Value of contribution : शहरों में अब रैजिडैंट वैलफेयर ऐसोसिएशनें एक जरूरत बनती जा रही हैं क्योंकि बहुत से काम हैं जो अकेले घर वाले बिना सब की हैल्प के कर ही नहीं सकते. रिहायशी इलाका साफ है या नहीं, सेफ है या नहीं, बेकार के ऐनक्रोचमैंट हैं या नहीं, सड़कों की मरम्मत म्यूनिसिपल कौरपोरेशन कर रही हैं या नहीं, यह काम कोई अकेला नहीं कर सकता. यह तो पूरी कालोनी को मिल कर करना होगा और इस के लिए वैलफेयर ऐसोसिएशनों की जरूरत होने लगी है.
जैसा सरकार के टैक्स को इकट्ठा करने में होता है, कुछ लोग फ्री राइडर हो ही जाते हैं जो रैजिडैंट वैलफेयर की जुटाई सारी फैसीलिटियां तो ऐंजौय करते हैं पर अपना कंट्रीब्यूशन देना नहीं चाहते. जहां प्लौट्स हाउसेज होते हैं वहां तो काम चल जाता है कि कुछ कंट्रीब्यूशन न दें पर जहां पानी ओवर हैड टैंक से मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में आए या लिफ्ट हो या कौरीडोरों की सफाई हो, गेट पर गार्ड बैठाना जरूरी हो, वहां कंट्रीब्यूशन बिना काम नहीं चलता.
कुछ ऐसोसिएशनें बीचबीच में सर्कुलर या व्हाट्सऐप मैसेजों से जलील करने के लिए कंट्रीब्यूशन न देने वालों की सूचियां जारी करती हैं पर कुछ इतने ढीठ होते हैं कि फिर भी नहीं मानते. जब सब एक तरह से रह रहे हैं और थोड़ाबहुत ही इनकम में फर्क हो, वहां पहले से बहुमत द्वारा तय कंट्रीब्यूशन अब एक निसैसिटी है जो टैक्स पेमैंट से भी बढ़ कर है.
आमतौर पर वैलफेयर ऐसोसिएशनों को चलाने वाले सिर्फ चौधराहट का आत्मिक सुख पाते हैं. वैलफेयर ऐसोसिएशन के हिसाब में लंबीचौड़ी हेराफेरी करना संभव नहीं होता. चौधराहट के बदले वे न केवल अपना समय देते हैं, जेब से पैसा भी खर्च करते हैं, वे ऐसोसिएशन के चुनाव में घरघर जा कर सहयोग की भीख मांगते हैं.
आजकल यह काम औरतें भी करने लगी हैं और बहुत सी वैलफेयर ऐसोसिएशनों में सिर्फ औरतें नजर आती हैं क्योंकि रोजमर्रा की तकलीफों को उन्हें सहना होता है. इन लोगों को सपोर्ट करना उस इलाकेके लोगों की ड्यूटी बनती है. असल में यह कंट्रीब्यूशन किसी तथाकथित भगवान की पूजा कर खर्चने से भी ज्यादा इंपौर्टैंट है.
किसी भी जिद में, मदभेद पर, पैसे की कमी पर, आपस में मेलजोल न होने पर इस कंट्रीब्यूशन को नकारना कम्यूनिटी लिविंग को खराब करता है. रहने का इलाका अरबपतियों का हो या मजदूरों का यह कंट्रीब्यूशन ही सब को एक सेफ्टी वौल्व देता है. इसे वसूलने के लिए ऐसोसिएशनें सर्कुलर बांटें, बौर्ड लगाएं यह नौबत नहीं आनी चाहिए. आज की कौंप्लैक्स होती जिंदगी और बढ़ती लोनलीनैस में यह कंट्रीब्यूशन एक इंश्योरैंस है कि जिंदगी ठीकठाक चलेगी.
