Hindi fiction : दिल्ली से वाराणसी जा रही वंदे भारत ट्रेन में बैठी प्रिया ने खिड़की के बाहर भागते खेतों को देखा और घड़ी पर नजर डाली. सुबह के 6 बजे थे. दिल्ली से वाराणसी जा रही यह ट्रेन अपने समय पर थी.
आज कई साल बाद वह बनारस में अपनी लोकल गार्जियन और बड़़ी बहन जैसी अर्पिता दीदी से मिलने जा रही थी. जब वह बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो अकसर सैटरडे संडे उन के यहां ही रहती थी. पढ़ाई खत्म होने के बाद वह जौब के लिए दिल्ली आ गई और फिर वापस जाने का समय ही नहीं मिला था. आज वह बहुत खुश थी क्योंकि करीब 8 साल बाद उन से मिलेगी.
आज भी उसे जाने का बहाना तब मिला जब उस की अपनी बनारस वाली सहेली प्राप्ति की शादी का कार्ड मिला.
एसी चेयर कार के सीजेड/44 सीट पर बैठी प्रिया के पास एक सूटकेस था जिस में विवाह समारोह के लिए उस ने मां के कुछ कीमती गहने रखे थे. मखमल के डब्बे में पन्नों का हार, ?ामके और 2 सोने के कंगन. साथ में नया आईफोन भी.
प्रिया की बगल की सीट पर एक अधेड़ उम्र का मोटा सा आदमी बैठा था जो कानों में इयरफोन लगाए सो रहा था.
प्रिया ने बैग से किताब निकाली ही थी कि तभी एक आवाज आई, ‘‘भैया, प्लीज बुरा न मानें मुझे विंडो सीट पर बैठना पसंद नहीं है. क्या आप सीट बदल लेंगे और मेरी सीट पर बैठ जाएंगे?’’
प्रिया ने सिर उठा कर देखा. सामने भगवा कलर का सलवारसूट पहने, माथे पर बड़ा सा चंदन का टीका लगाए एक लड़की खड़ी थी.
उम्र यही कोई 24-25 साल. चेहरे पर अजीब सी मासूमियत. उस आदमी ने नींद में ही ‘हां’ कह दिया और सामान उठा कर लड़की की सीट पर चला गया. लड़की मुसकरा कर प्रिया की बगल में बैठ गई.
‘‘थैंक्यू दीदी. मेरा नाम गायत्री है. आप?’’
‘‘प्रिया,’’ प्रिया ने संक्षेप में कहा.
गायत्री ने ?ाले से एक छोटी सी भगवत गीता निकाली और माथे से लगाई और फिर बातों का सिलसिला शुरू किया…
‘‘दीदी, आप बनारस में कहां जा रही हैं? मेरा तो ननिहाल है वहां. परसों देव दीवाली है सो वही अटैंड करने जा रही हूं. इस दिन हमारे गुरुजी बहुत बड़ा भंडारा रखते हैं सो वहां भी सेवा का काम कर लूंगी.’’
प्रिया ने बताया कि वह एक मैरिज फंक्शन के लिए जा रही है. बस इतना सुनते ही गायत्री की आंखें चमक उठीं.

बातबात में प्रिया ने बताया कि वह कत्थक डांसर है और कई अवार्ड्स जीत चुकी हैं तो गायत्री तुरंत बोली, ‘‘अरे वाह, कला तो साक्षात सरस्वती का रूप है. आजकल के बच्चे तो बस रील बनाते हैं. संस्कार कहां बचे हैं. मेरी मां कहती हैं कि लड़की को नाचगाना, पूजापाठ, धर्मकर्म आना चाहिए. तभी शादी के बाद वह घर की अच्छी बहू बनती है.’’
प्रिया को गायत्री की बातें अच्छी लगीं. आज के जमाने में कौन इतनी धार्मिक बातें करता है. गायत्री ने भगवत गीता खोल ली थी. पेज पलटते हुए बोली, ‘‘सफर में पढ़ती हूं. मन शांत रहता है. आप भी पढि़ए न.’’
प्रिया मुसकरा दी. वह भी पूजापाठी परिवार से थी और बचपन में ही धर्म की घुट्टी पिला दी गई थी. वह साइंस ग्रैजुएट थी पर फिर भी मुंह पर गायत्री को जवाब नहीं दे सकी.
गायत्री ने गीता का एक पन्ना खोला, ‘‘देखिए दीदी, यहां लिखा है
कर्मण्येवाधिकारस्ते. मतलब इंसान को सिर्फ कर्म करना चाहिए, फल की इच्छा नहीं. पर आजकल तो लोग पूजा भी करते हैं तो डिमांड के साथ. हे भगवान, नौकरी लगवा दो, हे भगवान, बेटा दे दो. भक्ति कहां रही?’’
प्रिया ने हां में सिर हिलाया. तभी बगल वाली बोगी से एक लड़की गुजरी. उस ने छोटे कपड़े पहने थे, जींस और क्रौप टौप. टौप के नीचे स्किन दिख रही थी. बाल खुले थे और सिर पर कैप थी.
गायत्री ने उसे जाते हुए देखा और नाकभौं सिकोड़ लीं.
प्रिया के कान में फुसफुसा कर बोली, ‘‘देख रही हैं दीदी आजकल की लड़कियों को? शर्मलिहाज सब बेच खाया है. ऐसे कपड़े पहन कर ट्रेन में घूमती है. मांबाप कुछ सिखाते ही नहीं हैं. इसी वजह से समाज खराब हो रहा है. लड़कियां सूटसलवार में सिर ढक कर निकलती हैं तभी अच्छी लगती हैं. मगर इन्हें देखो ये तो सरासर अंग प्रदर्शन करती हैं. ऐसी लड़कियों के कारण ही छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ती हैं. संस्कार नाम की चीज ही नहीं है इन में. संस्कार तो घर से आते हैं दीदी.
‘‘मेरी मां कहती हैं कि लड़की की सब से बड़ी पूंजी उस की लाज है. जो लड़की मर्यादा में रहती है, उसी का घर स्वर्ग बनता है. ये जींस वाली मैडम क्या घर संभालेंगी? ऐसी लड़कियां तो करवाचौथ पर भी पिज्जा और्डर करती हैं.’’
प्रिया ने कुछ नहीं कहा. पर उसे लगा कि गायत्री उस लड़की को शायद थोड़ा ज्यादा ही जज करने लगी है. प्रिया खुद ऐसे कपड़े पहनती रही है और उस के बौयफ्रैंड ने उस के साथ ऐसे बहुत सी फोटो खींचे थे.
गाजियाबाद निकलते ही गायत्री ने बात का रुख मोड़ा, ‘‘दीदी, आप अयोध्या गई हैं कभी? मैं पिछले साल गई थी. राम लला के दर्शन कर के आत्मा तृप्त हो गई. 500 साल का संघर्ष था. कितने लोगों ने बलिदान दिया. अब जा कर मंदिर बना है. पर कुछ लोगों को अभी भी तकलीफ है.’’
प्रिया ने किताब बंद कर दी. गायत्री बोलती जा रही थी.
‘‘मैं तो कहती हूं दीदी, देश में कानून सख्त होना चाहिए. जो अपनी संस्कृति का सम्मान न करे, उसे नागरिकता का हक नहीं.
देखो पाकिस्तान में क्या हाल हैं. हमारे यहां फिर भी सब को छूट है बोलने की. इसी लोकतंत्र का फायदा उठाते हैं लोग. मेरे पापा कहते थे कि राजनीति और धर्म अलग नहीं हैं. राजा राम भी राजा थे और भगवान भी. जब तक नेता धर्म के रास्ते पर नहीं चलेंगे, देश का भला नहीं होगा. आप बताओ दीदी, क्या गलत कह रही हूं?’
प्रिया ने सिर्फ सिर हिलाया. उसे बहस नहीं करनी थी. गायत्री ने ?ाले से एक भगवा ?ांडा निकाला और उसे तह कर के रखा, ‘‘गुरु
पूर्णिमा पर आश्रम में लगाऊंगी. धर्म की रक्षा करना हर हिंदू का कर्तव्य है. वैसे दीदी, आप
क्या सोचती हैं लव जिहाद के बारे में?
आजकल कितनी लड़कियां बहकावे में आ जाती हैं. मांबाप ने कितने संस्कार दिए, सब मिट्टी में मिला देती हैं. इसलिए मैं कहती हूं लड़की को बचपन से ही रामायण, गीता पढ़ानी चाहिए. तभी अक्ल आएगी.’’
अगला 1 घंटा गायत्री राजनीति से ले कर राम मंदिर, स्त्री के संस्कार और आज की पीढ़ी के पतन पर बोलती रही. प्रिया बस सुनती रही.
कुछ ही देर में टिकट चैकर आया. गायत्री तुरंत उठी और टीसी के पास गई. प्रिया ने देखा कि गायत्री टीसी के कान में कुछ फुसफुसाई. टीसी ने इधरउधर देखा और धीरे से बोला, ‘‘ठीक है मैडम, जैसा आप कहें.’’
गायत्री वापस आ कर बैठ गई. प्रिया ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’
‘‘कुछ नहीं दीदी. मैं ने कहा कि मैं ने सीट बदल ली है.’’
कानपुर स्टेशन पर गायत्री उतरी. 5 मिनट बाद वापस आ गई. हाथ में प्रसाद का डब्बा था. ‘‘स्टेशन के हनुमान मंदिर का प्रसाद है दीदी, लीजिए.’’
प्रिया ने 1 लड्डू ले लिया. हर स्टेशन पर गायत्री उतरती. कभी कहती, ‘‘वाशरूम जाना है,’’ कभी ‘‘गुरुजी को फोन करना है, यहां नैटवर्क नहीं आता.’’ हर बार लौट कर वह धर्म की कोई नई बात छेड़ देती.
‘‘दीदी, आप व्रत रखती हैं? मैं तो हर एकादशी, पूर्णिमा का रखती हूं. शरीर शुद्ध होता है. मन काबू में रहता है. जो औरत व्रत नहीं रखती, उस का घर कैसे चलेगा? पुरुष तो बाहर कमाता है, धर्म पत्नी के जिम्मे है.’’
प्रयागराज स्टेशन से 20 मिनट पहले चाय वाला आया. ‘‘चाय, कौफी, समोसा.’’
गायत्री ने 2 कुल्हड़ चाय ली, ‘‘दीदी, सफर में यह वाली चाय न पी तो मजा नहीं. आप लीजिए न. मैं पिलाती हूं.’’
प्रिया ने मना किया पर गायत्री के इसरार पर ले ली. चाय कड़क थी, अदरक वाली. बचपन से ही प्रिया को मां और दादी के कहने पर पंडित का दिया हर प्रसाद खाने की आदत थी ही. प्रिया ने 2 घूंट पी और किताब पढ़ने लगी.
10 मिनट बाद ही प्रिया की पलकें भारी होने लगीं. किताब के शब्द धुंधले पड़ने लगे. उस ने घड़ी देखी. 1 बजा था.
‘‘लगता है रात ठीक से सो नहीं पाई…’’ सोचते हुए उस का सिर सीट पर टिक गया.
सोने से पहले आखिरी चीज जो उस ने देखी वह थी गायत्री का चेहरा. वह मुसकरा रही थी. पर उस मुसकान में मासूमियत नहीं थी.
‘‘मैडम, बनारस आ गया,’’ किसी ने प्रिया को हिलाया.
प्रिया हड़बड़ा कर उठी. सिर भारी था. घड़ी देखी. 2 बज रहे थे. वह 1 घंटे से ज्यादा सो गई थी. बगल की सीट खाली थी. गायत्री का ?ाला भी नहीं था.
प्रिया ने जल्दी से ऊपर अपना सूटकेस देखा. सूटकेस सलामत रखा हुआ था. प्रिया ने चैन की सांस ली और उसे उतार कर प्लेटफार्म पर उतर गई. कैब ले कर वह सीधे दीदी के घर पहुंची. कमरे में जा कर उस ने कपड़े निकालने और दीदी का गिफ्ट देने के लिए अपना सूटकेस खोला.
कपड़े सब वैसे ही थे. पर मखमल का डब्बा हलका लग रहा था. कांपते हाथों से उस ने डब्बा खोला. डब्बा अंदर से खाली था. पन्नों का हार, ?ामके, कंगन, आईफोन डेटा स्टोरेज हाई ड्राइव सब गायब.
प्रिया के पैरों तले जमीन खिसक गई. 8 लाख के गहने. वह वहीं बिस्तर पर बैठ गई. तभी दरवाजे पर नौक हुआ.
प्रिया को सब समझ आ गया. चाय, नींद, गायत्री का हर स्टेशन पर उतरना, टीसी से कानाफूसी और वह छोटे कपड़ों वाली लड़की की बुराई करना. सब दिखावा था. असली संस्कार तो नीयत में होते हैं.
प्रिया जल्दी से जीजाजी के साथ गोदौलिया थाने में एफआईआर लिखवाने गई. वहां वह फैमिली भी खड़ी थी जिन की सीट बगल की रौ में थी. अधेड़ औरत रो रही थी. वे लोग भी एफआईआर कराने ही आए थे.
‘‘बेटा, तुम्हारा भी सामान गया क्या? हमारा तो मंगलसूत्र, नक्द क्व50 हजार और बेटे की घड़ी सब सूटकेस से निकल गया. हम ने तो ताला भी लगाया था.’’
प्रिया ने भी अपनी पूरी कहानी सुनाई.
इंस्पैक्टर रमन ने पूरी बात सुन कर लंबी सांस ली, ‘‘मैडम आप लोग भगवा गैंग का शिकार हुए हैं. यह पिछले 6 महीने में 12वां
केस है.’’
‘‘भगवा गैंग?’’ प्रिया ने चकित हो कर पूछा.
‘‘जी हां यह 4-5 लड़कियों का गैंग है. ये भगवा कपड़े पहनती हैं, टीका लगाती हैं. धर्मकर्म की बातें कर के भरोसा जीतती हैं. दूसरों के कपड़ों पर कमैंट कर के खुद को संस्कारी दिखाती हैं. इन का नैटवर्क टीसी से ले कर पैंट्री बौय, चाय वाले तक है. चाय में नशा मिलाते हैं. आप सो जाते हो तब ये सूटकेस का लौक खोल लेते हैं. मास्टर चाबी रखते हैं.’’
प्रिया ने पूछा, ‘‘पर वे हर स्टेशन पर क्यों उतरती थी?’’
‘‘सामान ठिकाने लगाने के लिए हर स्टेशन पर उन का एक आदमी खड़ा होता है. लड़की उतर कर उसे माल दे देती है. ट्रेन चल देती है. कोई शक नहीं. टीसी को हिस्सा मिलता है इसलिए वह चुप रहता है.’’
इंस्पैक्टर ने फाइल दिखाई. उस में गायत्री का फोटो था. पर नाम
लिखा था, ‘‘पूजा उर्फ रेशमा उर्फ गायत्री.’’
1 महीना बीत गया पर गहने वापस नहीं मिले. पुलिस ने कहा, ‘‘जांच चल रही है’’.
जिस का मतलब था केस बंद. इंश्योरैंस भी नहीं था. करीब क्व8 लाख का नुकसान. पर प्रिया ने हार नहीं मानी. उस ने ‘सफर साथी’ नाम से एक इंस्टाग्राम पेज शुरू किया. पहली पोस्ट में उस ने पूरी कहानी लिखी :
‘‘मैं प्रिया हूं. एक ‘भगवा चोर’ ने मुझे लूटा. भगवा कपड़े पहने थी, माथे पर चंदन था, गले में रुद्राक्ष. गीता पढ़ती थी. राम मंदिर की बात करती थी. राजनीति पर लैक्चर देती थी. दूसरी लड़कियों के छोटे कपड़ों को गाली देती थी. खुद को सब से बड़ी संस्कारी बताती थी. पर नीयत से चोर थी. उस ने मु?ो चाय पिला कर सुलाया और क्व8 लाख के गहने ले गई.’’
पोस्ट के नीचे उस ने लिखा, ‘‘ठग का कोई धर्म नहीं होता. धर्म का चोला पहनना सब से आसान नकाब है. अगली बार ट्रेन में कोई धर्मकर्म की बात करे तो सुनिए जरूर पर अपना सूटकेस का ध्यान और अपना दिमाग खुला रखें.’’
पोस्ट 48 घंटे में वायरल हो गई. 3 लाख व्यूज. 200 से ज्यादा औरतों ने कमैंट किया. ‘‘मेरे साथ भी प्रयागराज रूट पर हुआ था.’’
‘‘मेरी मां को बनारस जाते वक्त लूटा था.’’
‘‘सेम तरीका, सेम भगवा कपड़े.’’
एक न्यूज चैनल ने प्रिया को बुलाया. प्रिया ने कैमरे पर कहा, ‘‘धर्म के नाम पर आजकल हरकोई धोखाधड़ी करने लगा है. पर मेरा सवाल है कि रेलवे का टीसी, पैंट्री स्टाफ इन के साथ मिला हुआ है. बिना सिस्टम सपोर्ट के यह धर्म का भगवा गैंग चल नहीं सकता. रेल मंत्रालय को जवाब देना चाहिए.’’
रेलवे ने बयान दिया, ‘‘जांच के आदेश दे दिए हैं. यात्रियों से अपील है कि अजनबी से खानेपीने की चीजें न लें.’’
टीसी का ट्रांसफर कर दिया. चाय वाला बदल गया. पर गैंग?
गैंग नया रूट पकड़ चुका था. इस बीच प्रिया की हार्ड ड्राइव के बहुत से फोटो निकाल कर सोशल मीडिया और डार्क वैल पर दिखने लगे थे पर उन का स्रोत कहां है पता करना मुश्किल था. उसे अपने सारे बैंक अकाउंट बंद कर के नए खोलने पड़े क्योंकि डर था कि हाई ड्राइव में सेब नबरों और पासवर्डों का दुरुपयोग हो सकता है.
प्रिया ने सब की कहानियां इकट्ठा कर के एक पीडीएफ बनाई और रेल मंत्री, महिला आयोग, पीएमओ को टैग कर के ट्वीट किया. प्तक्चद्धड्डद्द2ड्डत्रड्डठ्ठद्द प्तञ्जह्म्ड्डद्बठ्ठरुशशह्ल प्तक्त्रड्डद्बद्य2ड्ड4स्ड्डद्घद्गह्ल4 ट्रेंड करने लगा.
आज प्रिया हर ट्रेन यात्रा पर खुद चाय बना कर थर्मस में ले जाती है. सूटकेस में ताला लगाती है और उसे चेन से सीट से बांधती है. और हां अब कोई धर्म की बात करे या दूसरों के कपड़ों पर कमैंट करे तो वह मुसकरा कर कहती है, ‘‘बहन, कपड़े नहीं कर्म देखे जाते हैं. पहले अपनी नीयत साफ करो.’’
क्योंकि अब प्रिया जान गई है कि ठग का कोई धर्म नहीं होता. धर्म का चोला पहनना और दूसरों को जज करना सब से आसान नकाब है और भरोसा… वह आंखें खोल कर करना चाहिए, आंखें बंद कर के नहीं.
