Priest fraud cases : बेंगलुरु के बगलागुंटे इलाके में 27 वर्षीय महिला इंजीनियर ने एक ज्योतिषी की भविष्यवाणी के बाद फांसी लगा कर अपनी जान दे दी। मृतका की पहचान विद्याज्योति के रूप में हुई है, जो फिलहाल वर्क फ्रौम होम कर रही थी।
पुलिस के अनुसार, विद्याज्योति एक युवक के साथ रिश्ते में थी और दोनों परिवारों की सहमति से जल्द ही उन की शादी होने वाली थी। शादी से पहले उस ने एक ज्योतिषी से सलाह ली, जिस ने भविष्यवाणी की कि उस की शादी सिर्फ 2 साल ही टिकेगी और फिर रिश्ता टूट जाएगा। इस बात को ले कर वह भारी मानसिक तनाव में आ गई थी।
ज्योतिषी ने इस बाधा को दूर करने के लिए 9 दिन के विशेष अनुष्ठान की सलाह दी थी। विद्याज्योति और उस के परिवार ने यह अनुष्ठान शुरू कर दिया था। अनुष्ठान के 9वें दिन जब परिवार किसी स्थान पर जाने की तैयारी कर रहा था, तब विद्याज्योति घर पर अकेली थी। इसी दौरान उस ने अपने कमरे में फंदा लगा कर जान दे दी। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और घटना की जांच कर रही है।
परिवार हुआ तबाह
इस तरह की घटनाएं हमारे समाज में आम हो हैं, जहां पंडितों के चलते पूरा परिवार तबाह हो जाता है. लोग शादीब्याह जैसे फैसले भी अपनी मरजी से नहीं, पंडितों की मरजी से लेते हैं और इस सब में सब से ज्यादा महिलाएं ही पिसती हैं. ऐसे में कई सवाल भी उठते हैं? अगर पंडित ने यह कह भी दिया था तो क्या हुआ? क्या पंडित को अपने जीवन के बारे में पता है कि आगे क्या होने वाला है? ये होते कौन हैं ऐसी भविष्यवाणी करने वाले? और ये कौन लोग हैं जो इन की बातों में आ कर इतना बड़ा कदम उठा लेते हैं? क्या इन लोगों में सोचनेसमझने की शक्ति बिलकुल ही खत्म हो गई है? क्या लोगों की अपनी सोच, अपने विचार नहीं हैं? अगर ऐसा है तो क्यों है? इस का जिम्मेदार कौन है?
एक सवाल और भी है कि इस घटना में आत्महत्या महिला ने ही क्यों की? जब शादी टूट रही थी तो आत्महत्या पुरुष ने क्यों नहीं की?
पंडितों के जाल में फंसती महिलाएं
महिलाओं को शुरू से ही पंडितों ने अपने जाल में फंसाया हुआ है. उन्हें हमेशा धर्म के नाम पर डरायाधमकाया जाता रहा है. उन्हें बताया गया है कि अगर तुम ने कुंडली मिला कर पूरे रीतिरिवाज के साथ शादी नहीं की, तो वह शादी चल नहीं पाएगी और या तो किसी की मृत्यु हो जाएगी या फिर शादी टूट जाएगी। ये बातें इस कदर लोगों के दिमाग में पंडितों के द्वारा भर दी जाती हैं कि उस का नतीजा ही इस तरह की घटनाओं का होना होता है.
मनोवैज्ञानिक रूप से भी यह देखा गया है कि जब किसी के मन में गहरा डर बैठा दिया जाता है, तो व्यक्ति अनजाने में उसी दिशा में कदम उठाने लगता है जिसे स्वभविष्यवाणी की पूर्ति कहा जाता है।
मानसिक दबाव
जब किसी महिला को बारबार यह कहा जाता है कि अमुक नियम न मानने पर अनिष्ट होगा, तो वह हर छोटी समस्या को उसी दोष से जोड़ कर देखने लगती है। इस से रिश्तों में स्वाभाविक तालमेल की जगह डर और शक पैदा हो जाता है। इसी का परिणाम इस तरह की घटनाएं हैं.
रिश्तों पर असर
शादी की सफलता आपसी समझ, सम्मान और धैर्य पर टिकी होती है। लेकिन जब पूरा ध्यान कुंडली या नक्षत्रों पर केंद्रित हो जाता है, तो व्यवहार और संचार (कम्यूनिकेशन) जैसे बुनियादी पहलुओं की अनदेखी होने लगती है।
शिक्षा केवल डिगरियां बांटने का जरीया
जब शिक्षा केवल डिगरियां बांटने का जरीया बन जाएं और तार्किकता (Logical reasoning) या वैज्ञानिक दृष्टिकोण पीछे छूट जाएं, तो समाज की नींव कमजोर होने लगती है।
नई पीढ़ी जो भी पढाई कर रही है उस में न तार्किकता है, न ही साइंटिफिक नौलेज है और हमारा एजुकेशनल सिस्टम बिलकुल पोंगा पंडित. इस का सब से बड़ा नुकसान औरतों को हो रहा है. इस का सब से बड़ा विक्टिम भी आदमी नहीं है औरते ही हैं.
आज की शिक्षा तार्किक नहीं है
अगर शिक्षा तार्किक नहीं है, तो महिलाएं अपने जीवन के बड़े फैसले (जैसे कैरियर, शादी या स्वास्थ्य) तर्कों के आधार पर लेने के बजाय सामाजिक दबाव या पुरानी रूढ़ियों के आधार पर लेने को मजबूर हो जाती हैं।
दरअसल, सच तो यह है कि जब वैज्ञानिक सोच (Scientific Knowledge) की कमी होती है, तो समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वास का सब से ज्यादा बोझ महिलाओं पर ही डाला जाता है। तार्किकता की कमी उन्हें इन बेड़ियों को तोड़ने से रोकती है।
आज की शिक्षा केवल साक्षरता देती है बोध नहीं
जब शिक्षा केवल साक्षरता बन कर रह जाती है और बोध (Wisdom) नहीं दे पाती, तो वह औरतों को मजबूत बना कर आगे बढ़ कर अपने लिए कुछ करने की प्रेरणा नहीं देती, बल्कि उन्हें एक नए तरह के सांचे में कैद कर देती है, जहां उन के पास डिगरी तो है, लेकिन अपनी स्थिति को बदलने का वैचारिक साहस नहीं। ऐसी पढ़ाई का क्या फायदा जो आप को सहीगलत का ज्ञान भी न दे पाएं।
क्या मांबाप भी जिम्मेदार हैं
दरअसल, पेरैंट्स ने पढ़ना बंद कर दिया। इस का सीधा असर बच्चों पर भी हुआ है. पेरैंट्स को पढ़ना चाहिए। चाहे कुछ भी पढ़ें और कुछ नहीं तो धर्मग्रंथ ही पढ़ते। अगर वे धर्मग्रंथों को पढ़ेंगे तो उस के खिलाफ हो जाएंगे। उन्हें पता चलेगा कि क्या बकवास लिखा है. हम बेकार ही इस के लिए पागल हो रहे हैं. जब पंडित बोल कर सुना रहा होता है, तो आप को सुनाई नहीं देता कि वह क्या कह रहा है. आप को उस के बोल भी समझ नहीं आते. वह एक संस्कृत का श्लोक कहेगा और उस के बाद उस का अनुवाद कहेगा। उस के बाद अपने मन से कुछ भी कह देगा। इस से आप का दिमाग इस में उलझा रहेगा कि अब हमें पंडित को क्या सामग्री देनी है उठा कर। वह क्या कह रहा है यह तो हमें पता ही नहीं चलता। इसलिए आजकल की ज्यादातर लङकियां या युवा पीढ़ी बहुत ज्यादा नुकसान में जा रही हैं.
औरतों को जो शिक्षा 100 सालों में मिली थी उस का हम ने कचरा कर दिया है. पहले तो लड़कियां थोड़ीबहुत पढ़ने लगी थीं, समझदार होने लगी थीं. लेकिन आज की जो नए पीढ़ी है वह बिलकुल बेवकूफ होती जा रही है क्योंकि उन के मांबाप को पंडितों ने अपना गुलाम बना लिया है और खुद पढ़लिख कर वे समझदार होना नहीं चाहते।
पेरैंट्स ने पढ़ना बंद कर दिया है
पेरैंट्स ने भी पढ़ना बंद कर दिया। वे भी पंडितों की बातों में फंस कर पाखंडी बने हुए हैं क्योंकि सब ने पढ़नालिखना बंद कर दिया है और जो कुछ भी व्हाट्सऐप या सोशल मीडिया पर आता है उस में लौजिक बिलकुल नहीं है.
आज घर के ड्राइंगरूम में किताबों की अलमारी की जगह 65 इंच के स्मार्ट टीवी ने ले ली है। जब बच्चा अपने बड़ों को हर खाली समय में फोन स्क्रौल करते देखता है, तो वह पढ़ने को एक उबाऊ काम समझने लगता है। लौजिक तभी आती है जब हम किसी विचार के साथ समय बिताते हैं, जो रील्स या शौर्ट्स में मुमकिन ही नहीं है।
हुनर हम सीखना नहीं चाहते
मांबाप ने पैसे से सब खरीद दिया है. आज की युवा पीढ़ी रोजमर्रा के छोटेबड़े कामों जैसे घर के काम, खाना बनाना जैसे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर हैं. जो एमबीए कर के निकल रहे हैं जौब्स उन्हें वैसे भी नहीं मिल रही हैं. न उन के पास कोई हुनर है न ऐजुकेशन का कोई फायदा है. इसलिए लोग शौर्टकट ढूंढ़ते हुए धर्म के चक्कर में पङ जाते हैं कि भगवान के पास जाएंगे तो जरूर कुछ मिल जाएगा।
सोशल मीडिया सोर्स औफ एंटरटेनमेंट है
नए पीढ़ी का जो सोर्स औफ इनफौर्मेशन है एक तो वह है ही नहीं और अगर है भी तो वह सोशल मीडिया है और सोशल मीडिया सोर्स औफ एंटरटेनमेंट है और वे जो इनफार्मेशन देते हैं एंटरटेनमेंट करने के लिए देते हैं. वे आप को इनफौर्म करने के लिए नहीं देते। आप को उन की चीजें समझ ही नहीं आएंगी क्योंकि वे जो कहते हैं वह सनसनी मचाने के लिए कहते हैं ताकि पोस्ट को व्यूअर्स मिल सकें और आप की सोच तार्किक है ही नहीं क्योंकि चीजों को ध्यान से देखेंगे और समझेंगे तो समझ आएगी लेकिन सोशल मीडिया के अधकचरे बिकाऊ मैटर को आप ज्ञान समझने की गलती कर देते हैं और यही बात गलत होती है.
अगर आज आप ने एक रील देखी, तो दोबारा आप उस रील को नहीं ढूंढ़ सकते। किताब को आप ने पढ़ा तो दोबारा भी कोई बात समझ नहीं आए तो उसे पढ़ सकते हैं, ब्रेक ले सकते हैं, उस पर निशान लगा सकते हैं. लेकिन रील को दोबारा समझना चाहें तो कोई औप्शन नहीं है आप के पास.
किताबें और रील्स में फर्क को समझें
एक किताब का लेखक अपनी किताब में बहुत कुछ ऐसा लिखता है जिस से आप जीवन जीने की कला सीखते हैं। कुछ तार्किकता आप के व्यवहार में आती है लेकिन रील्स बनाने वाला आप को बस कुछ पलों के लिए रोकना चाहता है ताकि उसे व्यूअर्स मिलें और उस का पैसा बन सकें। उस 30 सैकंड के वीडियो में लौजिक की जगह ‘शौक वैल्यू’ होती है ताकि आप उसे शेयर करें। इसे ही आप ने ‘अधकचरा बिकाऊ मैटर’ कहा है, जो जानकारी तो देता है पर ज्ञान नहीं।
इस के विपरीत किताबों में एक ठहराव है, आप पन्ने पलट सकते हैं, मार्जिन में अपनी सोच लिख सकते हैं और सब से बड़ी बात, आप सोच सकते हैं।
रील एक ‘बहती हुई धारा’ की तरह है जिसे आप दोबारा पकड़ नहीं सकते। वह आप के दिमाग को सोचने का मौका ही नहीं देती, बस एक के बाद एक डोपामाइन (Dopamine) का झटका देती है।
जब हम गहराई से पढ़ना छोड़ देते हैं, तो हमारी ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ खत्म हो जाती है। फिर व्हाट्सऐप पर आई किसी भी बेतुकी बात को हम सच मान लेते हैं क्योंकि हमारे पास उसे चुनौती देने वाला तर्क ही नहीं बचता।
इसलिए इन पंडितों के चक्कर में पङने के बजाए पढ़ेंलिखें और तार्किक सोच रखें ताकि सही को सही और गलत को गलत कह सकें।
