Political ideology clash : एक समय था जब लोग राजनीति को ले कर न के बराबर बात करते थे.राजनीति से संबंधित बहुत कम बातें लोगों को पता होती थीं.बड़ेबुजुर्ग पत्रपत्रिकाओं के जरीए जानकारी रखते थे. लेकिन आज के समय में पिछले कुछ सालों से राजनीतिक बातें सिर्फ पारिवारिक घरों की डाइनिंग टेबल तक ही नहीं पहुंची है, बल्कि दोस्तों, रिश्तेदारों, फैमिली फंक्शन आदि जगहों पर भी राजनीतिक पार्टी से संबंधित बातें या यों कहें कि अपनी पसंदीदा पार्टी को ले कर वादविवाद शुरू हो गया है.

बात सिर्फ वादविवाद तक हो तो भी गनीमत है, लेकिन आज के मौजूदा हालात में अपनी पसंदीदा पार्टी को ले कर यह वादविवाद मनमुटाव से आगे बढ़ कर मारपीट तक पहुंच गया है.

पिछले कुछ सालों से बीजेपी सपोर्टर को अंधभक्त के नाम से पुकारा जाता है, वहीं कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करने वाले लोग अपनीअपनी पार्टी को सपोर्ट करने के चक्कर में झगड़ा और मारपीट तक करने लग जाते हैं. आज हालात कुछ ऐसे हैं कि लगातार सोशल मीडिया पर राजनीतिक चर्चा के चलते हर पीढ़ी के लोगों को अपनी पार्टी को सपोर्ट करने के चक्कर में पौलिटिक्स में दिलचस्पी बढ़ती जा रही है.

मजे की बात तो यह है भारत के हर आदमी को यही लगता है कि वह जिस पार्टी को सपोर्ट कर रहा है, वही सब से अच्छी पार्टी है और देश के हित में काम कर रही है.

ऐसे में पौलिटिक्स सिर्फ लोगों की डाइनिंग टेबल तक ही नहीं, लोगों के दिमाग में भी घुस गई है, जिस के चलते एक ही घर में अपनी पार्टी को सपोर्ट करने के चक्कर में भाईभाई में झगड़ा हो रहा है, तो कभी दोस्तों के बीच झगड़ा हो रहा है, तो कभी रिश्तेदारों के बीच झगड़ा हो रहा है.

अगर फिल्म इंडस्ट्री की भी बात करें तो फिल्म इंडस्ट्री भी 2 भागों में बंटी हुई है, जिस में कुछ लोग बीजेपी को सपोर्ट देते हैं, तो कुछ अन्य लोग दूसरी पार्टियों को सपोर्ट करते हैं.

भारत ही नहीं विदेशों का हाल भी बुरा हैराजनीतिक को ले कर यह हालत सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है.

अमेरिका में भी अगर कुछ लोग ट्रंप की पार्टी को सपोर्ट करते हैं, तो कुछ लोग दूसरी पार्टी को सपोर्ट करते हैं.इस वजह से अमेरिका में भी अपनीअपनी पार्टी को सपोर्ट करने के चक्कर में परिवार के सदस्य आपस में लड़ रहे हैं.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि ऐसी क्या वजह है कि लोग देश की राजनीति को पर्सनल लेने लगे हैं? अपनी पसंदीदा पार्टी को सपोर्ट करने के लिए लड़नेमरने को तैयार हैं.

दिलचस्पी के पीछे खास वजह

आज के समय में बीजेपी, कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को ले कर ओवर पजेसिव होने के साथ ओवर रिएक्ट करने के पीछे खास वजह यह है कि पिछले 30-40 सालों में मंदिर, मसजिद, चर्च जैसे धार्मिक स्थल लोगों की जिंदगी में बहुत ज्यादा हावी हो गए हैं.आम लोग अपने काम कम और भगवान और गौड को ले कर ज्यादा बातें करते हैं, जो उन के धर्म को आगे बढ़ाता है. ऐसे लोग भी धर्म और भगवान को बहुत ज्यादा मानते हैं.इसलिए उन्हें ऐसा लगता है कि उन का नेता धर्म और धार्मिक कार्यों के साथ है और धर्म व भगवान को साथ ले कर आगे बढ़ता है. इसलिए वह कभी गलत हो ही नहीं सकता. ऐसे भक्त अपनी पार्टी को आंख बंद कर के सपोर्ट करते हैं क्योंकि वे कर्म से ज्यादा भगवान, मंदिर, धार्मिक चैनल, धार्मिक फिल्में, धार्मिक साहित्य, देवी के लिए जागरण आदि बातों को बहुत महत्त्व देते हैं.

लिहाजा, जहां पर भी इन को अपने जैसे धार्मिक लोग मिलते हैं, जो इस बात का समर्थन करते हैं और एक ही विचारों वाले होते हैं वे एकसाथ हो जाते हैं और उन की संख्या भी ज्यादा हो जाती है.ऐसे लोगों का सर्किल बहुत बड़ा होता है और ये सभी एकसाथ सुबह की वौक, फिल्म देखने या पार्टी करने जैसे काम एकसाथ करते हैं.लिहाजा, इन की संख्या धीरेधीरे बढ़ती रहती है.

जब लोग दिलचस्पी नहीं लेते

इस के विपरीत जो लोग ऐसी पार्टियों का समर्थन नहीं करते, वे कहीं न कहीं अकेले पड़ जाते हैं और उन की संख्या भी कम होती है क्योंकि ऐसे लोग न तो ज्यादा दोस्त रखते हैं और न ही किसी झुंड में शामिल होते हैं. इसलिए एक पार्टी अगर मजबूत है तो दूसरी पूरी तरह कमजोर होती है.

जैसेकि अमेरिका में भी चर्च और यीशु को सहयोग करने वाले जातकों की बढ़ोत्तरी एक पार्टी के साथ शुरू हुई, जिस का पूरा कंट्रोल चर्च से होता था.ऐसे ही हमारे यहां मंदिरों से हो रहा है. बीजेपी पार्टी वाले राम मंदिर, अयोध्या, प्रवचन जैसी कई धार्मिक बातें अपने कार्यों में जोड़ते हैं, जबकि कांग्रेस पार्टी सिर्फ चुनाव और देश की बात करती है और अपने काम में व्यस्त रहती है.

इसलिए पिछले 70 सालों में कांग्रेस को ले कर जितनी बातें नहीं हुई वह पिछले कुछ ही सालों में बीजेपी और उन की पौलिटिक्स को ले कर हुई. राम मंदिर, अयोध्या, नवरात्रि उपवास, श्राद्ध जैसी कई बातें इन पार्टी के समर्थकों के पास होती हैं.

धर्म का सहारा क्यों

यही वजह है कि कांग्रेस जो इन सब बातों पर कोई बात नहीं करती इसलिए दूसरी पार्टी कांग्रेस को देश चलाने के लिए सही प्रतिनिधि नहीं मानते हैं और न ही कांग्रेस उन के व्यक्तिगत जीवन में शामिल है, जैसेकि बीजेपी शामिल है और जिस के चलते आम लोगों की भावना का फायदा उठाने वाले, धर्म के नाम पर फायदा उठाने वाले पाखंड बीजेपी को सपोर्ट करने वाले लोगों का फायदा उठा रहे हैं और धर्म का सहारा ले कर आपस में लड़ाई करवा रहे हैं.

ऐसे लोग हिंदूमुसलमान में झगड़ा लगा कर राम मंदिर बनाने का रौब झाड़ कर आम लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल कर के अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं.

मुसलमानों को खदेड़ कर, फिल्मों के जरीए हिंदूमुसलमान के झगड़ों पर आधारित फिल्में बना कर हिंदू धर्म का प्रचार करते हैं, इसलिए सारे धार्मिक लोग इन को सपोर्ट करते हैं, कांग्रेस को गलत मानते हैं और कांग्रेस को बिलकुल भी सपोर्ट नहीं करते क्योंकि बीजेपी के आम लोगों के अनुसार कांग्रेस वाले मांसाहारी भी हैं, मुसलमान भी हैं, धर्म के खिलाफ हैं, इसलिए कई सारे लोग कांग्रेस के खिलाफ और बीजेपी के समर्थक हैं.

डर से शुरुआत

गौरतलब है कि यह सब बातें 30-40 सालों से शुरू हुई जब राम मंदिर मूवमेंट शुरू हुआ था, मंडल कमीशन बना था.

जब से मंडल कमीशन बना है तब से उसी के डर से यह सब शुरू हुआ.पहले हर क्षेत्र में ऊंची और नीची जाति के लोग एकसाथ काम करते थे, जाति को ले कर कोई प्रेशर नहीं था.अब लोग धर्म के नाम पर बटे हैं.ऊंची जाति के लोगों को बड़ी पोस्ट मिलती है और छोटी जाति के लोगों को छोटामोटा काम जैसे स्पौट बौय, डिलिवरी बौय, रिकशावाला, भाजीवाला आदि छोटेमोटे कम मिलते हैं, जिस के चलते आम लोगों के बीच भी धीरेधीरे धर्म की दीवार खड़ी हो गई है, जिस वजह से एक ही घर में 2 लोग 2 भागों में बट गए हैं.अगर एक बीजेपी का सपोर्टर है तो दूसरा कांग्रेस का, जो देश की वर्तमान स्थिति के लिए खतरनाक संकेत है.

अगर एक ही परिवार का सदस्य इंजीनियर या डाक्टर बनने को ले कर मतभेद या विवाद नहीं करता है, तो 2 पौलिटिकल पार्टी को ले कर विवाद क्यों?

बीजेपी पार्टी को सहयोग करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ ज्यादा हैं जिन की तादाद कम है, लेकिन उन के पास पैसे ज्यादा हैं.सारा लेनदेन भी इन्हीं से होता है.दोस्ती,यारी, बिजनैस सब इन्हीं के पास है.लिहाजा, धर्म के चलते ये एक ही पार्टी को सपोर्ट करते हैं.

भेदभाव क्यों

अमेरिका में भी यही प्रौब्लम है.एक पार्टी के लोग जो पढ़ेलिखे हैं, उन का कहना है कि बड़ेछोटे का भेदभाव न कर के सब को ले कर चलें.वहीं दूसरी पार्टी वाले जो चर्च और यीशु को मानते हैं वे ऐसा करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि वे अपनेआप को सुपीरियर मानते हैं.इस के चलते अमेरिका में भी 2 अलगअलग पार्टी को समर्थन करने वाले एक ही परिवार के सदस्य डाइनिंग टेबल पर भी लड़तेझगड़ते नजर आते हैं.

इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि भारत हो या अमेरिका, राजनीति, धर्म, पावर, पैसे के नाम पर लोगों की जिंदगी में खून की तरह शामिल हो गई है, जो फिलहाल लाइलाज है.

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