Indians Leaving Foreign: पिछले 5 साल से स्वीडन में रह रहे अंकुर त्यागी ने वहां की सुखसुविधाओं वाली जिंदगी छोड़ कर वापस भारत लौटने का फैसला किया है. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म ऐक्स पर एक वायरल थ्रेड में उन्होंने बताया कि विदेश में साफ हवा और हाई सैलरी तो है, लेकिन वहां ‘अकेलापन’ बहुत गहरा है.

अंकुर के मुताबिक, स्वीडन में लोग बहुत निजी हैं और वहां दोस्तों के साथ कोई सामाजिक जुड़ाव नहीं है.​ उन्हें शहर के प्रदूषण (एक्यूआई) की कोई परवाह नहीं है. उन्होंने कहा कि उन्हें अब प्रदूषण से ज्यादा दोस्तों और परिवार के प्यार वाली ‘असली औक्सीजन’ की जरूरत है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई वजह यही है या फिर कोई और बात है, जिस की वजह से यूरोप और अमेरिका से बड़ी संख्या में लोग अपने देश लौट रहे हैं?

इस की पड़ताल की, तो पता लगा कि कुछ लोगों को देशप्रेम की भावना जरूर वापस ला सकती है लेकिन अधिकतर इस की वजह कुछ और ही है.

कई यूरोपियन देश चाहते हैं कि उन का देश छोड़ दिया जाए

कुछ साल पहले आप ने खबरों में पढ़ा होगा कि इटली विदेशियों को वहां के गांवों में बसने के लिए मुफ्त में बंगले दे रहा था लेकिन यहां बात उलटी है. स्वीडन में बड़ी संख्या में विदेशी रहते हैं. अब वह इन की संख्या को कम करना चाहता है, लिहाजा उस की नई नीति यही कह रही है कि अप्रवासियो, देश छोड़ो और उस के बदले लाखों रुपए की मोटी रकम ले लो.

सितंबर, 2024 में देश में नई नीति घोषित हुई थी, जिस में यह कहा गया है कि अगर विदेशी स्वीडन छोड़ते हैं तो उन्हें 3,50,000 क्रोनर (करीब ₹28.5 लाख) दिया जाएगा.

हालांकि यूरोप में ऐसा करने वाला स्वीडन अकेला देश नहीं है. कई यूरोपीय देश यह काम कर रहे हैं. हालांकि इन की राशि में काफी अंतर है. डेनमार्क, फ्रांस, जरमनी जैसे देश चाहते हैं कि उन का देश छोड़ दिया जाए.

वर्क परमिट के नियमों में सख्ती भी भारतीयों के आने की बड़ी वजह

स्वीडन की वर्तमान सरकार (जिसे कंजर्वेटिव और दक्षिणपंथी दलों का समर्थन प्राप्त है) ने हाल ही में वर्क परमिट के लिए न्यूनतम वेतन की सीमा को बहुत बढ़ा दिया है.

यह विशेषरूप से मध्यम आय वाले प्रवासियों के लिए चुनौतीपूर्ण है. स्वीडन की कंजर्वेटिव सरकार का मानना है कि केवल वही लोग देश में आएं जो आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हों. केवल ‘हाई-स्किल्ड’ (बेहद कुशल) लोग ही स्वीडन आएं. कम वेतन वाली नौकरियों के लिए वे बाहरी लोगों को हतोत्साहित कर रहे हैं.

उन का मानना है कि वे ही लोग स्वीडन आएं, जो वहां की अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकें. इस से कई भारतीय प्रोफैशनल्स, जो मध्यम स्तर के वेतन पर वहां काम कर रहे थे, उन के लिए वीजा रिन्यू कराना मुश्किल हो गया है. यही वजह है कि वे लोग भारत वापस लौट रहे हैं.

स्वीडन डेमोक्रेट्स (एसडी) और नीतिगत बदलाव भी वजह है

स्वीडन लंबे समय तक अपनी उदारवादी छवि के लिए जाना जाता था, लेकिन अब वहां की राजनीति स्वीडन फर्स्ट की तरफ मुड़ गई है. पहले स्वीडन अपने यहां आने वाले हर प्रवासी का दिल खोल कर स्वागत करता था. लेकिन वहां की कंजर्वेटिव पार्टियों का तर्क है कि प्रवासी लोग स्वीडिश संस्कृति और भाषा को नहीं अपना रहे हैं, जिस से समाज में अलगाव पैदा हो रहा है.

इन्हें लगता है कि बाहर से आने वाले लोग उन की स्थानीय भाषा को प्रभावित करेंगे. इस से उन की परंपराएं बदल जाएंगी. समाज का ढांचा बदल जाएगा. इसलिए अब वे भारतीयों के साथ सख्त हो गए हैं और नहीं चाहते कि भारतीय यहां रहें. इस तरह ‘स्वीडन डेमोक्रेट्स’ का राजनीति में प्रभाव बढ़ा और इस से अश्वेत लोगों की मुश्किलें भी.

नस्लवाद या भेदभाव से भारतीय परायापन महसूस करता है

हर इंसान ऐसे समाज में रहना चाहता है जहां उसे अपनापन महसूस हो. लेकिन अगर हम विदेश की बात करें तो चाहे वह यूरोप हो या अमेरिका वहां अपने लोगों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है. वहां यदि आप के नाम में ‘सिंह’, ‘खान’ या कोई विदेशी नाम है, तो स्वीडिश नाम वाले व्यक्ति की तुलना में आप को इंटरव्यू के लिए बुलाए जाने की संभावना बहुत कम हो जाती है. कई भारतीय और अश्वेत प्रवासी शिकायत करते हैं कि अपार्टमेंट किराए पर लेते समय मकानमालिक स्वीडिश लोगों को प्राथमिकता देते हैं.

अब वहां नस्लवादी बयानबाजी यानि हेट स्पीच आम होती जा रही है. सोशल मीडिया पर प्रवासियों को देश की समस्याओं (जैसे क्राइम या बेरोजगारी) के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. अश्वेत लोगों को अकसर सुरक्षा के नाम पर पुलिस द्वारा ज्यादा टोकारोका जाता है. जब किसी दूसरे देश में नस्लवाद या भेदभाव जैसी घटनाएं होती हैं, तो व्यक्ति की अपनी सांस्कृतिक पहचान और भी मजबूत हो जाती है और वह अपने देश की ओर खिंचा चला आता है.

चर्च नहीं चाहता अश्वेत लोग यहां रहें

हर जगह धर्म की तूती बोलती है. धर्म का जाल कुछ इस तरह अपने शिकंजे में कस लेता है कि फिर चाहे भारतीयों का जाना वहां उन के लिए अच्छा ही क्यों न हो. पूरे यूरोप और अमेरिका में लोग कहते हैं कि हमारे यहां गोरों से ज्यादा काले लोग हो गए हैं. हम गोरे ही यहां राज करेंगे चाहे हमें कम पैसा मिलें. हमें ज्यादा काम करना पड़े तो भी हमें कोई दिक्कत नहीं है. जैसेकि अमेरिका ने कहा कि चाइना का सामान ही हमारे देश में आएगा, भले महंगा पड़े तो भी कोई दिक्कत नहीं है. ट्रंप का जो टैरिफ है वह कम नहीं हुआ और लोगों ने सामान कम खरीदा. लेकिन लोगों ने विरोध नहीं किया.

गोरों को अब यह एहसास हो रहा है कि हमारे देश की नौकरियां सिर्फ हमारे लिए है, कोई बाहर वाला आ कर इस का लाभ क्यों ले. भले ही इस से हमें नुकसान ही क्यों न हों.

ये सारी पट्टी वहां की आम जनता को चर्च ने पढ़ाई है. कम पैसों में उन्हें अच्छे कर्मचारी भले ही न मिल रहे हों लेकिन धर्म ने मना कर दिया तो वे अपनी अर्थव्यवस्था को भी ताक पर लगा देते हैं. यही हाल यूरोप, स्वीडन, अमेरिका की अन्य जगहों पर भी है.

वहां के पादरियों को लगता है कि ‘स्वीडन का चर्च’ केवल स्वीडिश संस्कृति, परंपरा और विरासत का केंद्र होना चाहिए. उन्हें लगता है कि चर्च प्रवासियों या अश्वेत लोगों की मदद क्यों करे. इस से स्वीडन की मूल पहचान खतरे में पड़ रही है.

चर्च का काम काम दुनियाभर के शरणार्थियों की मदद करना नहीं, बल्कि स्वीडन की पुरानी परंपराओं और श्वेत नौर्डिक पहचान को बचाना है. इसलिए, वे ऐसे इमिग्रेशन का विरोध करते हैं जो स्वीडन की जनसांख्यिकी (डेमोग्राफिक्स) को बदल दे.

जब दीवाली पर स्वीडन में रह रहे भारतीय दीए जलाते हैं तो यह उन्हें अपनी संस्कृति के लिए खतरा लगता है. उन्हें डर है कि यदि बाहर से आने वाले लोग (चाहे वे ईसाई ही क्यों न हों) अपनी अलग संस्कृति साथ लाएंगे, तो स्वीडन का पारंपरिक स्वरूप खत्म हो जाएगा.यही वजह है कि वे वहां की जनता को बरगलाते हैं और इस का असर अब वहां दिखने लगा है. यही वजह है भारतीय अब विदेशों से भारत आ रहे हैं.

कट्टरपंथी चर्च समूह अब खुल कर श्वेत राष्ट्रवाद (व्हाइट नेशनलिज्म) की विचारधारा का समर्थन करने लगे हैं.

चर्च चाहता है कि स्वीडन एक व्हाइट क्रिश्चियन नेशन बना रहे. उन के लिए अश्वेत लोग, चाहे वे ईसाई ही क्यों न हों, उन के ‘सांस्कृतिक ढांचे’ में फिट नहीं बैठते.

उन्हें लगता है कि बाहर से आने वाले अश्वेत और अन्य प्रवासी लोगों की जनसंख्या बढ़ जाएगी और ‘श्वेत ईसाई’ लोग अपने ही देश में अल्पसंख्यक बन जाएंगे. इसलिए, चर्च चाहता है कि केवल श्वेत पहचान को ही वहां की असली पहचान माना जाए. जब इन देशों में भारतीयों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता तो कई बार उन के आत्मसम्मान को इतनी ठेस लगती है कि वे वापस आने का सोच लेते हैं.

भारत में हाउस हैल्प आसानी से मिल रही

विदेश में खाना बनाने, बर्तन धोने, सफाई करने और कपड़े धोने जैसे काम आप को खुद ही करने पड़ते हैं. अगर आप किसी को सफाई के लिए बुलाते हैं, तो वह $20-$50 (करीब ₹1,700 – ₹4,200) प्रति घंटा तक चार्ज कर सकते हैं. यह रोजाना मुमकिन नहीं है.

आप बाहर हाउसमेड की कल्पना नहीं कर सकते. लेकिन भारत में आप को 15-18 हजार में 24 घंटे की मेड मिल जाएगी. यहां खाना बनाने के लिए, गाड़ी ड्राइव करने के लिए, माली के काम के लिए यानि हर काम के लिए हैल्प मिल जाएगी लेकिन विदेशों में ऐसा नहीं है. वहां हर काम खुद करना पड़ता है, जिस से लोगों को काफी परेशानी होती है. विदेश में रहने वाले लोगों को भारत की ‘बाई और रसोइया’ सब से ज्यादा याद आते हैं और इस वजह से भी वे लौट आते हैं.

रिटायरमैंट की लाइफ का मजा भारत में ही है

बढ़ती उम्र में घरबाहर के सब काम करना उन के लिए सजा हो जाती है और ऐसे में उन्हें अपने देश की याद आती है. रिटायरमैंट के बाद घुटनों या कमरदर्द के साथ खुद झाड़ूपोंछा करना या भारी सामान उठाना मुश्किल होता है. भारत में घरेलू सहायक इस बोझ को उठा लेते हैं.

दवाइयों से ले कर राशन तक, सबकुछ एक फोन या ऐप पर घर आ जाता है. भारत में आप किसी भी बड़े डाक्टर या स्पैशलिस्ट से बिना हफ्तों इंतजार किए मिल सकते हैं. अब भारत के बड़े शहरों में होम हेल्थकेयर की सुविधा बढ़ गई है, जहां नर्स या फिजियोथेरैपिस्ट घर आ कर इलाज करते हैं.

विदेशों में (विशेषकर पश्चिमी देशों में) जीवन काफी व्यस्त और व्यक्तिगत होता है. भारत के त्योहार, शोरशराबा और पड़ोसियों के साथ मेलजोल की कमी वहां खलती है. इसलिए भी लोग वापस आना चाहते हैं.

पैसा कमा लिया अब लौट चलते हैं

अगर आप की पैंशन या बचत डालर या पाउंड में है, तो भारत में आप बहुत ही लग्जरी जीवन जी सकते हैं. जो पैसा विदेश में सिर्फ बुनियादी जरूरतों में खत्म हो जाता है, भारत में उसी पैसे से आप यात्राएं कर सकते हैं और एक बड़ा घर खरीद सकते हैं.

सच तो यह है कि इन लौटने वालों का देशप्रेम से कुछ लेनादेना नहीं है. ये स्वार्थी लोग सिर्फ अपने मतलब के लिए यहां आ रहे हैं और पक्का है कि फिर बातबात में भारतीय गंदगी का रोना रोएंगे पर करेंगे कुछ नहीं. यही इन का कड़वा सच है.

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