Child development tips :
पहले अपनी गलतियां स्वीकार करें
बहुत पेरैंट्स बच्चों को छोटीछोटी बातों पर बड़ा लैक्चर देना शुरू कर देते हैं. पूरी कोशिश करते हैं कि बच्चे अपनी गलतियों पर माफी मांगें. लेकिन बहुत से बच्चे ऐसा नहीं करते. इस की एक वजह खुद पेरैंट्स हैं. बच्चे पेरैंट्स को भी बहुत गलतियां करते देखते हैं जैसे कोई सामान तोड़ देना, घर के किसी सदस्य से झगड़ते देखना या बच्चों को ही बिना किसी बात के डांट लगा देना. लेकिन पेरैंट्स इन सभी के लिए सौरी नहीं बोलते.
तो जब बच्चा मांबाप को उन की अपनी की गलती पर माफी मांगता नहीं देखेगा तो वह भी वैसा ही अनुसरण करेगा.
पेरैंट हुड एक ऐंजौयएबल स्टेज है. शादी की है तो पेरैंट बनना ही होगा और बनना भी चाहिए ताकि घर की हैप्पीनैस में बच्चों के बौंडिंग भी हो. मैरिड जोड़ों के लिए बच्चे एक चैलेंज होते हैं, जिस का हर स्टेज पर एक अजब सुख मिलता है.
अपने बच्चे को कामयाब बनाने के लिए मांबाप हर संभव प्रयास करते हैं. बेहतर खानपान, स्कूलकालेज सब की तैयारी जीजान से करते हैं. पर यह भी जरूरी है कि बच्चे को बड़ा करने, स्कूल व कालेज की तैयारी में लगाने से पहले पेरैंट्स भी तैयारी करें. अब आप कहेंगे भला मांबाप को क्या तैयारी करनी है. वे तो पढ़ाई का खर्चा, सुखसुविधा सब तो दे ही रहे है. फिर और क्या करें. तो चलिए जानते एक बच्चे को समर्थ और सक्षम बनाने के लिए किन तैयारी की आवश्यकता होती है:
व्यक्तित्व का निर्माण: सब से पहले तो नए पेरैंट्स को सम?ाना चाहिए कि उन्हें एक बच्चे को जन्म देना और पालनपोषण करना ही नहीं बल्कि एक संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना भी है, जिस में बच्चे का चरित्र, क्रियाप्रतिक्रिया, सोच, भावनाएं, विचार आदि सब निहित रहेगा. यह व्यक्तित्व ही समाज में उस की पहचान बनेगा.
एक विशाल और आदर्श व्यक्तित्व केवल खिलानेपिलाने और पढ़ाने से नहीं अपितु शिष्टाचार, नैतिकता, मानवता, सदाचार, बौद्धिकता के मिश्रण से बनता है. वह बहुत कुछ आसपास से सीखता है पर उसे अपना खुद भी खोजने दें, रैशनल बनने दें, ऐक्सपैरिमैंट करने दें.
अनुकूल वातावरण: बच्चे के विकास में उस के आसपास के वातावरण का बहुत प्रभाव पड़ता है. जैसे एक पौधे को गमले में लगाना ही काफी नहीं. समय पर उसे उचित मात्रा में पानी, खाद, धूप देना भी जरूरी है. ठीक वैसे ही बच्चे को केवल घर देना ही काफी नहीं बल्कि घर का वातावरण उस के विकास के अनुकूल बनाए रखना भी जरूरी है. घर के वातावरण से अभिप्राय एसीटीवी से नहीं बल्कि परिवार से मिलने वाले दुलार, ममता, देखभाल और डांट सभी से है.
इन सभी का उचित मात्रा में मिलना बच्चे के विकास के लिए बहुत जरूरी है. बच्चों को लगे कि वे पेरैंट्स से सबकुछ शेयर कर सकते हैं- अपने डर भी, अपने झगड़े भी और अपनी अचीवमैंट भी.
प्राथमिक शिक्षा: बच्चों को प्राथमिक यानी पहली शिक्षा हमेशा अपने घर से मिलती है और यह शिक्षा उन का व्यक्तित्व बनाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. बच्चे का आचरण, क्रिया, प्रतिक्रिया, भावनाएं, सोच इन सब का निर्माण उस के अपने घर से मिली शिक्षा और वातावरण पर निर्भर करता है.
एक छोटा बच्चा अपने मातापिता और परिवार को ही देख कर सीखता है जैसे बच्चे को आप सुबह उठ कर सब को गुड मौर्निंग बोलते नजर आओगे तो बच्चा भी आप को गुड मौर्निंग कहेगा और यदि आप सुबहसुबह चायकौफी पर चिकचिक करते नजर आएंगे तो वह भी शिकायत करता या चिल्लाता ही नजर आएगा. इसलिए जरूरी है कि बच्चों को उचित आचरण और शिष्टाचार ही दिखाया और सम?ाया जाए.
बच्चों को गलतियां करने दो: बहुत से पेरैंट्स बच्चों को छोटीमोटी गलतियां भी नहीं करने देते. उन के हर काम में हस्तक्षेप करते हैं, जिस से बच्चे कोई गलती कर ही नहीं पाते जो गलत है. अगर कोई गलती होगी ही नहीं तो वे गलतियों से सीखेंगे कैसे, कैसे वे सुधार करना सीखेंगे. पेरैंट्स यह भूल जाते हैं कि वे बच्चों के साथ हर समय तो नहीं रह सकते. एक न एक दिन बच्चों से कोई न कोई गलती तो होगी ही.
चाहे घर की चारदीवारी में हो या उस के बाहर. तब वह बच्चा कैसे उस गलती से डील करेगा? कैसे उसे सुधारेगा? वह शांत मन से परिस्थिति का आंकलन नहीं कर पाएगा क्योंकि उसे यह सीखने का मौका कभी मिला ही नहीं. फिर ऐसी स्थिति में या तो उस के हाथपांव फूल जाएंगे या वह परेशानी में कोई बड़ी गलती कर बैठेगा. इसलिए उसे गलती करने दें और उसे सुधारने का मौका भी दें. इस से उस की विवेक शक्ति बढ़ेगी.
उन का दोस्त बनें: बच्चों का दोस्त बनें यह बात जितनी पुरानी उतनी ही कारगर भी है. पेरैंट्स बच्चों से दोस्ती का रिश्ता बनाते हैं तो एक तो उन के और करीब आ जाते हैं, दूसरा बच्चे आप पर पहले से ज्यादा विश्वास कर पाते और बिना संकोच के आप से अपनी बातें शेयर कर पाते हैं जोकि अपने बच्चों के मनभाव को सम?ाने के लिए बहुत उपयोगी होती है.
बच्चों को एक दोस्त की तरह ही सुनें और सम?ों न कि पूरी बात सुनने पर उन की आलोचना करे या कोई कठोर प्रतिक्रिया दें. इस दोस्ती में मांबाप को धैर्य और संवेदना रखनी होती है.
सैल्फ केयर: सुबह दांत साफ करना और नहाना ही सैल्फ केयर नहीं है बल्कि शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी सैल्फ केयर है. इस के लिए बच्चों के नियमित व्यायाम, समय पर सोना, पौष्टिक आहार आदि को बचपन से बच्चे की दिनचर्या में शामिल करें और बहुत ही अच्छा होगा कि आप भी उन के साथ इन क्रियाओं में शामिल हों.
इस से वे इन्हें जल्दी सीखेंगे और इन की आदत भी डाल लेंगे. आप खुद 4 घंटे किसी पूजापाठ में लगे रहें और बच्चों से उम्मीद करें कि वे पढ़ें तो यह संभव नहीं. इस दौरान वे मनमानी करेंगे.
छूट और पाबंदी: जिस तरह अधिक नमक और कम नमक दोनों ही शरीर के लिए हानिकारक हैं, ठीक वैसे ही अधिक छूट और पाबंदी दोनों ही उचित नहीं होतीं. कई बार देखा गया है कि बच्चों को इतनी छूट दे दी जाती है कि वे पूरा दिन उधम मचाए फिरते हैं, दिनभर कैंडी खाने में लगे हैं.
वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चों को अपनी मरजी से कमरे से निकलने या खाना खाने की भी इजाजत नहीं होती. ये दोनों ही स्थितियां बच्चे के लिए हानिकारक हैं. अत: पेरैंट्स को छूट और पाबंदी दोनों सही सीमा में रखनी चाहिए.
स्वयं में बदलाव: हम बच्चों से जरूरत से ज्यादा उम्मीद रखते है जैसे बच्चा हमेशा सुबह जल्द ही उठेगा, टाइम पर ही ब्रेकफास्ट करेगा, मोबाइल नही छुएगा, कभी ?ाठ नहीं बोलेगा. लेकिन क्या ये सब मुम्कीन है? क्या हम खुद ऐसे ही बच्चे थे या आज ऐसे हैं नहीं? तो फिर हम अपने बच्चों पर क्यों आदर्श बच्चा बनने का जोर डालते हैं और अगर हम सच में बच्चों से यह चाह रखते हैं तो पहले हमें खुद इन नियमों और मानदंडों पर खरा उतरना होगा क्योकि बच्चे मांबाप को देख कर ही सीखते हैं.
इसलिए जिस तरह का व्यवहार हम बच्चे से चाहते हैं वैसा ही व्यवहार पहले स्वयं अपनाना होगा.
हौबी का चयन: सब्जैक्ट या कोर्स तो छोडि़ए कई पेरैंट्स अपनी पसंद की हौबी बच्चों पर थोपते हैं जैसे वह क्रिकेट ही खेले या चेस, जबकि बच्चे का इस में कोई इंटरैस्ट नहीं होता. लेकिन फिर भी पेरैंट्स उस पर उसे अपनाने का स्ट्रैस देते हैं.
वे भूल जाते कि हौबी होती ही स्ट्रैस दूर करने के लिए. इसलिए बच्चों को उन की अपनी पसंद की हौबी चुनने दीजिए. अब चाहे वह चेस हो या फिर कैरम या ड्राइंग जो उन का स्ट्रैस कम करे न कि बढ़ाए.
परफैक्ट पेरैंट्स रेस: आज समाज में हर किसी में परफैक्ट बनने की होढ़ है. अब चाहे वे परफैक्ट कपल हो, भाईबहन हों या मांबाप. पहले तो परफैक्ट जैसा वर्ड इंसानों के लिए इस्तेमाल होना नहीं चाहिए क्योंकि हम इंसान हैं जिन में जान, इच्छा, सोच, भावना सब भरी पड़ी है जो हम से अच्छे और बुरे दोनों काम कराती है. तो फिर परफैक्शन का सवाल कहां से आ गया? हमें सम?ाना चाहिए कि हम इंसान हैं न कि फैक्ट्री में बनने वाला कोई बेजान सामान जो प्रोडक्शन सिस्टम के मेनू के हिसाब से परफैक्ट बने.
क्या कोई पिता इस बात पर परफैक्ट माना जाएगा कि वह बच्चे को स्कूल स्कूटर से लेने जाता है या गाड़ी से, क्या मां इस बेस पर परफैक्ट कहलाएगी कि वह लंच में परांठा देती है या पास्ता. बच्चों को महंगे स्कूल, गैजेट्स, कपडे़ देने से कोई परफैक्ट मांबाप नहीं बनता. इसलिए इस फुजूल की रेस से बाहर निकल कर्मठ बनने की कोशिश करें.
आत्मनिर्भर बनाएं न कि अधीन: देखा जाता है बच्चे 6-7 वर्ष के हो गए फिर भी उन्हें स्वयं खाना खाने नहीं आता क्योंकि उन के मांबाप आज भी स्वयं अपने हाथों से खिलाते हैं या स्कूल से मिला प्रोजैक्ट भी स्वयं बना देते हैं. बजाय उन की मदद करने के वे उन का सारा काम कर देते हैं जोकि बिलकुल उचित नहीं है.
इस तरह तो बच्चा हर छोटीछोटी चीजों के लिए मांबाप पर निर्भर हो जाएगा और अपना कोई भी कार्य स्वयं करने में असमर्थ. मांबाप को सम?ाना चाहिए कि यह निर्भरता दुलार करना नहीं बल्कि उन्हें आश्रित और अधीन करना हुआ. इसलिए अपने मोह को सीमा में रख बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएं.
बच्चों को रोबोट न बनाएं: आजकल बहुत से पेरैंट्स बच्चे को आल राउंडर बनाने की मैराथन में लगे है. बच्चे को कब उठना है, क्या खाना है, कितना खाना है, कितनी देर वाक करनी है, क्या पढ़ना है, कितनी देर स्पोर्ट्स खेलना है, क्या देखना है, कैसे हंसना है, कितना हंसना है हर चीज का एक स्ट्रिक टाइमटेबल बना रखा है.
जो घड़ी की सूई पर बच्चे के आवभाव को घटाताबढ़ाता है. कोई इन पेरैंट्स को यह सम?ाएं कि इस तरह के दूषित और आकृष्ट सोच और नीति से कोई भी बच्चा आल राउंडर तो बनेगा नहीं हां एक रोबोट बन कर जरूर रह जाएगा.
पेरैंटिंग का बोझ उतारें: आज पेरैंटिंग में जो सब से बड़ी समस्या बन गया है हो खुद पेरैंटिंग ही है. पेरैंट्स को पेरैंटिंग एक सजा लगती है. जिस तरह लोग किसी रिश्ते में बंधे, परेशान और थके नजर आते हैं. आज वैसे ही कई मांबाप पेरेंटिंग में कैद नजर आते हैं. उन्हें पेरैंटिंग एक बो?ा लगने लगी है. इस बो?ा का क्रोध कई बार बच्चों को सहना पड़ जाता है जो यकीनन एक कष्टमय स्थिति है.
इसलिए पेरैंट्स को चाहिए कि अपनी पीड़ा या ?ां?ालाहट अपने परिजनों से बांटे और आवश्यकता पड़ने पर ऐक्सपर्ट काउंसलिंग का सहारा लें. नहीं तो यह स्ट्रैस एक बड़ा कोप बन आप को और आप के बच्चे को कोई गंभीर चोट दे जाएगा.
ट्रैडिशनल वैल्यू: बच्चों का अपने ट्रैडिशन और कल्चर से जुड़े रहना बहुत जरूरी है. इसलिए बहुत से पेरैंट्स बच्चों पर ट्रैडिशनल वैल्यू, कल्चरल वैल्यू को अपनाने का जोर देते नजर आते हैं. मगर उन्हें यह बात भी सम?ानी चाहिए कि यह वैल्यू थोपी नहीं जाती बल्कि सिखाई और सम?ाई जाती है, जिस तरह बच्चे को चलना, बोलना सिखाया या सम?ाया जाता है. इसलिए बच्चे को बचपन से ही ट्रैडिशन और कल्चर के बारे में कहानियों द्वारा सम?ाएं और उस से जुड़े कार्योंक्रियाओं में शामिल करें.
ध्यान रखें कि बच्चों के भविष्य की तैयारी में उन का वर्तमान यानी उन का बचपन न छीना जाए, न खराब किया जाए. बच्चा है तो बचपन भी होगा ही. इसलिए बच्चों को उन की मस्ती, खेल और शरारतों के साथ हंसतेखेलते बड़ा किया जाए न कि पेरैंट्स की ऊंची इच्छाओं के बोझ के नीचे.
