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उस ने टैक्सी में बैठते हुए मेरे हाथ को अपनी दोनों हथेलियों के बीच भींचते हुए कहा, ‘‘अच्छा, जल्दी ही फिर मिलेंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘जरूर मिलेंगे,’’ और दूर जाती टैक्सी को देखती रही. उस की हथेलियों की गरमाहट देर तक मेरे हाथों को सहलाती रही. अचानक वातावरण में गहरे काले बादल छा गए. ये न जाने कब बरस पड़ें? बादलों के बरसने और मन के फटने में क्या देर लगती है? न जाने कब की जमी बर्फ पिघलने लगी और मैं, हिमशिला से साधारण मानवी बन गई, मुझे पता ही नहीं चला. मेरे मन में कब का विलुप्त हो गया प्रेम का उष्ण सोता उमड़ पड़ा, उफन पड़ा.

मेरी उस से पहली पहचान एक सैमिनार के दौरान हुई थी. मुख पर गंभीरता का मुखौटा लगाए मैं अपने में ही सिकुड़ीसिमटी एक कोने में बैठी थी कि ‘हैलो, मुझे प्रेम कहते हैं,’ कहते हुए उस का मेरी ओर एक हाथ बढ़ा था. मैं ने कुछकुछ रोष से भरी दृष्टि उस पर उठाई थी, ‘नमस्ते.’ उस के निश्छल, मुसकराते चेहरे में न जाने कैसी कशिश थी जो मेरे बाहरी कठोर आवरण को तोड़ अंतर्मन को भेद रही थी. मैं उस के साथ रुखाई से पेश न आ सकी. फिर धीरेधीरे 3 दिन उस के बिंदास स्वभाव के साथ कब और कैसे गुजर गए, मालूम नहीं. मैं उस की हर अदा पर मंत्रमुग्ध सी हो गई थी. सारे दिनों के साथ के बाद अंत में अब आज विदाई का दिन था. मन में कहींकहीं गहरे उदासी के बादल छा गए थे. उस ने मेरे चेहरे पर नजरें गड़ाए हुए मोहक अंदाज में कहा, ‘अच्छा, जल्दी ही फिर मिलेंगे.’

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