Marriage bond : संसद  में बहस के दौरान हलकेफुलके मजाक भी होते रहते हैं जैसे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (एस) के नेता देवेगौड़ा पर कमैट किया कि  उन्होंने पहले कांग्रेस से मैरिज की और फिर डिवोर्स ले लिया. खड़गे ने यह नहीं कहा कि आजकल देवेगौड़ा भारतीय जनता पार्टी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हैं जहां उन की हैसियत फीमेल सी है, जो कमजोर और जूनियर पार्टनर है.

अगले दिन देवेगौड़ा ने एक सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर क्लीयर किया कि ऐब्यूजिव मैरिज से अच्छा डिवोर्स है. कांग्रेस से उन्हें ऐब्यूज मिली और कांग्रेस ने मैरिज के दौरान उन्हें इग्नोर किया.

दोनों नेताओं ने कम से कम यह तो माना कि मैरिज कोई सैक्रोसैंक्ट 7 जन्मों की रिलेशनशिप नहीं है. 1955 के हिंदू मैरिज ऐक्ट के बावजूद आज भी बहुत सी परेशान औरतें डिवोर्स को स्टिग्मा मानती हैं और ऐब्यूजिव रिलेशनशिप को ढोए जाती हैं क्योंकि डिवोर्स वाइफ की हमारे समाज में विडो जैसी हालत है जिसे धार्मिक कामों में अवौइड किया जाता है.

यह पक्का है कि सदियों से औरतों के मन में भर दिया गया है कि उन की ऐग्जिस्टैंस तो हसबौंड के साथ है, अकेले नहीं और एक बार पंडे, चर्च, पादरी, मुल्ला के सामने मंदिर, गुरुद्वारे में शादी हो गई और गौड की ब्लैसिंग हो गई तो यह रिलेशनशिप टूट नहीं सकती. सदियों से औरतें पुरुषों के जुल्मों को सहती रही हैं और शादी के बाद हर साल कमजोर होती जाती हैं जब इन का रंगरूप रसोई और बच्चों की देखरेख में ढलता जाता है.

औरतों को पहले तो बाहर काम करने नहीं जाने दिया जाता था कि कहीं वे अपनी असली कीमत न जान जाएं और जब से जानने लगी हैं तब भी पति उन्हें दबाने की पूरी कोशिश करते हैं. भारत में अधिकतर जज भी इस मैंटेलिटी के हैं कि डिवोर्स क्यों दिया जा रहा है. हसबैंडवाइफ रिलेशनशिप उसी तरह की औप्शन वाली है जैसी जनता दल (एस) और कांग्रेस की थी कि जब चाहो अपना लो, जब चाहो पार्टनर बदल लो.

यह औप्शन औरतों को अपने फैसले करने लायक बना देता है. जहां यह औप्शन होता है वहां अगर पतिपत्नी साथ रहते हैं तो दोनों एकदूसरे की रिस्पैक्ट करते हैं, वे एकदूसरे के जिंदगी के फैसले लेने में साथ देते हैं, और्डर नहीं करते. उन की रिलेशनशिप मास्टर सर्वैंट की नहीं होती, इक्वल पार्टनर की होती है और भरपूर चलती है.

मैरिज करने से पहले सीरियस डिसीजन दोनों को लेना चाहिए कि दोनों एकदूसरे की सपोर्ट के बदले अपनी कुछ इंडिपैंडैंस, कुछ हैबिट्स, कुछ पैशन छोड़ेंगे और घर और दूसरे के लिए सैक्रीफाइस करेंगे. मैरिज एक रिचुअल नहीं बहुत कुछ पाने के लिए कुछ देना है. अगर दोनों में से एक समझे कि उसे सिर्फ मिलेगा ही तो वह भारी नुकसान में रहेगा और जब तक मैरिज चलेगी, रोता रहेगा.

मैरिज तोड़ने के लिए नहीं है. यह टैंपरेरी अरेंजमैंट न हो. यह किराए का मकान नहीं. यह कार नहीं जो 15 साल बाद स्क्रैप हो जाएगी. इसे संभाल कर रखो, जीवनभर चलाओ. पर इस का फैसला करना पड़ेगा

25-30 साल की उम्र में जब कोई जीवन का ऐक्सपीरियंस नहीं है. इस का मतलब क्या होता है इस के लिए उपन्यास पढ़ें, सुखी जोड़ों को देखें,   झगड़ने वाले कपल्स की स्टडी करें. अपने पार्टनर को लव लैटर लिखें. सिर्फ चैटिंग न करें जो सैकंडों में खत्म हो जाए. अपनी फीलिंग्स से दूसरे को मोल्ड करें, उस की फीलिंग्स को सम  झें. यह प्रोजैक्ट पेरैंट्स, पंडों, मैट्रीमोनियल्स साइट्स का दिया गया नहीं होता.

मैरिज टूटना कोई बड़ी बात नहीं है पर उस ऐक्सीडैंट की तरह है जिस में एक की मौत हो जाती है. हजारों ऐक्सीडैंट्स में डैथ्स भी होती हैं, हजारों डाइवोर्स भी होते हैं पर सब में किसी की गलती होती है, कभी एकदूसरे की तो कभी बाहर वाले की. उस के लिए खुद को तैयार करना जरूरी है पर इसे चांस पर छोड़ें. जहां स्पीड लिमिट 40 किलोमीटर की है वहां 140 किलोमीटर पर चलें तो ऐक्सीडैंट होगा. जहां 10 हजार किलोमीटर पर फुल सर्विस की जरूरत हो और कर ली जाए वहां व्हीकल सेफ रहता है. सेफ मैरिज में रहें, अचानक जरूरत पड़ने पर अपने विलेन से शादी न करें जैसा कांग्रेस और जनता दल (एस) ने कर्नाटक में किया था.

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