Parenting tips : 3 साल का रुद्र को जब भी किसी चीज को करने से मना किया जाता है, तो वह हठी बन जाता है और अपना सिर जमीन पर पटकने लगता है. उस की मां कई बार उसे गोद में उठा लेती है और उसे समझाने की कोशिश करती है, लेकिन वह किसी की नहीं सुनता. उस के पेरैंट्स उस के इस व्यवहार को ले कर बहुत परेशान रहने लगे क्योंकि उस की इस जिद की वजह से उस के माथे पर हमेशा एक उभार दिखाई देने लगा.
इतना ही नहीं, उस के इस व्यवहार से परेशान हो कर पेरैंट्स ने उसे स्कूल में भी एडमिशन करवा दिया है और उम्मीद कर रहे हैं कि शायद उन का बेटा अब ठीक हो जाएगा. इस से उस के इस व्यवहार में कमी तो आई है, लेकिन गया नहीं.
इस के बाद वे चाइल्ड साइकोलोजिस्ट के पास भी गए, जहां उन्हें कई थेरैपी दी गई और पेरेंट्स को समझाया गया कि उन्हें बच्चे को हमेशा किसी न किसी ऐक्टिविटीज में उलझाए रखें, जिस में बच्चों की तसवीर वाली किताबें देना, कहानियां पढ़ कर बच्चे को सुनाना, पेरैंट्स का उन के साथ क्वालिटी समय बिताना आदि है, ताकि बच्चे कुछ नया सीख सकें और उन की सिर पटकने की आदतों को छुड़ाया जा सके.
स्ट्रेटिजी का प्रयोग
असल में जिद्दी और उद्दंड (हठी) बच्चों को संभालना एक बड़ी चुनौती है. उन्हें डांटने या मारने के बजाय प्यार और सही स्ट्रेटिजी से सुधारा जा सकता है, लेकिन इस के लिए पेरैंट्स को बहुत धैर्य रखनी पड़ती है क्योंकि जरा ही लापरवाही इन के इस व्यवहार को बढ़ा देती है.
जिद्दी होने की आदत छोटी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में अधिक होती है। इस की खास वजह लड़कों को जरूरत से अधिक परिवार का लाड़प्यार देना होता है.
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क्या कहते हैं आंकड़े
शोध बताते हैं कि लड़कों का मस्तिष्क विकास लड़कियों की तुलना में थोड़ा धीमा होता है, जिस के कारण वे अपनी भावनाओं को शारीरिक या आक्रामक तरीके से व्यक्त करते हैं, जिसे अकसर जिद या हठी समझ लिया जाता है. साथ ही 2 से 3 वर्ष की आयु के बीच लड़कों में लड़कियों की तुलना में लगभग 10% अधिक ऐक्सटर्रनलाइजिंग व्यवहार देखा जाता है. इस में चीजों को तोड़ना, जोर से चिल्लाना, बात न मानना या आक्रामकता शामिल है, जिसे मातापिता अत्यधिक जिद मान लेते हैं.
परवरिश है जिम्मेदार
मनोवैज्ञानिक और बाल विकास विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों का स्वभाव मुख्य रूप से उन के जैंडर के बजाय उन की व्यक्तिगत परवरिश, आनुवंशिकी और व्यक्तिगत व्यक्तित्व पर अधिक निर्भर करता है। यही वजह है कि छोटे उम्र में बच्चे अगर अपने पेरैंट्स को आपस में लड़ते हुए देखते हैं, तो कुछ समय बाद वे भी जिद्दी बन जाते हैं क्योंकि कई बार उन की इस हठ की वजह से पेरैंट्स उन के कई बातों को मान भी लेते हैं, जैसा उन्होंने अपने पेरैंट्स को करते हुए देखा हो.
सजा से होते हैं अधिक उद्दंड
9 साल का निलेश इतना शरारती और जिद्दी था कि एक दिन उस की मां के सजा दिए जाने पर उस ने बे
बैडशीट को कैंची से काट डाला. बाद में पेरैंट्स उसे मनोवैज्ञानिक के पास ले गए, जहां कुछ थेरैपी और उम्र के बढ़ने के साथ अब निलेश समझदार बन चुका है.
इस बारे में मनोवैज्ञानिक राशिदा कपाड़िया कहती हैं कि जिद्दी बच्चों की देखभाल करने और उन के व्यवहार को बदलने के कुछ असरदार तरीके पेरैंट्स को अपनाने चाहिए, ताकि उन के व्यवहार को ठीक किया जा सके. कुछ सुझाव निम्न हैं :
• शांत रहें और चिल्लाएं नहीं। गुस्सा करने से हमेशा बचना चाहिए. बच्चे के सामने अपना आपा कभी न खोएं.
• चिल्लाना बंद करना बहुत जरूरी है क्योंकि इस से बच्चा और ज्यादा जिद्दी हो जाता है.
• खुद रोल मौडल बनने की कोशिश करें. बच्चा पेरैंट्स को देख कर ही शांत रहना सीखता है.
• बच्चे की बात ध्यान से सुनना जरूरी होता है। उस से बहस कभी न करें क्योंकि बच्चे के साथ बहस करने से उन की आदतों में सुधार होना संभव नहीं होता. बच्चे की राय को समझने की कोशिश करें और जानें कि वह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है.
• बच्चे की बात को हमेशा महत्त्व दें। जब बच्चे को लगता है कि उस की बात सुनी जा रही है, तो उस का गुस्सा कम होता है.
• सकारात्मक बातचीत को अपनाने की कोशिश करें, इस से बच्चा धीरेधीरे शांत होता चला जाएगा.
• न कहने का तरीका बदलने की बहुत जरूरत होती है। हर बात पर सीधे नहीं कहने के बजाय उन्हें विकल्प देने की कोशिश करें।
• बच्चों को कुछ करने के लिए सीधे आदेश न दें, मसलन, “चलो पढ़ाई करो” कहने के बजाय कहें, “चलो देखते हैं आज हम क्या नया सीख सकते हैं…” जैसे वाक्यों का प्रयोग करना सही होता है.
• छोटे बच्चों को प्यार से समझाना बहुत जरूरी होता है. अकेले में बैठा कर गलत और सही व्यवहार का अंतर बताना भी आवश्यक है.
• अनुसाशन और रूटीन बच्चों के लिए तय करें. सोने और जागने का समय निर्धारित करें। उन के लिए एक निश्चित टाइमटेबल बनाएं, जिस में किताबों के पढ़ने से ले कर ड्राइंग, कई प्रकार के इनडोर और आउटडोर गेम्स आदि होने की आवश्यकता होती है.
• जितना संभव हो स्क्रीन टाइम सीमित करें, जिस में मोबाइल और टीवी देखने का समय भी शामिल करें.
• नियमों को लेकर मातापिता दोनों का एकजैसा रुख होना जरूरी होता है, जिस में अच्छे व्यवहार की तारीफ करें और उन्हें प्रोत्साहित करें.
• अच्छे व्यवहार के लिए उन्हें छोटीमोटी चीजें या उन की पसंद का काम करने का रिवौर्ड दें और कमियों को नजरअंदाज करें.
• किसी भी काम के लिए उन पर बहुत ज्यादा दबाव न बनाएं।
इस प्रकार बच्चे के उद्दंड और जिद्दी स्वभाव को संभालना चुनौती अवश्य है, लेकिन सही तालमेल और सोच के साथ इसे ठीक करना मुश्किल भी नहीं.
इस के बावजूद भी अगर पेरैंट्स के लिए बच्चे को संभालना मुश्किल हो रहा हो, तो किसी विशेषज्ञ की राय अवश्य लें.
