Smriti Shinde new show : राजनीतिक परिवार में जन्मीं प्रोड्यूसर स्मृति शिंदे, राजनेता सुशील कुमार शिंदे की बेटी हैं. उन को बचपन से ही कला के क्षेत्र में जाने की इच्छा थी. उन्होंने हमेशा लीक से हट कर काम करना पसंद किया और यही वजह है कि उन्होंने आम इंसान और उस की भावनाओं से जुड़ कर टीवी शो बनाना पसंद किया. उन के इस चौइस को पेरैंट्स का सहयोग हमेशा मिला है. खासकर पिता ने कभी भी किसी काम से उन्हें रोका नहीं. काम के दौरान उन्होंने शादी की और मां बनी, लेकिन किसी कारणवश उन का रिश्ता चल नहीं पाया और उन्होंने डिवोर्स ले लिया.
अब वे सिंगल मदर हैं और अपने बच्चों के साथ खुश हैं. सोनी सब पर उन की धारावाहिक ‘हुई गुम यादें, एक डाक्टर दो जिंदगियां’ चल रही हैं, जिसे ले कर वे बहुत खुश हैं।
उन्होंने अपनी जर्नी के बारे में गृहशोभा से बात की। पेश हैं, कुछ खास अंश :
अलग कौन्सेप्ट
यह शो उन के जीवन की सब से अलग और खास शो है। वे कहती हैं कि बाकी शो से यह एक अलग कौन्सेप्ट है, जो प्रेरणादायक रही. इस के अलावा अधिकतर शो में फीमेल प्रोटोगोनिस्ट होती हैं, लेकिन इस में एक पुरुष प्रोटोगोनिस्ट है. साथ ही जब हमें जीवन में एक अच्छा मौका मिलता है, तो उस में हम सभी अच्छा काम कर सकते हैं। मसलन, एक रिलेशनशिप हो या दैनिक जीवन में इसे सुधार सकते हैं, इसी पर आधारित शो है. इस के अलावा हर शो को कहने में एक चुनौती होती है। इस में एक डाक्टर और उस से जुड़े लोगों की कहानी है, जिस में उस की मैमोरी खो जाती है, ऐसे में लोगों का नुकसान और उन के संघर्ष को दिखाने की कोशिश की गई है.
बदलते दौर में बदली है टीवी
ओटीटी और शौर्ट फिल्मों की दुनिया ने टीवी को नुकसान पहुंचाया है और आज टीवी के दर्शकों की संख्या में कमी आई है, ऐसे में किसी धारावाहिक को काफी समय तक दर्शकों के बीच में बनाए रखने को ले कर स्मृति का कहना है कि मेरे हिसाब से टीवी का क्रेज कम नहीं हुआ है क्योंकि टीवी देखने वालों को ओटीटी समझ नहीं आता. इस के अलावा ओटीटी के कई शोज ऐसे हैं, जिन्हें हम परिवार के साथ बैठ कर नहीं देख सकते. हालांकि मैं भी ओटीटी बनाती हूं, जो टीवी से अलग दर्शकों के लिए होता है. पहले टीवी शोज औरतों के लिए बनती थी, क्योंकि वे रिलेटेबल होते थे, लेकिन अब स्त्रियों की विचारधारा बदली है. इसलिए अब मैं पुरुष प्रधान शो लाई हूं, जिसे दर्शक पसंद कर रहे हैं क्योंकि टीवी देखने के लिए कुछ सेटअप नहीं करना पड़ता। एक समय में आप रोज इसे देख सकते हैं. दर्शक नहीं बदले हैं, जबकि उन की लाइफस्टाइल बदली है, जिस से लग रहा है कि दर्शक कम हुए हैं, जबकि ऐसा नहीं है. कोविड में हर तरह के शो चल जाते थे क्योंकि तब दर्शकों के पास बाहर जा कर मनोरंजन के साधन नहीं थे. अभी सोशल मीडिया काफी ऐक्टिव हो चुकी है, जिस से लोगों को सबकुछ देखना संभव नहीं हो पा रहा है.
पसंद है चुनौती
टीवी पर टीआरपी का खेल अधिक होता है, जिस वजह से कई शो बीच में अचानक बंद कर दिए जाते हैं, इस चुनौती के बारें में स्मृति कहती हैं कि एक वूमन प्रोड्यूसर होने के नाते मैं इतना कहना चाहती हूं कि मुझे चुनौती पसंद है और जब मैं किसी शो को करती हूं, तो उस में मैं अपना बैस्ट देने की कोशिश करती हूं, ताकि शो सफल हो.
फौर्मूला नहीं
आजकल की फिल्मों का दौर काफी बदल चुका है, हिंसा वाली फिल्में अधिक बन रही हैं। कुछ फिल्म मेकर्स का मानना है कि आज की जैनरेशन ऐसी फिल्में पसंद करती हैं, जबकि स्मृति इस बात से सहमत नहीं।
वे कहती हैं कि सही कंटेंट को सही तरह से परदे पर लाने से सभी पसंद करते हैं, मसलन फिल्म ‘धुरंधर’ और ‘सैयारा’ भी इसलिए चलीं क्योंकि इन के विषय अच्छे थे. दिल से किसी भी विषय को बनाने और लोगों तक पहुंचने की कोशिश ही किसी फिल्म को सफल बनाती है. आज दर्शकों में धैर्य की कमी है, जिसे फिल्म मेकर को कहानी के जरीए दर्शकों को बांधने की जरूरत होती है. हर तरह के दर्शक आज हैं, हर तरह की अच्छी फिल्में चलती हैं, कोई अलग या सीधा फौर्मूला नहीं है.
वे कहती हैं कि इस के अलावा हर दौर में कुछ फिल्में बनाई इसलिए जाती हैं ताकि उस का प्रभाव लोगों पर पड़े. साल 1950 और 1960 में ऐसी ही फिल्में बनाई जाती रहीं. वर्ष 1960 में सैनिकों पर फिल्में अधिक बनीं क्योंकि तब युद्ध छिड़ा था, ताकि लोग सैनिकों के जीवन और उन के संघर्ष को देख सकें. बाकी किसी फिल्म से इन्फ्लूऐंस होना हर व्यक्ति पर निर्भर करता है, जिस में आप फिल्म की अच्छाई या बुराई को एडौप्ट अपने अनुसार ही करते हैं.
ठहराव वाली फिल्में मेरी पहली पसंद
स्मृति कहती हैं कि मैं ने हिंदी या मराठी में अधिक काम नहीं किए हैं, लेकिन जो भी किए हैं, वे सभी एकदूसरे से अलग रहे हैं. आगे भी मैं अलग और उम्दा विषय पर ही कुछ करने की इच्छा रखती हूं. मैं अधिकतर अलग विषय को ही खुद दर्शक के रूप में भी देखना पसंद करती हूं, जिस में कुछ अर्थ हो. मैं खुद भी रोमांटिक इंसान हूं और रोमांटिक, लेकिन ठहराव वाली फिल्में देखना चाहती हूं. मुझे शो ‘ये उन दिनों की बात है’ बहुत पसंद था.
राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद भी उन की रुचि ऐक्टिंग में नहीं बल्कि निर्माता बनने की रही क्योंकि उन्हें कहानी कहना पसंद है. वे कहती हैं कि मेरे पिता की रुचि भी इस ओर थी. वे स्कूल, कालेज में नाटकों में भाग लिया करते थे. उन्हें फिल्मों और संगीत का बहुत शौक है. घर में कला का माहौल बचपन से मैं ने देखा है. मेरी मां गाती थीं. टीवी के माध्यम से मैं कुछ न कुछ करना चाहती थी, जिस में मेरी चौइस बहुत अलग है. मैं अच्छी कहानी को कहना पसंद करती हूं, अगर इस के साथ कोई मैसेज चली जाए तो मुझे अच्छा लगता है.
खुद को दें समय
स्मृति का कहना है कि हर स्त्री को अपने अंदर की खुशी को देखते हुए काम करना चाहिए. अधिकतर स्त्रियां अपने पति और बच्चों के लिए सबकुछ करती हैं, पर अपने लिए कुछ करना भूल जाती हैं, जिस का मलाल उन्हें सालों बाद होता है. वक्त परिवार में बांटिए, पर उस में से कुछ समय अपने लिए अवश्य निकाल लीजिए.
