद अपनी मां की सहायता से मैं इस झटके से उबर गई थी. कुछ ही दिनों में मैं ने अपनी कंपनी से स्विच कर लिया और पूना शिफ्ट हो गई ताकि मेरे मन में बैंगलुरु की कोई भी याद शेष न रहे. इस के बाद काफी दिनों तक आलोक ने विभिन्न माध्यमों से मुझ से संपर्क करने की कोशिश की पर मैं ने तो उसे अपने दिल से निकाल दिया था सो अब बात करने का कोई औचित्य ही था.

जिंदगी अपने ढर्रे पर चल निकली थी. मैं तो न जाने कब तक अपनी ही दुनिया में खोई रहती पर डोरबैल की आवाज ने मेरे विचारों पर अंकुश लगा दिया और मैं ने दौड़ कर दरवाजा खोला, सामने उत्कर्ष थे.

‘‘अरे इतनी जल्दी आ भी गए?’’ मैं ने अचकचाते हुए कहा.

‘‘सो गई थीं क्या? उसी समय पर ही तो आया हूं जिस पर रोज आता हूं.’’

‘‘अरे हां थोड़ी आंख लग गई थी,’’ मैं ने अपनी ?ोंप मिटाते हुए कहा. मैं ने फटाफट डिनर लगाया और खापी कर सब सोने चले गए.

अगले दिन मैं बस औफिस पहुंची ही थी की आलोक मेरी डैस्क के सामने आ कर बैठ गया.

‘‘आलोक देखो यह औफिस है और वैसे भी मेरातुम्हारा रिश्ता, सिर्फ इंप्लोई का है उस से बढ़ कर कुछ नहीं सो प्लीज आप अपना काम करें और मुझे अपना करने दें,’’ मैं ने कुछ बेरुखी से कहा.

‘‘अदिति प्लीज ऐसे मत बोलो. मैं अभी भी तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. लौट आओ न एक बार. अब तो मां को भी कोई आपत्ति नहीं होगी.’’

‘‘क्या बात कर रहे हो तुम. तुम क्या सम?ाते हो मैं कोई गुडि़या हूं. यही तो समस्या है तुम लड़कों की. तुम चाहते हो कि हम लड़कियां तुम्हारे हिसाब से और तुम्हारे धर्म के पाखंडों के हिसाब से सब काम करें. आलोक हम लड़कियों का भी वजूद और आत्मसम्मान होता है. अब वे जमाने गए जब यह कहा जाता था कि बेटी पराया धन है. मु?ो इस मुकाम तक पहुंचाने में मेरी मम्मी ने भी उतना ही परिश्रम और पैसा खर्च किया है जितना तुम्हारे पेरैंट्स ने किया है.

‘‘6 साल पहले तुम अपनी मम्मी को मनाने तक मुझे इंतजार करने को कह रहे थे बजाय अपनी मां को सम?ाने के. सही बात के लिए भी तुम अपनी मां के अगेंस्ट जाने का साहस नहीं कर पाए और देखो मां की अनुमति के इंतजार में आज तक 6 साल पहले वाली जगह पर ही खड़े हो. मैं यह नहीं कहती कि अपनी मम्मी का तुम अपमान करते या उन्हें दुख देते पर बड़े लोगों का अपना नजरिया होता है और उसे प्यार से बदलना हम युवाओं की जिम्मेदारी होती है.

‘‘यदि तुम्हें खुद पर भरोसा होता तो तुम मुझे कहते कि अदिति मेरी मम्मी जब खुशीखुशी तुम्हें स्वीकार करेंगी तभी मैं शादी करूंगा तो मैं जिंदगीभर तुम्हारा इंतजार करती पर तुम्हें तो खुद पर ही भरोसा नहीं था कि वे मानेंगी भी या नहीं. खैर, अब इन बातों का कोई मतलब नहीं है फार योर काइंड इन्फौर्मेशन मैं ने उसी दिन मूव औन कर लिया था जिस दिन तुम से सारे रिश्ते मैं ने समाप्त किए थे.

‘‘हां और बता दूं कि मेरी ससुराल में मेरी मां का भी उतना ही सम्मान है जितना मेरी सासू का. प्लीज आज के बाद मुझे इस तरह से परेशान करने की कोशिश मत करना. वी आर औनली ऐंड प्लीज लीव मी.’’

इस के बाद आलोक उठ कर चला गया. लगभग 2 वर्ष पहले की बात है जब मेरी मामी अपनी बहन के बेटे उत्कर्ष का रिश्ता मेरे लिए ले कर आई थीं.

उत्कर्ष जानपहचान में थे सो मेरी मां इस रिश्ते को ले कर कुछ ज्यादा उत्सुक थीं. बोलीं, ‘‘देख बेटा इस संसार में सब एकजैसे नहीं होते. आलोक ने तेरे साथ जो किया इस का मतलब यह नहीं कि सभी यही करेंगे. मैं कब तक तेरे साथ के लिए बैठी रहूंगी. तेरा घरसंसार बस जाए तो मैं भी अपनी जिम्मेदारी से मुफ्त हो जाऊंगी. तू लड़के से मिल ले हर तरीके से संतुष्ट हो जा तभी हम आगे बढ़ेंगे इस बात का प्रौमिस है.’’

मां की इतनी बेचारगी मुझ से देखी नहीं जाती थी सो मैं ने हां कर दी थी. सोचतेसोचते कब मेरी आंख लग गई मु?ो पता ही नहीं चला.

अचानक जब मेरे कानों में बरतनों की खटखटाहट पड़ी तो मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी, घड़ी देखी तो सुबह के 9 बज रहे थे. वह तो अच्छा था कि आज वीकैंड था सो औफिस जाने की जल्दी नहीं थी. मैं अपने बालों को बांधती हुई बाहर आई तो देखा मां और उत्कर्ष ने सुशीला से जलेबी का नाश्ता बनवाना शुरू कर दिया.

‘‘ओह टाइम का पता ही नहीं चला और 9 बज गए.’’

‘‘तो क्या हो गया बेटा एक वीकैंड ही तो मिलता है सोने को तुझे. कोई अफसोस मत कर. फटाफट फ्रैश हो ले फिर मिल कर नाश्ता करते हैं.’’

नाश्ता करने के बाद जब थोड़े रिलैक्स मूड में बैठी तो फिर मन कुछ अधूरी दास्तान में खो सा गया. एक बार फिर मुझे उत्कर्ष से अपनी पहली मुलाकात याद आ गई. उस दिन संडे था जब उत्कर्ष हमारे घर आने

वाले थे. मम्मी ने सुबह से ही मामीजी को काम करने के लिए बुला लिया था. नियत दिन पर उत्कर्ष अपनी मम्मी और बड़ी बहन के साथ हमारे घर आए.

उत्कर्ष की बड़ी बहन यूएसए में जौब कर रही थी और वहीं अपने पति यानी उत्कर्ष के जीजाजी के साथ सैटल्ड थीं. इस समय वे इंडिया आई हुई थीं और इसीलिए उत्कर्ष की मम्मी जल्दी से जल्दी अपने बेटे की शादी कर देना चाहती थीं. औपचारिक बातें हो चुकने के बाद सभी ने हमें अकेले में बात करने भेज दिया.

जैसे ही हम ऊपर पहुंचे बिना किसी औपचारिकता के मैं ने कहा, ‘‘क्या आप के परिवार के सभी सदस्य इस रिश्ते के लिए

तैयार हैं?’’

‘‘तैयार हैं तभी तो आप से मिलने आए हैं वरना क्यों आते,’’ उत्कर्ष ने मंद मुसकान के

साथ कहा.

‘‘आप को पता है न कि मैं अपनी मम्मी

की इकलौती संतान हूं. मैं जब 6 साल की थी तभी मेरे पापा और मम्मी अलग हो गए थे. मेरी मम्मी के कारण ही आज मैं एक अच्छी जौब में हूं और अब मेरी बारी है अपनी मां के लिए कुछ करने की.’’

‘‘तो ठीक है न हम दोनों की ही मम्मियां अकेली हैं तो क्यों न हम मिल कर दोनों की जिम्मेदारी उठाएं. अदिति यह आज की बहुत बड़ी जरूरत है कि हम सभी अपने मातापिता की जिम्मेदारी मिल कर इस तरह उठाएं कि उन्हें कभी अपनी परवरिश पर शक न हो, कभी अकेलापन महसूस न हो.’’

उत्कर्ष की स्पष्टवादिता ने मु?ो निरुत्तर कर दिया था और इस तरह 15 दिन के अंदर ही एक बेहद सादे समारोह में हमारा विवाह संपन्न हो गया. मेरी मम्मी इंदौर में थीं और उत्कर्ष की मम्मी यहीं पुणे में सैटल्ड थीं. विवाह के बाद हनीमून पर मालदीवस गए थे जब लौटे तो यहां पुणे में अपनी मम्मी को देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गई.

मम्मीजी ने हमारे जाने के बाद मेरी मम्मी को इंदौर से पुणे बुला लिया था ताकि उन्हें अकेलापन न महसूस हो. मम्मीजी के इस स्टैप की तो मैं कायल ही हो गई थी. जब 10 दिन बाद मेरी मम्मी ने इंदौर जाने की जिद की तो मम्मी जी बोलीं, ‘‘क्या करेंगी आप वहां जा कर, आप की बेटी तो यहां है. अकेले बोर हो जाएंगी.’’

‘‘अरे नहींनहीं मैं कब तक यहां बेटी के रहूंगी. इतने दिन रह ली वही बहुत बड़ी बात है,’’ मम्मी ने कुछ सकुचाते हुए कहा.

‘‘देखिए दी ये सब पुराने जमाने की बातें हैं जब लड़कियों के यहां रहना गलत सम?ा जाता था आज के जमाने में तो बेटियां मातापिता का गुरूर हैं. अगर बेटे के साथ मातापिता रह सकते हैं तो बेटी के पास क्यों नहीं?’’

मगर मम्मी कुछ दिनों बाद वापस आने का कह कर चली गई थीं. कुछ दिनों बाद

मां की बढ़ती उम्र और बीमारियों के कारण हम ने मां को पुणे शिफ्ट करने का निर्णय लिया.

जब बारबार कहने पर भी मां तैयार नहीं हो रही थीं तो एक दिन उत्कर्ष मम्मी का हाथ अपने हाथ में ले कर जमीन पर बैठ गए और बोले, ‘‘आप बताइए किस मां को अकेला छोड़ दूं आप को या पुणे वाली मां को. आप हमारे साथ नहीं रहना चाहतीं मत रहिएगा, हम आप को अपनी ही सोसाइटी में एक फ्लैट दिलवा देंगे जिस में आप आराम से अपने हिसाब से रहिएगा पर प्लीज यहां अकेले रहने की जिद मत करिए. हां आप चिंता मत करिए हम इंदौर वाले घर को भी बचेंगे नहीं. जब आप का मन होगा कुछ दिनों के लिए आप के साथ हम भी आया करेंगे.’’

उत्कर्ष का यह प्रस्ताव मां को पसंद आया और इस के बाद मां को हम ने अपनी ही सोसाइटी में 2 बीएचके फ्लैट दिलवा दिया जहां अकसर मां और उत्कर्ष की मां 2 सहेलियों की तरह रहती थीं और हम भी निश्चिंत हो कर अपने काम पर फोकस कर पा रहे थे पर आज भी सोचती हूं कि यदि उस दिन मैं ने आलोक के साथ अपने रिश्ते से मूव औन नहीं किया होता तो मेरी जिंदगी का नजारा कुछ और ही होता.

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