हमारे नेता अकसर यह ढींग हांकते रहते हैं कि हम दुनिया के सब से तेजी से आगे बढ़ने वाले देशों में से हैं और हमारी इकौनौमी दुनिया की चौथी या 5वीं है. यह हांकना हमारी पुरानी आदत है जैसे हम पौराणिक कहानियों को इतिहास समझने लगते हैं. इस तरह की चमत्कारी कहानियां हर समाज में सदियों से चली आ रही हैं.
अब जब देश में गैस की कमी हुई तो हमारे पसीने छूट गए. लोगों ने गैस को बचाने के लिए कोई नए इनवैंशन करने शुरू नहीं किए, मिट्टी के चूल्हों का राग अलापना शुरू कर दिया. आज के शहरी जीवन में मिट्टी के चूल्हे इंपौसिबल हैं क्योंकि वे मल्टीस्टोरी बिल्डिंगों को इस तरह धुएं से भर देंगे कि किसी का रहना असंभव हो जाएगा.
हमारे यहां पहले सौर चूल्हा बना था पर कामयाब नहीं हुआ. मिट्टी से बने फ्रिजों का ढोल पीटा जाता है पर वे चलते नहीं हैं. पानी से आग जलाने का नाटक किया जाता है और बाकायदा इंस्टा पर रील डाल दी जाती है क्योंकि हजारों में से कुछ नहीं काफी झूठ को मानने के आदी हो चुके हैं.
असलियत यह है कि हमारे चारों ओर जो सामान बिखरा हुआ है उस में कुछ भी हमारा ईजाद किया हुआ नहीं है. हम ने नकल पर कुछ अकल लगा कर जुगाड़ को भी सही ढंग से नहीं बनाया है.
जहां इजरायल अपनी टोटल जीडीपी का 5.7%, चीन 2.41%, दक्षिण कोरिया 4.8% और अमेरिका 3.47% नई खोज पर खर्च करता है, हमारे यहां महज 0.64% खर्च होता है.
हमारी औरतें आज भी बरसों पुरानी तकनीक वाली किचन में काम करती हैं. भारत के हिसाब से सही चलने वाली झाड़ू हम से नहीं बनी. स्पिनिंग व्हील से पानी सुखा लेने वाले पोंछा भी विदेशी इनवैंशन हैं, यह चीन में ईजाद हुआ. 2010 में कंपनियों ने बनाना और निर्यात करना शुरू किया. हम इतने दकियानूसी हैं कि आज भी यह घरघर की जरूरत नहीं बन रहा है. जो लोकल प्रोडक्ट मिल रहे हैं, वे चीनी प्रोडक्ट्स से खराब हैं.
गैस का चूल्हा विदेशी इनवैंशन है. फ्रिज विदेशी है, माइक्रोवेव विदेशी है. छिलका उतारने वाला चाकू तक विदेशी इनवैंशन है. बाल पौइंट पैन विदेशी है और हम गुणगान कर रहे हैं मिट्टी के चूल्हे का बिना यह समझे कि देश में अब इतने पेड़ बचे ही नहीं हैं कि 140 करोड़ लोगों का खाना पक सके.
