Nepotism in bollywood and sports : कहते हैं,’यह इश्क नहीं आसान बस इतना समझ लीजिए इक आग का दरिया है और डूब के जाना है…’ और एक सच यह भी है कि इश्क सिर्फ इंसान से ही नहीं होता अपने काम और पैशन से भी होता है. वह पैशन जिस का सपना हम बचपन से देखते हैं और उस सपने को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक गुजरने को तैयार रहते हैं.
अपने पैशन के प्रति यह प्यार लैलामजनूं के इश्क से भी खतरनाक होता है क्योंकि इस सपने पर हमारी जिंदगी टिकी होती है और अगर ग्लैमरवर्ल्ड या स्पोर्ट्स वर्ल्ड की बात करें, तो इस जगह पर नाम कमाने का सपना हजारों, लाखों और करोड़ों लोग देखते हैं, जिन में से कुछ चंद लोग ही होते हैं जो अपने सपने को कामयाब होते देख पाते हैं.
स्पोर्ट्स वर्ल्ड हो या ग्लैमरवर्ल्ड, यहां जगह बनाना कांटों पर चलने जैसा ही होता है और वह भी खासतौर पर उन लोगों के लिए जिन के पास हुनर तो बेइंतिहा है लेकिन न तो ज्यादा पैसा है और न ही कोई गौडफादर और न ही कोई ऊंची पहचान. बावजूद इस के हर साल कई सारे आउटसाइडर मेहनत और टेलैंट पर भरोसा कर के ग्लैमर या स्पोर्ट्स वर्ल्ड में हाथ आजमाने आ जाते हैं, जिन में से कई सारे लोग कामयाब भी होते हैं तो कई जिंदगीभर धक्का खा कर वापस लौट जाते हैं.
शायद यही वजह है कि भारत में सब से ज्यादा और बेहतरीन टेलैंट होने के बावजूद ओलिंपिक में कई सारे मैडल, अभिनय क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार, औस्कर जैसे अवार्ड जीतने के बावजूद खासतौर पर खिलाड़ी और कलाकार वह मुकाम नहीं पा पाते जो वे डिजर्व करते हैं.
ग्लैमर हो या स्पोर्ट्स, इस क्षेत्र में हाथ आजमाने वाले लोग अपने संघर्षभरे सफर के साथ मंजिल पाने तक कई मुश्किलों से गुजरते हैं. इस के बावजूद ढेर सारी सफलता और कामयाबी मिलने के बावजूद आउटसाइडर्स को हमेशा मुश्किलों से गुजरना पड़ता है और उन के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार ही होता है.
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देश का नाम रोशन करने वाले सारे महान लोगों को हमेशा क्यों बुरे दौर से गुजरना पड़ता है? इस के विपरीत इसी क्षेत्र से जुड़े नामचीन लोगों के बच्चे बिना ज्यादा मेहनत किए उस जगह पर पहुंच जाते हैं जहां पर वे डिजर्व भी नहीं करते.
बौलीवुड इंडस्ट्री में कई ऐसे हिट कलाकारों के बच्चे हैं जिन्हें ऐक्टिंग का ‘ए’ भी ठीक से नहीं आता लेकिन उन को बड़ेबड़े निर्मातानिर्देशक लौंच करने से नहीं चूकते क्योंकि वे किसी बड़े स्टार के बच्चे हैं. इस के विपरीत शाहरुख खान, अक्षय कुमार, माधुरी दीक्षित, विद्या बालन जैसे कई कलाकार हैं, जो मोस्ट टेलैंटेड होने के बावजूद आज भी भेदभाव के शिकार में फंसे हुए हैं.
ऐसा ही कुछ हाल खिलाड़ियों का भी है जिन को ओलिंपिक में मैडल मिलने के बावजूद सरकार की तरफ से वह सुविधा नहीं मिली जिस के वे हकदार रहे. इस वजह से ओलिंपिक में मैडल कमाने के लिए मेहनत करने के अलावा वे अपनी रोजीरोटी कमाने के लिए अलग से नौकरी और काम भी कर रहे हैं.
ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश की आनबान और शान कहलाने वाले ये टेलैंटड लोग संघर्ष और कामयाबी के बावजूद क्यों भेदभाव का सामना कर रहे हैं? पेश हैं, इसी सिलसिले पर एक नजर.
हर साल ओलिंपिक में भाग लेने वाले प्रतियोगी गोल्ड और सिल्वर मैडल ले कर आते हैं और देश का नाम रोशन करते हैं फिर चाहे वह पीटी उषा हो, भारतीय हौकी पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी हों, जिन्होंने कांस पदक जीता था या मनु भाकर एअर पिस्टल में कांस्य पदक जीतने वाली पेरिस में भारत की पहली विजेता हों, बौक्सिंग में ओलिंपिक में अपनी अलग पहचान बनाने वाली मैरी कौम बौक्सर ही क्यों न हों, नीरज चोपड़ा जिन्होंने भाला फेंकने में कई स्वर्ण पदक हासिल किया है. अभिनव बिंद्रा, निशानेबाजी में, उधम सिंह हौकी खिलाड़ी आदि कई भारत के नामचीन खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपनी मेहनत के बलबूते पर न सिर्फ देश का नाम रोशन किया है बल्कि पूरे वर्ल्ड में पहचाने जाते हैं. बावजूद इस के इन खिलाड़ियों को संघर्ष से ले कर सफलता तक मैडल के अलावा कोई ऐसी सुविधा नहीं मिली जिस पर वे गर्व कर सकें.
आउटसाइडर होने के नाते क्रिकेट में महेंद्र सिंह धोनी हों या युवराज सिंह, हर किसी को अपनेआप को बनाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा है.
इसी तरह अगर ग्लैमरवर्ल्ड की बात करें तो अक्षय कुमार जहां निर्माताओं के औफिसों के चक्कर काटकाट कर बेइज्जती तक सहन कर के आज एक मुकाम पर हैं, तो बौलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन को संघर्ष के दिनों में कई निर्माताओं ने इलाहाबाद वापस जाने का टिकट तक दे दिया था, यह कह कर कि वे कभी ऐक्टर नहीं बन सकते क्योंकि न तो शक्ल है और न ही टेलैंट.
माधुरी दीक्षित ने भी फिल्मों में कामयाबी पाने के लिए काफी संघर्ष किया. वहीं विद्या बालन को जन्मकुंडली खराब होने का कारण बता कर साउथ की कई फिल्मों से बाहर कर दिया गया.
बौलीवुड में हाथ आजमाने वाले कई आउटसाइडर कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ग्रुपिज्म से परेशान हैं फिर चाहे वह कार्तिक आर्यन हों या दिवंगत सुशांत सिंह राजपूत.
कहने का मतलब यह है कि फिल्म इंडस्ट्री हो या स्पोर्ट्स वर्ल्ड खासतौर पर आउटसाइडर को अपने कदम जमाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है और कहीं न कहीं सफलता के बावजूद उन को सौतेले व्यवहार के तहत कई बार इंडस्ट्री से बाहर होना पड़ता है.
मिस वर्ल्ड और हीरोइन प्रियंका चोपड़ा इस बात का जीताजाता उदाहरण हैं जिन्होंने बौलीवुड की गंदी पौलिटिक्स से परेशान हो कर विदेश की तरफ अपना रूख कर लिया.
ग्लैमर वर्ल्ड में एक बार सफलता हासिल करने के बाद ऐक्टरों या मौडल्स या सिंगर के लिए काफी चीजें आसान हो जाती हैं लेकिन जो खिलाड़ी संघर्ष कर के देश का नाम रोशन करते हैं उन के लिए सरकार द्वारा वह सहूलियत नहीं मिलती जो विदेश में बसे खिलाड़ियों को उन के देश की सरकार देती है.
ग्लैमरवर्ल्ड या स्पोर्ट्स की दुनिया में काम कर रहे लोगों को आउटसाइडर होने के नाते ज्यादा परेशानियों से क्यों गुजरना पड़ता है इस के पीछे कई कारण हैं.
खेल या ग्लैमर वर्ल्ड में आउट साइडर होने के नुकसान और कारण
भारत में स्पोर्ट्स के लिए आए खिलाडियों को, जो छोटे शहरों और गांव से भाग लेने आते हैं, उन को जातिवाद, अमीरीगरीबी का भेदभाव, रंगभेद आदि कई कारणों से गुजरना पड़ता है. जैसेकि पिछले दिनों नैशनल बैडमिंटन के लिए आईं 22 लड़कियों को एक धर्मशाला जैसे सर्किट हाउस में एक ही कमरे में जमीन पर गद्दे बिछा कर एक ही कमरे में सोने की व्यवस्था के तहत रहना पड़ा था. इसी तरह फिल्मों के लिए भी जो लड़कियां छोटे शहरों से या गांव से आती हैं उन को अन्य लड़कियों से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है. इस के विपरीत जो लोग अमीर परिवार से होते हैं उन के लिए खेल और फिल्मों में काम पाना आसान होता है. अलबत्ता खेल के मैदान में ज्यादा अमीर आते ही नहीं हैं क्योंकि उन के पास न तो मेहनत करने के लिए इतनी ताकत होती है और न ही देश के लिए खेलने का जज्बा या जनून होता है.
खिलाड़ी बन कर कड़ी मेहनत करने के बजाय ये अमीर लोग बड़ी डिग्री ले कर इन खिलाड़ियों के बौस बन जाते हैं और जो एअरकंडीशन रूम में बैठ कर कौन से खिलाड़ियों को ओलिंपिक में भेजना है या किस को नहीं भेजना इस का निर्णय लेते हैं.
आउटसाइडर्स में शिक्षा और अंगरेजी न बोल पाने की कमी
गांवों से या छोटे शहरों से आए खिलाड़ी अपने अच्छे खेल की वजह से अपनी मंजिल तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन शिक्षा में कमी और अंगरेजी न बोलने की वजह से उन को पढ़ेलिखे लोगों के बीच भेदभाव का शिकार होना पड़ता है क्योंकि अपनी बात रखने के लिए या लोगों की बात समझने के लिए पढ़ालिखा होना और अंगरेजी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है.
यों तो हमारे देश में कई सारी भाषाएं हैं लेकिन अंगरेजी ही एक ऐसी भाषा है जो सिर्फ हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी हर जाति के लोगों को समझ आती है, जबकि बाहर से आए कलाकार या खिलाड़ी अंगरेजी बोलने के मामले में कमजोर होते हैं और बहुत ज्यादा पढ़ाई भी नहीं करते क्योंकि उन का ध्यान सिर्फ अपने खेल पर होता है.
ऐसे में कई कलाकार ऐसे भी हैं जो अशिक्षित होने की वजह से अपार सफलता पाने के बावजूद धोखेबाज लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर बरबाद हो गए हैं.
साउथ की ऐक्ट्रैस सिल्क स्मिता और बौलीवुड के ऐक्टर भगवान दादा इस बात का जीताजागता उदाहरण हैं, जो अशिक्षित थे. इस के अलावा खेल या ग्लैमर के मैदान में हाथ आजमाने आए ऐक्टर या खिलाड़ी आर्थिक तौर पर भी कमजोर होते हैं जिस की वजह से ऐसे आउटसाइडर प्रतिभावान लोगों को कई मामलों में समझौता करना पड़ता है या फिर वे अपनी काबिलियत के हिसाब से वह सफलता नहीं पाते जो वे डिजर्व करते हैं.
इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि अपना सपना पूरा करना या पैसा कमाना उतना ही जरूरी है जितना कि शिक्षित होना.
अगर आप टैलेंटेड होने के साथसाथ शिक्षित भी हैं तो आप को सम्मान के साथ सफल होने से कोई रोक नहीं पाएगा क्योंकि तब आप के पास टेलैंट के साथ चतुर दिमाग और भाषा में पकड़ भी होगी.
