जंतरमंतर हुए जेन जी के प्रोटेस्ट के बाद वे अचानक से लाइमलाइट में आ गए हैं. जेन जी को ले कर सोशल मीडिया पर एक बहस सी छिड़ गई है. कोई नीट पेपर मामले में उन के मूव की तारीफ कर रहा है तो कोई उन के गैरजिम्मेवार रवैए और गालियों को ले कर उन्हें मग भरभर के कोस रहे हैं.
हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि एक तरफ जहां इस पीढ़ी के पास डिजिटल दुनिया की समझ, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और निडरता है, वहीं दूसरी तरफ व्यावहारिक जीवन की छोटीछोटी चुनौतियां भी इन के सामने पहाड़ बन कर खड़ी हो जाती हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ये लोग उस दौर में जी रहे हैं जिन्होंने कोई कमी नहीं देखी। ये अपने मां बाप के पैसों के दम पर पलने वाली पीढ़ी है, जिन्हें अपने चारों तरफ एक प्रोटेक्टिव माहौल मिला हुआ है.
यह तो सही है, लेकिन अगर व्यवहारिक तौर पर देखें तो जेन जी को इस का नुकसान ज्यादा उठाना पङ रहा है.
आइए, इसे कुछ प्रमुख बिंदुओं के जरीए समझते हैं कि कैसे अति सुरक्षात्मक माहौल आगे चल कर व्यावहारिक जीवन में बाधा बनता है :
हेलिकौप्टर पेरैंटिंग और डिसिजन लेने में हिचकिचाहट
आज के पेरैंट्स वे हैं जिन्हें 4-5 नहीं बल्कि 1-2 बच्चे ही पालने हैं. यही वजह है कि वे उन्हें हर सुखसुविधा देना चाहते हैं. वे बच्चों को ले कर इतने प्रोटेक्टिव हैं कि उन की हरेक चीज खुद करते हैं.
इसलिए जब भी मुश्किल आ खड़ी होती है तो वे तुरंत बच्चों की ढाल बन जाते हैं. स्कूल के प्रोजेक्ट से ले कर कैरियर के चुनाव तक, मातापिता ही सारे फैसले लेते रहे हैं इसलिए जेन जी को खुद से कोई फैसला लेने की आदत ही नहीं होती। उन्हें दूसरे की बैसाखी के सहारे की आदत हो जाती है.
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