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सुबह परदों से छन कर आती सूर्य की किरणों के मद्धिम प्रकाश ने उसे सुबह होने का एहसास कराया कि तभी दरवाजे पर हुई आहट से वह अपने बैड पर उठ कर बैठ गई, देखा तो सामने उस की प्यारी सहेली सुनयना खड़ी थी. उन दोनों की मुलाकात ट्रेनिंग के दौरान भोपाल की प्रशासनिक अकादमी में हुई थी. वह म.प्र. पुलिस में एक अधिकारी थी और इंदौर में ही पोस्टेड थी. अमजद और प्रणति के बारे में उसे कुछ ज्यादा पता नहीं था.

वह आते ही प्रणति के गले लग गई. बोली, ‘‘और बता कैसा रहा जीजू से मिलन का अनुभव? क्या उपहार दिया उन्होंने? ससुराल में सब का व्यवहार कैसा है... अरे, मैं लगातार बोलती जा रही हूं तू भी तो कुछ बोल,’’ कह कर जब उस ने प्रणति की आंखों में झंका तो उस की आंखों में आंसू देख कर चौंक गई और घबरा कर बोली, ‘‘क्या हुआ प्रणू तू रो क्यों रही है... कुछ गड़बड़ हुआ है क्या... क्या जीजू... ने कुछ...’’

‘‘क्या बताऊं और क्या छिपाऊं मैं सोना,’’ कहते हुए अब तक की सारी दास्तां उस ने सुनयना के आगे बयां कर दी.

‘‘उफ, यह क्या हो गया...’’ सुनयना हैरत

से बोली.

‘‘मैं किसी भी कीमत पर विवाह को तैयार नहीं थी पर मातापिता की भावनाओं के आगे हम बेटियां हमेशा से मजबूर होती रही है. मुझे अपने लिए तनिक भी दुख नहीं है पर मांपापा को इस कटु सचाई से कैसे रूबरू कराऊं कुछ समझ ही नहीं आ रहा. क्या बीतेगी उन पर यह सब सुन कर... केवल समाज के झठे भय और जिद से इतनी जिंदगियां एकसाथ खत्म हो गईं... विवाह.’’

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