Emotional bond : आईवीएफ तकनीक के जरीए जिस चौहान युगल की 2 बेटियां जनवरी, 2026 में पैदा हुई थीं, अब बेबात में हल्ला मचा रहे हैं कि बायलौजिकली बेटियां उन की नहीं हैं. उन्होंने एक आईवीएफ सैंटर में अपना स्पर्म और एग दिया था ताकि डिश में ऐंब्रियो फर्टिलाइज कर के पैदा किया जा सके. ऐंब्रियो बन जाने के बाद उसे मां के यूटरस में ट्रांसप्लांट किया जाता है.

यह सिस्टम उन कपल्स के लिए अपनाया जाता है जिन से सैक्स के बाद स्पर्म बने हुए एग को फर्टिलाइज नहीं कर पाता. इस के बहुत से मैडिकल कारण हो सकते हैं. यूटरस या फैलोपियन ट्यूब में इन्फैक्शन, ब्लौकेज, एग का ट्रैवल न कर पाना, स्पर्म का वीक होना बगैरा. डिश में जब नैचुरल प्रक्रिया लैब की देखरेख में दोहराई जाती है तो मिस होने के चांसेज कम हो जाते हैं.

चौहान युगल का कहना है कि उन्होंने जो स्पर्म और एग लैब को दिया था वह उन का खुद का था पर जो ऐंब्रियो ट्रांसप्लांट किया गया वह किसी और के स्पर्म और एग का है. नतीजा यह है कि जुड़वां बेटियां उन की बायोलौजिकल संतानें नहीं हैं. हालांकि मिसेज चौहान ने ही 9 महीने उन्हें अपने यूटरस में रखा था और वहीं उन की प्रैगनैंसी डिलिवरी हुई और जो बच्चे डिलिवर हुए वे उन्हीं के यूट्रस के थे.

अब यह जोड़ा कह रहा है कि वे इन बच्चों को अपना नहीं मानते और क्लीनिक से सही बच्चों की मांग कर रहे हैं. यह आईवीएफ तकनीक के साथ कोरी बेईमानी है. चाहे लैब से गलती हुई या नहीं, जो बच्चे एक औरत ने 9 माह अपने यूटरस में रखे वे उसी के माने जाएंगे क्योंकि उन का जन्म उसी औरत से हुआ था. बच्चों के साथ यह अन्याय होगा अगर कपल ऐंब्रियो की अदलाबदली के कारण अदालतों के चक्कर लगाने लगें. आज वे टौडलर कोख का मतलब सम?ा नहीं सकतीं पर बड़े होने पर उन्हें सम?ा आएगा कि जिस मां के गर्भ से वे निकलीं वह ही उन की मां नहीं तो यह पूरा अन्याय होगा.

नैटफ्लिक्स पर एक फिल्म है ‘नथिंग टू लूज’ जिस में एक ऐसी मां जिस के यूटरस में डोनर ऐंब्रियोे डाला जाता है अपने बेटे को जान से ज्यादा प्यार करती है. जब उस के 9 साल के बेटे को ल्यूकेमिया पाया जाता है तो डाक्टर बोनमैरो को बदलने की सलाह देते हैं पर यह बोनमैरो किसी बायोलौजिक पेरैंट, सिबलिंग, रिलेटिव का होना चाहिए. लैब से उन्हें पता चलता है कि जब उन्हें ऐंब्रियो डोनेट किया गया था तो 2 ऐंब्रियो एक ही कपल डोनर के फर्टिलाइज हुए थे और दूसरा कहीं और है पर क्लीनिक दूसरे बच्चे का पता देने से इनकार कर देता है. इस पर वह औरत हंगामा मचा देती है और हौस्पिटल का एक फ्लोर तो होस्टेज तक कर लेती है. जब शोर मचता है तो दूसरे वाले बच्चे की मां अपने बेटे को ले आती है और बोनमैरो ट्रांसफ्यूजन से ल्यूकेमिया पीडि़त की जान बच जाती है.

बेबी जिसे जन्म दिया यदि उसे अपना नहीं माना जाएगा तो किसे माना जाएगा? रेप विक्टिम भी अपने बच्चों की सेफ्टी के लिए जान लगा देती हैं जबकि बच्चा रेप के कारण पैदा हुआ था. मां का प्यार जेनेटिक नहीं होता, 9 महीने किसी को अपने यूटरस में रखने से और फिर उसे पलते देख कर होता है.

यह चौहान कपल शायद अधिक धर्मभीरु है और उसे लगता है कि उस का वंश किसी और के जेनेटिक बच्चे से नहीं चलेगा. जब गोद लिए बच्चे से वंश चल सकता है तो ऐंब्रियो के डोनेशन वाला या खुद के होने का क्या फर्क पड़ता है. यह कोरा अंधविश्वास है कि बच्चों में जब तक अपने जेनेटिक गुण न हों वे अपने नहीं होते.

यूरोप, अमेरिका में सैकड़ों कपल्स ऐसे हैं जो भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, अफ्रीका से बच्चे गोद ले जाते हैं और उन्हें अपने बच्चे की तरह पालते हैं जबकि उन्हें वे तब मिले थे जब पैदा हो चुके थे. हमारा पौराणिक इतिहास भी ऐसे पात्रों से भरा पड़ा है जिन में खुल्लमखुल्ला माना गया है कि पुत्र या पुत्री कम से कम पिता की तो बायोलौजिकल नहीं है. इन में से कई को तो आज भी जम कर पूजा जाता है. जो अंधविश्वासी हैं उन्हें तो समझना चाहिए कि बच्चों से प्यार पालने पर होता है, केवल स्पर्म और एग के कारण नहीं होता.

उम्मीद की जाती है कि अदालतें चौहान दंपती को फटकार लगाएंगी कि वह जो मांग कर रहा है वह अनैतिक और अन्यायी है.

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