Short Story : आज  सुबह औफिस में कुछ अलग ही हलचल थी. चाय वाले की आवाज धीमी, कंप्यूटर कीबोर्ड की आवाजें तेज और सभी चेहरे तनाव से खिंचे हुए. कंपनी के गलियारों में लोग फुसफुसा रहे थे, ‘‘एमडी आज फिर प्लांट आए हैं. दूसरी बार इस महीने.’’

कोविड-19 के बाद से डा. हर्षवर्धन का आना एक तरह से समारोह जैसा होता था क्योंकि वे अकसर वीडियो कौन्फ्रैंस में ही काम चला लेते थे. लेकिन आज बिना किसी पूर्व सूचना के उन का दौरा हो रहा था. सभी लैपटौप, फाइलें, रिपोर्टें, मीटिंगरूम सब नए सिरे से दुरुस्त किए जा चुके थे.

50 वर्षीय नेहा अपनी टेबल पर बैठी 1-1 डौक्यूमैंट चैक कर रही थीं. उन के चेहरे पर हलकी थकान पर आंखों में वही पुरानी ईमानदारी चमक रही थी.

25 साल हो चुके थे उन्हें इस कंपनी में. इस कंपनी का पहला कंप्यूटर उन्होंने चालू किया था, पहली सैलरी वितरण की फाइल उन्होंने बनाई थी, और अब इस उम्र में हर दिन लगता था जैसे शरीर और मन दोनों एकसाथ जवाब देने लगे हों.

‘‘कभीकभी मन में आत बस, अब बहुत हो गया. अवकाश ले लूं. थोड़ा खुद को समय दूं.’’

मगर अगले ही पल घर के खर्चे, बच्चों की पढ़ाई, ईएमआई और बढ़ती महंगाई का सच उन्हें पीछे खींच लेता.

कुछ महीने पहले नेहा और कंपनियों में भी आवेदन दिए. इंटरव्यू में एचआर वाले बड़े विनम्र स्वर में कहते, ‘‘मैम, आप का प्रोफाइल बहुत अच्छा है पर इस समय हम यंग टीम बना रहे हैं.’’

या फिर, ‘‘अनुभव बहुत अच्छा है लेकिन आप की ऐक्स्पैक्टेड सैलरी थोड़ा मुश्किल है.’’

उम्र और अनुभव, दोनों एकसाथ उन के लिए बो?ा बन गए थे. आज भी वे समय से पहले औफिस पहुंच गई थीं. अचानक उन के फोन पर एक कौल आई, एमडी की, ‘‘नेहा, तुरंत मेरे कैबिन में आइए.’’

कुछ  फाइलों के नाम नोट करवाए और उन्हीं फाइलों को ले कर नेहा को बुलाया गया था.

वे चौंकीं, फिर तेजी से उठीं. सधे हाथों से फाइलें निकालीं. 1?-1 पन्ना दोबारा जांचा. कोई गलती, कोई विसंगति न रहे. 5 मिनट लगे पर जरूरी थी चैकिंग भी.

जब नेहा कैबिन तक पहुंचीं, देखा एमडी किसी बाहरी टीम के साथ मीटिंग में व्यस्त थे.

दरवाजा आधा खुला था पर नेहा वहीं ठिठक गईं.

‘अभी नहीं’, सोच कर वे चुपचाप लौट आईं.

कुछ ही मिनट बाद एमडी का फोन फिर बजा. इस बार वही कड़क आवाज, वही तीखे शब्द, ‘‘आप को कब से बुलाया है… आने में इतना वक्त? काम भी ऐसे ही करती हैं क्या आप? कितनी स्लो हैं आप. काम नहीं होता है तो घर बैठ जाएं.’’

कुछ और बातें और भी कठोर, और भी कटु. जैसे हर शब्द सीधे दिल में उतर गया हो. फोन कटते ही नेहा की आंखें भर आईं. वे स्तब्ध बैठी रहीं. उन्हें सम?ा ही नहीं आया कि अभीअभी उन के साथ हुआ क्या है.

25 साल की निष्ठा, दिनरात की मेहनत और बदले में अपमान की एक तेज मार.

पहली बार मन में आया, ‘‘बस, अब नहीं. अभी के अभी त्यागपत्र लिख दूं.’’

दिल जोर से धड़क रहा था, उंगलियां कांपने लगी थीं. पर अचानक 2 चेहरे उन की आंखों के आगे तैर गए. बेटी आस्था, जो महीनों से नया लैपटाप चाह रही थी और बेटा अनिकेत, जिस ने आईआईटी की कोचिंग जौइन करने की जिद पकड़ रखी थी.

मां का दुख, गुस्सा, अपमान सब बच्चों की जरूरतों के आगे कहीं पीछे छूट गया. उन की आंखें भरी जरूर थीं पर मन मजबूत हो गया था. उन्होंने फोन उठाया, गहरी सांस ली और एमडी को कौल की, ‘‘सर, क्या मैं फाइलें ले कर अब आ सकती हूं?’’

जब वे कैबिन में गईं. डां. हर्षवर्धन चेहरे पर उसी कठोरता के साथ बैठे थे. फाइलें उन्होंने बिना देखे ले लीं. मगर तभी बाहर से एचआर हेड आए और बोले, ‘‘सर, सिस्टम में दिख रहा है, इन्हें कौल 10:02 बजे की गई थी. कैबिन में आप ने 10: 07 पर मीटिंग शुरू कर दी थी. ये 10:08 पर पहुंची थीं.’’

एक पल को कमरे में सन्नाटा छा गया. एमडी का चेहरा और कठोर हो गया गया. उन्हें

समझ आया कि वह गलती उन की अपनी थी, नेहा की नहीं. पर अहंकार की एक अलग ही दुनिया होती है. उन्होंने माफी नहीं मांगी, बस फाइलों पर नजरें टिकाए रहे.

नेहा के चेहरे पर कोई शिकायत नहीं, बस एक शांत दृढ़ता थी.

नेहा चुपचाप खड़ी रहीं पर अंदर ही अंदर कुछ बदल चुका था. औफिस में दिन बीता, पर मन नहीं बदला. शाम को औफिस खाली होने लगा.

नेहा अकेली अपनी सीट पर बैठी थीं. आज पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि कंपनी में उन की मेहनत, ईमानदारी और वर्षों की निष्ठा किसी मशीन की तरह आम और अनदेखी हो गई है. वे उठीं, अपनी पानी की बोतल बैग में रखी और घर जाने लगीं. पर कदम धीरे हो गए. कंपनी के गेट पर पहुंचतेपहुंचते उन्हें लगा कि यह नौकरी अब सिर्फ नौकरी नहीं रही है. यह बच्चों के सपनों की कीमत है और वह यह कीमत जरूर चुकाएगी.

घर पहुंचने पर बेटी ने दरवाजा खोला, और बोली, ‘‘मम्मा, आप ठीक तो हैं? आज बहुत थकी लग रही हैं?’’

नेहा मुसकराईं, एक पुरानी, थकी हुई पर मजबूत मुसकान. उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘हां बस थोड़ा लंबा दिन था.’’

मगर मन में एक ही वादा किया, मैं तुम्हारे और तुम्हारे भाई के सपनों को पूरा करूंगी. फिर और एक चौड़ी मुसकान के नीचे सारे दुखों को दबा लिया और साथ ही त्यागपत्र का खयाल भी मन से दूर कर दिया.

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