Family Story : दिन  के 11 बजे का समय था और सूरज अपने अक्ष पर मुसकरा रहा था. छिटपुट बादलों ने आसमान में अटखेलियां शुरू कर दी थीं और रुकरुक कर सूरज को ढंकने की नाकाम कोशिशें चल रही थीं. अपनी कुरसी पर बैठी 30 वर्षीय ऋतिका की नजरें डेस्कटौप की स्क्रीन में जमी हुई थी और उंगलियां बिना रुके कीबोर्ड पर चल रही थी.

ऋतिका ने स्कूल में प्रशासनिक कार्यभार संभाल रखा था और नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने वाला था, तो उस के ऊपर अन्य सत्र में आने वाले बच्चों की सारी जिम्मेदारी थी और ढेर सारा कागजिए काम.

अपने काम में डूबी ऋतिका का ध्यान तब भंग हुआ जब उस के मोबाइल पर मैसेज की नोटिफिकेशन बजी. उस ने स्क्रीन से नजरें हटा कर एक नजर अपने मोबाइल पर देखा. जिस पर उस की दोस्त मीरा ने व्हाट्सऐप मैसेज किया था ऋतिका ने एक क्षण को अपना काम रोका और मोबाइल उठा कर उस मैसेज को पढ़ा. ऋतिका की आंखें भर आईं और न चाहते हुए भी वह वहीं पर जोर से रो पड़़ी.

पास के डेस्कटौप को निहारती उस की अधेड़ उम्र की सहकर्मी शालिनी की नजर जब उस पर पड़ी, तो वह घबरा कर कुरसी से उठी और ऋतिका के पास आ कर पूछा, ‘‘अरे

ऋतिका क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो? सब ठीक तो है?’’

ऋ तिका ने पहले तो हां में जवाब दिया पर जब शालिनीजी ने ज्यादा जोर दिया तब एकाएक ऋ तिका की आंखों में गुस्से की लहर आई और उस ने चिढ़ कर कहा, ‘‘उस ने मेरी ट्रिप खराब कर दी?’’

शालिनीजी ने चकित लहजे में कहा, ‘‘ट्रिप? कौन सी ट्रिप? किस ने क्या किया? थोड़ा खुल कर बताओ?’’

ऋ तिका ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मेरी दोस्त मीरा को 10 साल हो गए थे उस से मिले,

3 महीने पहले मैं ने ही प्लान किया था कि हम लोग साथ घूमने जाएंगे. उस टाइम उस ने कहा था ठीक है.

‘‘मैं ने इतनी तैयारियां कर रखी थी, अगले हफ्ते मु?ो निकलना था. कितना कुछ सोचा था मिलेंगे तो ऐसे बात करेंगे, ऐसी रील्स बनाऊंगी, यों मिलूंगी, जाने क्याक्या. कितनी उत्साहित थी मैं. पर देखिए उस ने क्या मैसेज भेजा है.’’

यह कहते हुए ऋ तिका ने अपना मोबाइल शालिनीजी की तरफ बढ़ा दिया.

शालिनीजी ने मैसेज को जोर से पड़़ा.

‘‘सौरी ऋ तिका मैं नहीं आ पाऊंगी ट्रिप पर. मैं ने जैसे पहले भी कहा था कि मम्मी की तबियत ठीक नहीं है. मैं उन को छोड़ कर अभी नहीं चल पाऊंगी. टिकट कैंसिल कर देना. ऐंड सौरी वंस अगेन.’’

शालिनीजी ने अभी पढ़़़़़ना बंद ही किया था कि ऋ तिका फिर बोल पड़ी.

‘‘पता है शालिनीजी, मु?ो न एक हफ्ते से लग रहा था कि वह कैंसिल कर देगी. उस की बातों में अब वह उत्साह नहीं ?ालकता था, जैसे उसे मु?ा से मिलने की ख्वाहिश ही न रही हो. मैं यहां बस उस से मिलने के सपने देख रही थी और उस ने प्लान कैंसिल कर दिया. कहती है कि यू कंटिन्यू विथ योर प्लान, हम फिर कभी मिल लेंगे. मैं ने 3 दोस्तों का प्लान बनाया था. मैं और स्नेहा तो जा रहे हैं पर उस ने ऐसा कर दिया. आप ही बताओ यह धोखा ही तो है.’’

शालिनीजी ने ऋ तिका के आंसुओं को पोंछा और फिर सम?ाते हुए कहा, ‘‘अब क्या कर सकते हैं तुम अपना मन छोटा मत करो. हो सकता है, उस की मां सच में बीमार हो. सब अपनेअपने तरीके से सोचते हैं. तुम अपना ट्रिप ऐंजौय करना. इस के लिए रोने की क्या बात है.’’

ऋ तिका ने ?िड़़कते हुए कहा, ‘‘आप

नहीं सम?ोंगी, मु?ो कितनी तकलीफ हुई है. आप रहने दो.’’

मीलों दूर अपने कमरे की तनहाई में अपने मोबाइल को हाथों में घुमाती मीरा,

खामोशी से जाने किस अनंत को ताक रही थी. सामने मेज पर पिता की एक नई तसवीर रखी हुई थी, जिस पर उस ने माला डालने से इनकार कर दिया था क्योंकि तसवीरों पर लगी मालाएं लोगों के न होने का एहसास हर पल करवाती हैं और उसे अपने पिता को खोने के एहसास से बचना था. मन में एक भारीपन था, अभी 15 दिन ही तो हुए थे जब उस के पिता 6 महीने तक बिस्तर पर रहने के बाद चल बसे थे.

सिर से छत चली जाए तब भी स्थिति

उतनी भयावह नहीं होती, जितना कि पिता का साया के उठने के बाद असुरक्षा और सूनापन छा जाता है.

अपनी शून्यता में वह इतनी लीन थी कि मां की एक बार दी गई आवाज भी उसे सुनाई नहीं दी, पर जब दूसरी बार आवाज आई तो वह भाग कर बगल के कमरे में गई.

2 दिन से मां की हालत ज्यादा खराब चल रही थी. संक्रमणीय बुखार और ऐंटीबायोटिक दवाओं ने मां को पूरी तरह कमजोर कर दिया था. पिता के जाने के बाद आए कार्यभार तक तो ठीक था, पर जैसे ही घर खाली हुआ मां के जीवन में आए खालीपन ने उसे और खोखला कर दिया.

वे एक अलग तरह के तनाव में थीं जिस का असर अंतत: बीमारी के रूप में शरीर पर आ पड़ा. मां को दवाएं और पानी देने के बाद मीरा काफी देर तक मां के सोते हुए चेहरे को देखती रही, अब कौन था उस का अपना. जीवन में कितने भी रिश्ते आएं या जाएं पर मातापिता तो आधार होते हैं, पहचान होते हैं, साहस और हौंसला होते हैं. पिता जा चुके थे और मां यहां बीमार पड़ी हुई थी. मन में एक अनजाना सा डर समाया हुआ था कि कहीं वे उन्हें भी न खो दें.

एकल परिवार में सदस्य भी तो कम होते हैं, उन में से भी एक का कम हो जाना असहनीय हो जाता है.

मीरा ने अपना मोबाइल उठा कर देखा ऋतिका ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया था. मीरा को अपनेआप में थोड़ी शर्मिंदगी हो रही थी, और एक मजबूरी सी महसूस हो रही थी. 3 महीने पहले जब ऋ तिका ने मिलने की बात की और ट्रिप प्लान किया तब भी उस ने कहा कि अगर सबकुछ ठीक रहेगा तब चलूंगी.

मीरा भी उस से मिलना चाहती थी पर अचानक से पिता के जाने से सबकुछ बदल चुका था. जाने कितनी देखी और अनदेखी समस्याएं और जिम्मेदारियां सामने आ गई थीं.

पिछले हफ्ते जब ऋ तिका ने फोन किया तब मीरा ने उसे दबे शब्दों में कहा कि शायद मैं नहीं जा पाऊंगी. कहने को वे कड़े शब्दों में भी उसे मना कर सकती थीं, पर वह उसे तकलीफ नहीं पहुंचाना चाहती थीं. उसे लगा कि ऋतिका उस की परिस्थिति समझेगी पर ऐसा हुआ नहीं.

ऋतिका के दवाब भरे काल्स और मैसेजेज आते रहे. अंतत: मीरा को उसे साफ शब्दों में कहना पड़ा.

क्षितिज पर जब शाम की सिंदूरी आभा लहराई उसी वक्त ऋतिका ने अपनी स्कूटी अपने दरवाजे पर लगाई और भागती हुई अपने पिता के पास गई, जो उस वक्त अपनी बड़ी बेटी श्रुति से बातें कर रहे थे.

वह भाग कर अपने पिता के गले लगी और रोते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं ने कहा था आप को डैडीजी कि मीरा मुझे धोखा देगी. देखो उस ने मैसेज किया है कि वह नहीं आएगी. मुझे टिकट कैंसिल करने को कहा है.’’

ऋ तिका के पिता ने उसे चुप करवाते हुए कहा, ‘‘तो क्या हुआ फिर कभी मिल लेना उस से. तुम्हें समझना चाहिए बेटा उस के घर की स्थिति ठीक नहीं है. इतनी जल्दी वह सबकुछ छोड़़ कर कैसे कहीं भी जाएगी.’’

ऋ तिका ने आंखें बड़ी कर आश्चर्य से अपने पिता को देखा और फिर कहा, ‘‘डैडीजी आप भी उस की तरफदारी कर रहे हो. आप को पता है न मैं ने कब से उस से मिलने का प्लान कर रखा था, उस के लिए गिफ्ट्स भी लिए हैं. आप को भी मेरी बात समझ नहीं आती.’’

इतना कहते हुए ऋ तिका अपने कमरे में चली गई और औंधे मुंह बिस्तर पर लेट गई.

कुछ पल खुद को शांत करने के बाद उस ने अपना फोन उठाया और मीरा का नंबर पंच

किया. 5वें रिंग पर मीरा ने काल रिसीव की, ‘‘हैलो.’’

‘‘हाय, कैसी हो? और आंटी कैसी हैं?’’

‘‘सब ठीक है. मां भी धीरेधीरे ठीक हो जाएंगी.’’

‘‘तो तुम ने टिकट कैंसिल करने को क्यों कहा?’’

‘‘मैं अभी नहीं जा पाऊंगी ऋ तिका, सम?ाने की कोशिश करो. मां को अभी अकेले नहीं छोड़ सकती.’’

‘‘मैं ने कब कहा आंटीजी को छोड़ने. अपने किसी कजिन को बोल दो न वे देखते रहेंगे.’’

‘‘कोई भी इस वक्त मां की वैसे देखभाल नहीं कर पाएगा जैसे मैं करूंगी. वे शारीरक रूप से ज्यादा मानसिक रूप से टूटी हुई हैं.’’

‘‘पर अंकलजी तो पहले से ही बीमार थे न. कितने महीनों से तो पता तो था ही न. मु?ा से आंटीजी की बात करवाओ मैं उन का डिप्रेशन बात कर के दूर कर दूंगी.’’

मीरा दो पलों के लिए अवाक रह गई और एक दर्द सा दौड़़़़़ गया उस के जेहन में,

पिता पहले से बीमार थे तो क्या? क्या उन का जाना सही था?

आखिर एक दोस्त ऐसी बातें कैसे कर सकती है. जीवन के सब से अंधेरे पड़ाव पर जब उसे साथ होना चाहिए था, समझना चाहिए था तब जाने कौन सा जिदद लिए बैठी थी वह.

मीरा ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘हर चीज का सही वक्त होता है. दर्द एक दिन में खत्म नहीं होता. शायद आज से 1 साल 2 साल के बाद मैं भी तुम्हारी तरह प्रैक्टिकल हो जाऊं पर आज नहीं हूं. मां अभी इस हालत में नहीं हैं कि वे तुम्हारी बकवास सुन सकें.’’

‘‘मीरा, तुम दर्द को कुछ ज्यादा ही अपना बना कर घूमती हो. अरे, बाहर निकलो घूमोफिरो तुम्हें भी अच्छा लगेगा. और मैं कोई बकवास नहीं कर रही.’’

‘‘ऋ तिका प्लीज. मेरे लिए मेरा परिवार सब से पहले आता है और उस को मेरी जरूरत है.’’

‘‘मैं भी तो तुम्हें अपना परिवार मानती हूं, कभी बहन से कम नहीं समझ मैं ने तुम्हें और

तुम ने आज मुझे पराया बना दिया. तुम्हें पता है कि जब तुम्हारा मैसेज आया की तुम नहीं आ रही

तो मैं कितना रोई, आसपास के सारे स्टाफ मुझ से पूछने आए कि मैं क्यों रो रही हूं.

मुझे तो गुस्सा भी इतना आ रहा है कि सामने रहती तो मैं अभी बहुत मारती तुम्हें. तुम ने मेरे सारे प्लांस बिगाड़़ दिए.’’

‘‘आई एम सौरी ऋ तिका कि मेरी वजह से तुम्हें तकलीफ हुई, पर मैं नहीं आऊंगी.’’

इतना कह कर मीरा ने फोन काट दिया. फोन बंद होने के बाद भी मीरा का

मन व्याकुल हो रहा था कि क्या यह दुनिया पहले से ही इतनी असंवेदनशील और व्यावहारिक है या यह दर्द की परिस्थिति उसे दुनिया के असली रंगरूप से परिचित करवा रही है या फिर अभी तक वह खुद एक आभासी दुनिया में जी रही थी. हंसीखुशी में साथ देने वाले दुख की परिस्थिति में इतने स्वार्थी कैसे हो जाते हैं.

एक क्षण के लिए भी ऋ तिका को आभास नहीं था कि वह क्या कर रही है और क्या बोल रही है? उस ने फिर खुद से कहा.

‘‘शायद परिस्थिति और नजरियों की बात

है. परिस्थितियां अलग नजरिए अलग. पर मैं ने

तो अपने पिता से वादा किया था, जब वे अंतिम सांसें ले रहे थे कि आप किसी बात की चिंता

न करें मैं सब संभाल लूंगी. तो मैं मां को कैसे छोड़ जाऊं.’’

उधर ऋ तिका अभी भी

अपने तकिए में मुंह डाल कर रोए जा रही थी कि उस की बरसों पुरानी दोस्त ने उसे धोखा दे दिया और उन की सालों पुरानी दोस्ती टूट गई.

राइटर- मनीषा मंजरी

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