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ग्रासरूट्स चेंजमेकर आइकोन अवार्ड
डा. रानी बंग की सामुदायिक स्वास्थ्य के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें उन के परिवार के जनसेवा के मूल्यों और महाराष्ट्र की शुरआती ग्रामीण वास्तविकताओं के अनुभवों से प्राप्त हुई थी. उन्होंने नागपुर यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की. आदिवासी क्षेत्रों में काम करते समय उन्होंने देखा कि महिलाओं की स्वास्थ्य की जरूरतें केवल प्रसव देखभाल तक सीमित नहीं थीं बल्कि उन में पुरानी स्त्रीरोग संबंधी परेशानियां भी शामिल थीं जो औपचारिक स्वास्थ्य प्रणालियों में अदृश्य रहीं.
चेंजमेकर
जौन्स हौपकिन्स विश्वविद्यालय में रानी के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण ने शहरी केंद्रित चिकित्सा मौडलों और ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं के बीच के अंतर को और स्पष्ट किया, जिस ने उन के समुदाय आधारित और सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ स्वास्थ्य समाधानों को खोजने का संकल्प और मजबूत किया.
1985 में डा. रानी ने आदिवासी समुदायों के बीच स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने के लिए महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में ‘खोज’ एसईएआरसीएच यानी सोसाइटी फौर ऐजुकेशन ऐक्शन ऐंड रिसर्च इन कम्युनिटी हैल्थ की सहस्थापना की, जिस का मुख्य केंद्र ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और ‘दाइयों’ को ‘होम बेस्ड न्यूबौर्न केयर’ एचबीएनसी यानी घर पर नवजात की देखभाल प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित करना था. फिर उन के अग्रणी समुदाय आधारित शोध में ग्रामीण महिलाओं के बीच स्त्रीरोग संबंधी रुग्णता (1988) का पहला बड़े पैमाने पर अध्ययन शामिल हुआ, जिस ने अनुपचारित प्रजनन स्वास्थ्य स्थितियों के उच्च प्रसार का खुलासा किया.
