Rajpal Yadav : बचपन से ही अभिनय की इच्छा रखने वाले हास्य अभिनेता राजपाल यादव उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के हैं. 25 साल से कौमेडियन के रूप में परिचित राजपाल अपनी अनूठी कौमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं. अभिनय में बारीकी लाने के लिए उन्होंने पहले लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी और फिर दिल्ली के नैशनल स्कूल औफ ड्रामा (NSD) से अभिनय का प्रशिक्षण लिया. हालांकि उन की मां की इच्छा थी कि वे डाक्टर बनें.

वर्ष 1997 में वे मुंबई आए और दूरदर्शन धारावाहिक ‘मुंगेरी लाल के भाई नौरंगीलाल’ से लोकप्रिय हुए. फिल्म ‘जंगल’ में उन के नकारात्मक किरदार ‘सिप्पा’ ने उन्हें पहचान दिलाई, जिस के लिए उन्हें बैस्ट निगेटिव रोल का अवार्ड भी मिला और करीब 150 से अधिक फिल्मों में काम किया.

राजपाल यादव की कुछ चर्चित फिल्में ‘हंगामा’, ‘चुप चुप के’, ‘भूल भुलैया’, ‘वक्त, ‘फिर हेरा फेरी’, ‘ढोल’ आदि हैं. उन्होंने ‘मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं,’ ‘मैं मेरी पत्नी और वो’ और ‘कुश्ती’ जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं भी निभाईं.

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राजपाल यादव ने 2 शादियां की हैं. उन की पहली पत्नी करुणा का निधन उन की बेटी ज्योति के जन्म के समय हो गया था. वर्ष 2003 में उन्होंने राधा यादव से शादी की, जिन से उन की 2 बेटियां हैं.
उन की इस सफल कैरियर में उन्हें कानूनी काररवाई का भी सामना करना पड़ा।

फिल्म ‘अता पता लापता’ (2012) के लिए ₹5 करोड़ का कर्ज लिया था, जिसे चुका न पाने और चेक बाउंस होने के कारण उन्हें कानूनी काररवाई का सामना करना पड़ा. इस मामले में उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में कुछ दिन बिताना पड़ा.

उन की फिल्म ‘भूत बांग्ला’ रिलीज हो चुकी है, जिस में उन के काम को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं. अपनी जर्नी के बारे में उन्होंने गृहशोभा से खास बात की. पेश हैं, कुछ खास अंश :

रिश्तों में गहराई

प्रियदर्शन के साथ सालों काम करने के अनुभव के बारे में राजपाल कहते हैं कि समय के साथ उन के साथ मेरे रिश्तों में प्रगाढ़ता आ गई है। सालोंसाल जब आप किसी भी क्षेत्र में लगातार किसी के साथ काम करते हैं, तो बहुत सी बातें ऐसी होती हैं, जिसे शब्दों के माध्यम से नहीं, ट्यूनिंग के माध्यम से बता पाते हैं. जैसे अगर दाल अच्छी बनी है, तो उस में डाली गई नमक की मात्रा को बताना संभव नहीं होता. वैसे ही मेरे जीवन में 3 निर्देशकों का नाम सब से खास है। मैं केवल प्रियदर्शन का ही नाम नहीं, बल्कि रामगोपाल वर्मा और डेविड धवन का नाम लेना भी आवश्यक समझता हूं.

मिलता है मौका

वे आगे कहते हैं कि इन तीनों ने मेरे ऊपर प्रयोग किए और 99% सफल रहे, जिस में फिल्म ‘छोटा डौन’, ‘छोटा पंडित’ आदि कई किरदारों ने मुझे आगे बढ़ने में मदद किया. उस में मुझे भी ताजगी मिलती रही और मैं सफल होता रहा.

वे कहते हैं कि फिल्म ‘भूत बंगला’ की अगर बात करें तो इस में भी कुछ नया करने की बात सामने आई, तो मजाक में निकला। मेरी भूमिका सुंदर यानि बल्ली की निकली, जो मंगलपुर की हवेली के इर्दगिर्द बुने गए रहस्य के बीच कौमेडी करता है. यह भूमिका छोटा पंडित से काफी अलग रही.

प्रियदर्शन की एक खूबी यह है कि चाहे उन की फिल्म में एक आर्टिस्ट का 1 सीन हो या 4, हर आर्टिस्ट की भूमिका को एक दिशा प्रदान कर उसे अच्छी तरह से करने का मौका वे देते हैं.

हास्य रस है अनूठा

राजपाल पिछले 25 साल से इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं. वे कहते हैं कि प्रियदर्शन ने मजाक में भी कभी कोई ऐसी बात कही हो, जिसे सुन कर हंसी न आए और आप उस से सुनना भी चाहते हो. मेरे हिसाब से सिनेमा दशकों से चल रही है, मुझे जो लाइन मिले, जिस में मैं ऐसी ऐक्टिंग करूं, जिसे देख कर बूढ़ा, जवान और बच्चा सभी हंसे, फिर चाहे वह पुरुष हो या स्त्री सभी अनायास हंस पड़ते हों, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो हंसाने की दम में कुछ कमी है. शुद्ध रूप से हंसी आने पर ही उसे क्लास सिनेमा कहा जा सकता है. अगर हम कत्थक सम्राट बिरजू महाराज की बात करें, तो वे हमेशा अपनी अदाओं में चलतेफिरते थे और जीवन के अंतिम पलों में भी अपनी भावभंगिमाओं से वे पूरे हौल के लोगों को मोहित कर देते थे. वह चीज जो किसी की बिना सहायता लिए तन और मन में गुदगुदी पैदा करें, उसी को हास्य रस कहते हैं.

मनोरंजन है एक विज्ञान

राजपाल हंसते हुए कहते हैं कि कौमेडी आसान नहीं होती। मैं कौमेडी को कभी पकड़ता नहीं, बौडी लैंग्वेज को पकड़ता हूं. हमारे जीवन में 9 रस हैं और एक कलाकार के रूप में मैं ने रसों के ऊपर पढ़ाई की है। कई बार गुस्सा दिखाने के लिए हंसी को रोकना पड़ता है और गुस्सा छिपाने के लिए भी कई बार हंसना पड़ता है, जिसे सामने वाला समझ जाता है.

वे कहते हैं कि जिस ने मनोरंजन को विद्यार्थी के रूप में लिया है, वह 100% सफल हुआ है. मैं ने हर फिल्म में कौमेडी से अधिक इस के विज्ञान को जिया है. फिल्म ‘मालामाल’ हो या ‘हंगामा’ दोनों में रोना एक जैसा है, लेकिन क्या कारण है कि दोनों के रोने में फर्क दिखता है. असल में मानसिक रूप से लगाया गया विज्ञान इन दोनों को एकदूसरे से अलग करता है.

राजपाल कहते हैं कि कौमेडी में कई लोग हैं, जिन्हें मैं देखना पसंद करता हूं, जिस में चार्ली चैपलिन, गोविंदा, जैकी चैन आदि कई ऐसे कलाकार हैं, जो जहां खड़े हो जाते हैं, वहीं से कौमेडी शुरू हो जाती है.

कला फूहड़ नहीं

राजपाल कहते हैं कि कौमेडी में फूहड़ता अधिक होती है, लेकिन एक प्योर कौमेडी करना आसान नहीं होता। मेरा रास्ता साफ है। मैं ने वह विज्ञान नहीं सीखा है और मैं किसी भी कला को फूहड़ नहीं मान सकता. हमारे देश में 5 तरीके की कला सालों से देखने को मिलती है, गलीनुक्कड़ की, स्वांग, और्केस्ट्रा, मंच और अंत में सिनेमा आया है। सब की औडियंस हैं. इस में जिस काम को मैं सही नहीं मानता, हो सकता है कि वह किसी को अच्छी लगे. मैं ठहाके मार कर हंसने को ही क्लास मनोरंजन मानता हूं और उसे ही करना चाहता हूं. मुझे किस दर्शक वर्ग को खुश रखना है, इसे मुझे बीज बन कर समझना पड़ेगा.

रिश्ता था दोस्ताना

फिल्म ‘भूत बंगला’ कौमेडियन असरानी की अंतिम फिल्म रही, जिसे ले कर राजपाल भावुक हो गए। वे कहते हैं कि असरानी एक मंजे हुए कलाकार रहे हैं। उन के साथ मेरा रिश्ता दोस्तना रहा है. उन के साथ मैं ने उम्र के फासले को कभी महसूस नहीं किया. उन की फिल्म ‘शोले’ देख कर मैं ने जब छोटे से हौल में तालियां बजाई थीं तब पता नहीं था कि उन के साथ मुझे 20 साल तक कई फिल्मों में काम करने का मौका मिलेगा. मुझे खुशी इस बात से है कि उन्होंने कर्म करतेकरते ही अपनी अंतिम यात्रा पूरी की. मुझे बेहद दुख हुआ था, जब मैं ने सुना कि फिल्म पूरी हुई और वे हमारे बीच नहीं रहे. मैं इस बात से खुश हूं कि 100 साल से अधिक फिल्म इंडस्ट्री के पूरे होने में वे एक नामचीन कलाकार थे.

किरदार को जीना पङता है

राजपाल कहते हैं कि वे डाइरैक्टर के एक्टर नहीं, बल्कि उन के सामने सीन्स और स्क्रिप्ट होता है, इस में उन्हें जो भी सीन मिलता है, उस में वे अपनी पूरी मेहनत लगा कर उसे सजीव करना पसंद करते हैं. वही उन का विश्वास है और उसी के अनुसार काम करते आए हैं.

वे कहते हैं कि ऐक्टर को कभी भी डाइरैक्टर बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, इस से कहानी की तालमेल खराब हो सकती है. मेरे सभी डाइरैक्टर की आंखों में देख कर मैं यह पता लगा लेता हूं कि उन्हे ऐक्टिंग में क्या चाहिए. दुनिया में एक कलाकार के लिए इतने चरित्र हैं कि पूरी उम्र भी काम करने पर आप सब नहीं कर सकते, मसलन 500 चरित्र भी एक आर्टिस्ट अगर करता है, तो सारे चरित्र उसे बिल्डिंग के नीचे ही मिल सकते हैं. इसलिए अभिनय की कोई सीमा नहीं होती, हर दिन एक नया चरित्र जन्म लेता है, जिसे हमें खोजने की जरूरत होती है.

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