इंपावरमैंट थू्र इंटरटेनमैंट अवार्ड
Supriya Pathak interview : 1981 में फिल्म ‘कलयुग’ में सपोर्टिंग ऐक्ट्रैस की भूमिका से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री और गुजराती थिएटर आर्टिस्ट सुप्रिया पाठक ने आज तक कई सफल फिल्में और टीवी धारावाहिक किए हैं. सहज और स्वाभाविक अभिनय करने वाली सुप्रिया ने लीक से हट कर फिल्में कीं, जिन्हें लोग आज भी देखना पसंद करते हैं. मसलन, ‘बाजार,’ ‘विजेता,’ ‘मासूम,’ ‘मिर्चमसाला,’ ‘राख’ आदि.
हालांकि सुप्रिया का अभिनय अच्छा होने के बावजूद बड़े परदे पर उन्हें उतनी सफलता नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी पर वे इस से अधिक प्रभावित नहीं हुईं और जो काम जैसे आता गया, करती गईं. यही वजह है कि आज वे अपनी जर्नी से बहुत खुश हैं.
काम के दौरान सुप्रिया ने अभिनेता पंकज कपूर से शादी की और 2 बच्चों की मां बनीं. इस के लिए उन्होंने कुछ साल का ब्रेक लिया और फिर फिल्म ‘सरकार’ से वापस इंडस्ट्री में आईं और फिल्म ‘रामलीला गोलियों की रासलीला’ में जबरदस्त भूमिका निभा कर बैस्ट सपोर्टिंग ऐक्ट्रैस के पुरस्कार की भी हकदार बनीं.
फिल्मों के साथसाथ सुप्रिया ने छोटे परदे की तरफ भी रुख किया और कई टीवी शोज किए. धारावाहिक ‘खिचड़ी’ में उन्होंने हंसा की भूमिका निभाई, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया और आज भी लोग उन्हें हंसा के नाम से बुलाते हैं.
सुप्रिया ने गृहशोभा के लिए खास बात की. पेश हैं, कुछ खास अंश:
जर्नी से संतुष्ट
इंडस्ट्री में 45 सालों से अधिक समय बीता चुकी सुप्रिया पाठक कहती हैं, ‘‘इंडस्ट्री में बिताए इतने सालों को मैं संतुष्टि के साथ देखती हूं. मु झे सबकुछ मिला है और मु झे बहुत अच्छा लगता है कि मैं ने बहुत अच्छा काम किया है, अच्छे लोगों से मिली हूं. यहां मु झे अलगअलग लोगों से अलगअलग कहानियों में अभिनय करने का मौका मिला है. आप की पसंदीदा चीज अगर आप को करने को मिलती है तो वह बड़ी बात होती है, जिस में पैसे के साथसाथ फेम भी मिले तो इस से जरूरी और कुछ भी मेरे लिए अच्छा नहीं हो सकता था. बिना पसंद के कोई भी काम जीवन में करना पड़े तो वह सही नहीं होता.’’
मिली मायूसी
सुप्रिया कहती हैं, ‘‘कई बार ऐसा भी दौर आया जब मु झे मायूसी मिली, बहुत अधिक उतारचढ़ाव जिंदगी में देखने को मिले. बहुत बार ऐसा लगा कि आगे जिंदगी को कैसे जीएं. अभी भी कई बार ऐसा लगता है क्योंकि इस प्रोफैशन में फ्रस्ट्रेटिंग होती है, लगातार काम मिलेगा या नहीं, चिंता लगी रहती है क्योंकि हमारी कोई जौब नहीं है, जिस में हर महीने फिक्स्ड तनख्वाह मिले. उस का डर हमेशा इस इंडस्ट्री में रहता है, जिसे मैं ने और पंकज कपूर दोनों ने मिल कर देखा है और आज भी देख रही हूं.
‘‘मु झे याद आता है कि मैं ने और पंकज कपूर ने मिल कर एक कंपनी खोली थी, जिस के थ्रूहम ने काफी काम भी किया है. जब हम ने वह कंपनी खोली थी हमें अनुभव नहीं था. ऐसे में जो फाइनैंसर मेरे साथ जुड़े थे, उन्होंने साथ देने से मना कर दिया तो वित्तीय समस्या आ गई थी, जिस से मेरी मानसिक शक्ति टूटी थी क्योंकि बच्चे थे, घर चलाना था.
‘‘उस समय हम दोनों यंग थे, इसलिए दोनों ने मिल कर उसे सौल्व किया और परेशानी से निकल गए. मुश्किल था पर कठिन नहीं था क्योंकि मैं ने उस में टीवी शोज बनाने के बारे में सोचा था लेकिन डेली सोप के दौर में इसे चलाना मुश्किल हो रहा था, फिर हम ने उस कंपनी को बंद कर थिएट्रान नाम से कंपनी खोली और थिएटर प्रोड्यूस करने लगे.’’
काम के साथ पारिवारिक तालमेल
काम के साथसाथ सुप्रिया ने 2 बच्चों की परवरिश की. परिवार के साथ कैरियर का बनाए रखने को ले कर सुप्रिया कहती हैं, ‘‘इसे कोई भी स्त्री कर सकती है क्योंकि एक औरत बहुत सारी चीजें एकसाथ कर सकती है. पहले की स्त्रियां बैंक या टीचिंग प्रोफैशन चुनती थीं ताकि घर और बच्चों को संभाल सकें. सारी औरतें अगर चाहें तो काम के साथसाथ परिवार के साथ भी तालमेल बैठा सकती है. इस में पंकज कपूर और मैं ने एकदूसरे का हाथ बंटाया है. इस के अलावा मेरे बच्चे बहुत शांत और प्यारे थे. सना और रुहान सैट पर ही पलेबड़े हुए हैं. वे स्कूल से सीधे सैट पर आते थे क्योंकि हम दोनों शूट कर रहे होते थे. मैं उन के लिए एक अलग कमरा बना देती थी, वे वहीं होमवर्क करते थे और जो काम पसंद आता था, सैट पर खाली समय में करते रहते थे. वे सैट पर बड़े हुए हैं और उन्होंने कभी यह फील नहीं करवाया कि हम दोनों उन्हें टाइम नहीं दे रहे हैं.’’
कहानियों में बदलाव
इंडस्ट्री में फिल्मों की कहानी में आए बदलाव के बारे में सुप्रिया कहती हैं, ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि आज के यूथ के पास वैराइटी बहुत अधिक है. हमारे समय में मनोरंजन के नाम पर फिल्में, नाटक या टीवी था, इतना ऐक्सपोजर नहीं था. आज के छोटे बच्चे के पास ओटीटी, फिल्में, रील्स, सोशल मीडिया इतनी सारी विधाएं उपलब्ध हैं कि वे खुद भी बौखला गए हैं कि आखिर उन्हें क्या पसंद है.’’
प्यार, रिलेशनशिप, कमिटमैंट की नहीं जगह
मारधाड़ वाली फिल्में सभी को बारबार पसंद नहीं आतीं, लेकिन इंडस्ट्री भेड़चाल में शामिल हो जाती है. एक तरह की फिल्में चलने के बाद 50 एक ही तरह की फिल्में बन जाती हैं. अगर कहीं एक रोमांटिक फिल्म चली, तो वैसी ही फिल्में बनाते रहेंगे. हम अलगअलग चीजें नहीं दे पा रहे हैं. हमारे समय में फिल्मों में वैराइटी अधिक थी क्योंकि माध्यम एक ही था.
‘‘आज अगर स्टैंडअप कौमेडियन को देखना चाहते हैं और देख लिया तो वही बारबार आने लगता है. मारधाड़ और रोनेधोने वाली भी वैसी ही फिल्में आप को बारबार दिखती हैं. उन के पास अलगअलग चीजें देखने को आसानी से मिलती हैं, इसलिए यूथ को किसी भी चीज को ठहर कर देखने और सम झने की आदत नहीं रही. ऐसे में यह कहना आसान हो जाता है कि यह विषय चलता नहीं. आप अगर इसे अच्छा बनाओगे तो शायद वह चल जाएगा.
‘‘अभी जब मैं एक स्कूल में गई तो वहां 7-8 साल के बच्चे ईरान के युद्ध के बारे में बात कर रहे थे. उन के हिसाब से यही जिंदगी है. मैं चाहती हूं कि फिल्म मेकर दर्शकों को ब्लेम न करें बल्कि अलगअलग पौजिटिव चीजें दे कर तो देखें, हो सकता है चल जाएं. मेरे हिसाब से पौजिटिव चीजें बननी चाहिए. गन कल्चर और क्राइम का असर सभी पर पड़ता है. आज हर जगह हिंसा बड़ चुकी है, जिसे देख कर खराब लगता है. यह कलयुग सभी पर भारी हो रहा है.’’
फिल्मों के अच्छे लेखकों की कमी के बारे में सुप्रिया का कहना है, ‘‘आज फास्ट फूड का एक दौर चल पड़ा है और आज लोगों का एक ऐटीट्यूड हो गया है. वही लेखकों के लिए समस्या है. आज भी अच्छी कहानियों की किताबें लिखी जा रही हैं, थिएटर में अच्छा काम हो रहा है पर ओटीटी और फिल्मों में जिस तरह का काम हो सकता था वह नहीं हो रहा है.
‘‘माहौल कब कैसे बदलेगा, उसे देखना है. इंस्टाग्राम की रील्स के बारे में मैं ने सुना है कि वह 1 या 2 मिनट में बनती है. इतने कम समय में आप क्या लिख सकते हो, यह सम झने की जरूरत है. हमारे समय में एड फिल्म इतने कम समय में लिखी जाती थी. मु झे साधारण कहानियां, जिन में रोमांस, कौमेडी, रिलेशनशिप आदि हो, बहुत पसंद हैं.’’
